पश्चिम एशिया इस समय आग के ऐसे दरिया में बदल चुका है, जिसकी लपटें अब वैश्विक शक्ति संतुलन को खुली चुनौती दे रही हैं। ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच चल रहा यह युद्ध अब निर्णायक मोड पर पहुंच चुका है, जहां हर हमला केवल जवाब नहीं, बल्कि आने वाले बड़े भूचाल का संकेत बनता जा रहा है।
ईरान ने साफ शब्दों में चेतावनी दे दी है कि उसकी जमीन हमलावरों की कब्रगाह है। ईरानी सैन्य कमांडर अली जहांशाही ने अमेरिका को सीधी धमकी देते हुए कहा कि अगर अमेरिकी सेना ने कदम रखा, तो उन्हें पत्थर युग नहीं बल्कि उससे भी पहले के दौर में भेज दिया जाएगा। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यह बयान उस आत्मविश्वास का प्रतीक है, जो ईरान अपनी सैन्य तैयारी और रणनीतिक गठबंधनों के दम पर दिखा रहा है।
दूसरी ओर, यमन के हूती विद्रोहियों ने इजराइल के जाफा क्षेत्र पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार कर यह साफ कर दिया है कि यह युद्ध अब बहुस्तरीय और बहुक्षेत्रीय हो चुका है। हूती प्रवक्ता यह्या सरी ने दावा किया कि यह हमला अकेले नहीं बल्कि पूरे क्षेत्रीय गठबंधन के साथ मिलकर किया गया। इसका मतलब साफ है कि ईरान अब प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों मोर्चों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर रहा है।
उधर, इजराइल लगातार हमलों के बीच अपनी वायु रक्षा प्रणाली को सक्रिय रखे हुए है, लेकिन बार बार हो रहे हमले उसकी सुरक्षा प्रणाली की सीमाओं को उजागर कर रहे हैं। हाल ही में हिज्बुल्लाह के पंद्रह लड़ाकों को मार गिराने का दावा इजराइल ने किया, लेकिन यह जीत भी अस्थायी साबित हो रही है क्योंकि हर जवाब के बाद एक और बड़ा हमला सामने आ जाता है।
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख इस पूरे संघर्ष को और ज्यादा खतरनाक बना रहा है। उन्होंने खुलकर कहा है कि ईरान के बचे हुए ढांचे को तबाह करना अभी बाकी है। पुल, बिजली संयंत्र और औद्योगिक ढांचे को निशाना बनाने की चेतावनी सीधे तौर पर नागरिक ढांचे पर हमले का संकेत देती है। इससे यह साफ होता है कि यह युद्ध अब आर्थिक और सामाजिक ढांचे को तोड़ने की रणनीति में बदल चुका है।
इस बीच, कुवैत में ईरानी हमले से बिजली और पानी संयंत्र को नुकसान पहुंचा है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि यह संघर्ष अब खाड़ी देशों तक फैल चुका है। वहीं संयुक्त अरब अमीरात के हबशन गैस संयंत्र में मिसाइल के मलबे से आग लगना ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा खतरा बनकर उभरा है।
सबसे बड़ा रणनीतिक मोर्चा होरमुज जलडमरूमध्य बना हुआ है, जहां से दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत कर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सीधे चुनौती दी है। संयुक्त राष्ट्र में इस मार्ग को खोलने के लिए प्रस्ताव लाया गया, लेकिन चीन और रूस के विरोध के कारण उसे कमजोर करना पड़ा। इसका मतलब है कि वैश्विक शक्तियां भी इस टकराव में बंटी हुई हैं।
दूसरी ओर, यूरोप और नाटो की स्थिति इस युद्ध में बेहद कमजोर नजर आ रही है। अमेरिका के सहयोगी देश खुलकर साथ नहीं दे रहे, जिससे नाटो जैसे पुराने सैन्य गठबंधन की नींव हिलती दिख रही है। ट्रंप द्वारा नाटो से अलग होने की धमकी ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। यह स्थिति वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़े बदलाव का संकेत देती है।
उधर, अमेरिकी सेना के शीर्ष नेतृत्व में अचानक फेरबदल भी इस युद्ध की गंभीरता को दर्शाता है। सेना प्रमुख रैंडी जॉर्ज को हटाना और नए नेतृत्व को लाना इस बात का संकेत है कि अमेरिका अब बड़े स्तर पर सैन्य रणनीति बदलने की तैयारी में है। साथ ही, अमेरिकी सेना की विशेष इकाइयों की तैनाती यह संकेत देती है कि जमीनी युद्ध की संभावना को भी नकारा नहीं जा सकता।
उधर, ईरान की रणनीति स्पष्ट है, सीधे युद्ध से बचते हुए अपने सहयोगियों के माध्यम से बहुस्तरीय दबाव बनाना। वहीं अमेरिका और इजराइल की रणनीति ढांचे को तबाह कर ईरान को कमजोर करने की है। लेकिन यह टकराव जितना लंबा खिंचेगा, उतना ही वैश्विक अस्थिरता बढ़ेगी।
देखा जाये तो यह युद्ध अब केवल मिसाइलों और बमों की लड़ाई नहीं रह गया है। यह प्रभुत्व, संसाधनों और भविष्य की वैश्विक व्यवस्था की लड़ाई है। हर दिन के साथ यह संघर्ष और खतरनाक होता जा रहा है, और दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां से वापसी बेहद मुश्किल नजर आती है।
बहरहाल, पश्चिम एशिया की यह जंग अब इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ बन सकती है, जहां से नई विश्व व्यवस्था की नींव रखी जाएगी। सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि इस जीत की कीमत पूरी दुनिया को कितनी चुकानी पड़ेगी।






