दुनिया की बदलती राजनीति और बढ़ते युद्ध के माहौल के बीच अब एक नई होड़ शुरू हो गई है सोना वापस लेने की होड़। अमेरिका में डॉन्ड ट्रंप की वापसी के बाद यूरोपीय देशों को भरोसा धीरे-धीरे कम होता नजर आ रहा है और इसका असर अब उनके गोल्ड रिजर्व पर भी देखने को मिल रहा है। अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा सोने का भंडार है करीब 8133 टन का। लेकिन खास बात यह है कि इसमें सिर्फ उसका अपना ही नहीं बल्कि 30 से ज्यादा देशों का भी सोना सुरक्षित रखा गया है। दशकों से अमेरिका ने इस सोने को संभाल के रखा है। लेकिन अब इस पर सवाल उठने लगे हैं। जर्मनी जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड रिजर्व रखने वाला देश है उसका करीब 1236 टन सोना अमेरिका में रखा गया है। इसके अलावा इटली का 1060 नीदरलैंड, फ्रांस और अन्य देशों का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिकी तिजोरियों में है। अब यह धीरे-धीरे अपना सोना वापस लेने की तैयारी में है।
दरअसल यह परंपरा 1950 के दशक से चल रही है। उस समय यूरोप और अमेरिका के बीच बड़े स्तर पर व्यापार होता था और सोने को सुरक्षित रखने के लिए अमेरिका सबसे भरोसेमंद जगह माना जाता था। न्यूयॉर्क वैश्विक व्यापार का केंद्र बन चुका था जिससे सोने का लेनदेन भी बेहद आसान हो जाता था। भारत भी इस मामले में कुछ अलग नहीं है। भारत के कुल 880 टन से ज्यादा गोल्ड रिजर्व में से करीब 290 टन सोना विदेश में रखा गया है। जिसमें कुछ हिस्सा हाल ही में वापस लिया गया है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। विदेश में सोना रखने के कई फायदे माने जाते हैं। सुरक्षा, आसान व्यापार और संकट के समय जोखिम कम करना। लेकिन अब हालत बदलती नजर आ रही है। ट्रंप की नीतियां, अमेरिका फर्स्ट एजेंडा और अंतरराष्ट्रीय तनाव ने यूरोप और अमेरिका के रिश्तों के बीच बड़ी दूरी ला दी है।
ईरान युद्ध और बढ़ती महंगाई के बीच सोना एक सुरक्षित निवेश के रूप में देखा जाता है और अहम भी माना जाता है। यही कारण है कि अब देश अपनी कीमती भंडारों को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। कुल मिलाकर यह सिर्फ सोने की वापसी नहीं बल्कि बदलते वैश्विक भरोसे और ताकत के संतुलन की कहानी है। फिलहाल के लिए बस इतना ही।






