Sunday, April 12, 2026
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शादी न बच्चे, बस गुड्डे-गुड़िया ही अच्छे! Gen-Z क्यों पाल रहे हैं इन्हें; आखिर क्या है यह अजीबोगरीब ट्रेंड?!..

शादी न बच्चे, बस गुड्डे-गुड़िया ही अच्छे! Gen-Z क्यों पाल रहे हैं इन्हें; आखिर क्या है यह अजीबोगरीब ट्रेंड?!..
शादी न बच्चे, बस गुड्डे-गुड़िया ही अच्छे! Gen-Z क्यों पाल रहे हैं इन्हें; आखिर क्या है यह अजीबोगरीब ट्रेंड?!..

इस अनोखे ट्रेंड को ‘दर्द रहित पेरेंटिंग’ (Painless Parenting) का नाम दिया गया है. इसमें युवा, खासकर महिलाएं, असली बच्चों की जगह रुई से भरे और दिखने में बेहद मासूम गुड्डे-गुड़ियों को अपने पास रखती हैं. ये लोग इन खिलौनों को महज सजावट की वस्तु नहीं मानते, बल्कि उनकी पूरी शिद्दत से देखभाल करते हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे हजारों वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें लोग अपने इन ‘नकली बच्चों’ का जन्मदिन मनाते हैं, उनके लिए दूध की बोतल तैयार करते हैं और उनके डायपर बदलते नजर आते हैं. इन खिलौनों पर लोग उतना ही पैसा खर्च कर रहे हैं, जितना एक असली बच्चे की परवरिश में लगता है. यह एक ऐसी दुनिया है जहां जिम्मेदारी का अहसास तो है, लेकिन असली पेरेंटिंग जैसा तनाव और दर्द नहीं.

इस विचित्र संस्कृति की जड़ें एशिया के प्रमुख देशों जैसे चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में गहराई से जुड़ी हैं. इसकी शुरुआत साल 2016 के आसपास हुई थी, जब मशहूर कोरियाई पॉप ग्रुप ‘EXO’ के प्रशंसकों ने अपने पसंदीदा सितारे किम जोंग-डे की तरह दिखने वाली एक छोटी गुड़िया बनाई थी. इसके बाद तो जैसे बाढ़ आ गई; लोग अपने पसंदीदा सेलिब्रिटीज और एनिमे पात्रों जैसे दिखने वाले गुड्डों को बनवाने लगे. धीरे-धीरे प्रशंसकों ने इन गुड़ियों को बच्चों की तरह ‘गोद’ लेना शुरू कर दिया और खुद को ‘डॉल मम्मी’ या ‘डॉल पापा’ कहना पसंद करने लगे. आज यह ट्रेंड एक बड़े बाजार में बदल चुका है, जहां लोग इन काल्पनिक पात्रों के साथ भावनात्मक रिश्ता जोड़ रहे हैं.

आखिर क्यों इस गुड़िया के लिए हजारों-लाखों?
एक गुड़िया को पालने का शौक सुनने में भले ही सस्ता लगे, लेकिन इसकी हकीकत काफी महंगी है. जब तक ऑनलाइन ऑर्डर किए हुए गुड्डे-गुड़िया घर नहीं पहुँचते, तब तक ये युवा सोशल मीडिया पर खुद को ‘गर्भवती’ बताते हैं. एक बार जब गुड़िया घर आ जाती है, तो उसके लिए असली बच्चों जैसे कपड़ों से लेकर विग, जूते और एसेसरीज खरीदने का सिलसिला शुरू होता है. कई ‘डॉल पेरेंट्स’ तो अपने खिलौनों के लिए असली फार्मूला दूध, दूध की बोतलें और ब्रांडेड डायपर तक खरीदते हैं. इन सबका खर्च महीने के हजारों और साल के लाखों रुपयों तक पहुँच जाता है. लोग अपनी गुड़िया को सबसे सुंदर और स्टाइलिश दिखाने के लिए अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा इन पर लुटा रहे हैं.

आखिर इन बेजान खिलौनों से इतना लगाव क्यों?
इस ट्रेंड के पीछे के कारणों को समझने के लिए किए गए एक सर्वे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. लगभग 85 प्रतिशत लोगों का मानना है कि वे इन गुड्डे-गुड़ियों के बेहद प्यारे और मनमोहक (CUTE) लुक के कारण इन्हें पालते हैं. वहीं, 58 प्रतिशत लोगों ने इनके साथ एक गहरे ‘भावनात्मक लगाव’ की बात स्वीकार की है. एक ‘डॉल पेरेंट’ का कहना है कि गुड़िया में जान नहीं होती, बल्कि उसे प्यार देने से उसमें जान आती है. कई लोग अपने पसंदीदा कोरियाई सितारों की तरह दिखने वाली गुड़िया इसलिए पालते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वे असली सितारों से कभी नहीं मिल पाएंगे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसे में ये गुड़िया उनके लिए उस खालीपन को भरने का एक जरिया बन जाती हैं.

क्या अमेरिका और यूरोप में भी ‘रीबॉर्न डॉल्स’ का क्रेज बढ़ रहा है?
यह चलन सिर्फ एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका और यूरोप में भी तेजी से पैर पसार रहा है. हालांकि, वहां के लोगों की पसंद थोड़ी अलग है. पश्चिमी देशों में लोग रुई के गुड्डों के बजाय ‘रीबॉर्न डॉल्स’ (Reborn Dolls) पालना पसंद करते हैं. ये गुड़िया दिखने में इतनी असली होती हैं कि पहली नजर में कोई भी धोखा खा जाए कि यह जीता-जागता बच्चा है या खिलौना. इन्हें ज्यादातर वे महिलाएं पाल रही हैं जो किसी कारणवश मां बनने का सुख प्राप्त नहीं कर पाईं या जिनके बच्चे अब बड़े होकर घर से दूर जा चुके हैं. वहां इन गुड़ियों का इस्तेमाल मानसिक शांति और अकेलेपन को दूर करने के लिए एक थेरेपी के रूप में भी किया जा रहा है.

क्या यह विचित्र शौक भविष्य में रिश्तों की परिभाषा बदल देगा?
Gen-Z का यह शौक आज भले ही इंटरनेट पर ‘मजेदार’ या ‘अजीब’ लग रहा हो, लेकिन यह एक बड़े सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करता है. असली बच्चों की परवरिश में लगने वाली आर्थिक और मानसिक मेहनत से बचने के लिए युवा अब ‘वर्चुअल’ या ‘नकली’ दुनिया का सहारा ले रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह ट्रेंड युवाओं के बीच बढ़ते अकेलेपन औरजिम्मेदारियों के डर को दर्शाता है. हालांकि, इन गुड़ियों को पालने वालों का मानना है कि यह उन्हें खुशी देता है और उनकी मानसिक सेहत के लिए अच्छा है. कारण जो भी हो, लेकिन ‘टॉय पेरेंटिंग’ ने निश्चित रूप से दुनिया को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या भविष्य में खिलौने ही इंसान के सबसे अच्छे साथी होंगे?

me.sumitji@gmail.com

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