दारुल उलूम देवबंद में धूमधाम के साथ शनिवार को स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाया गया. इस दौरान जमीयत उलमाएहिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने समारोह को संबोधित किया. उन्होंने देश की आजादी और लोकतंत्र को एक महान उपहार बताया. इसके साथ ही उन्होंने उन तत्वों की कड़ी आलोचना की जो देश के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने को कमजोर और बिखेरना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं बल्कि मुसलमानों को आतंकवादी कहने और नफरत फैलाने वाले सांप्रदायिक लोग ही आतंकवादी हैं.

मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि आजादी क्या होती है, यह हमसे पूछो, कुर्बानियां हमने दी हैं. उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास दारुल उलूम देवबंद, उलेमा, मदरसों और मुसलमानों की महान कुर्बानियों के उल्लेख के बिना न तो लिखा जा सकता है और न ही समझा जा सकता है.

किस मकसद से हुई थी दारुल देवबंद की स्थापना

मौलाना मदनी ने कहा कि दारुल उलूम देवबंद की स्थापना ही ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को तैयार करने के मकसद से की गई थी, जो देश को अंग्रेजी गुलामी से आजाद कराने के लिए संघर्ष करें. उन्होंने कहा कि 1857 के बाद 1866 में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना हुई. उन्होंने कहा कि अफसोस की बात है कि आज इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश करते हुए उन्हीं मदरसों को आतंकवाद से जोड़ने की नापाक कोशिश की जा रही है, जिन शिक्षण संस्थानों से गुलामी के खिलाफ सबसे पहले आजादी का बिगुल बजा था.

‘इतिहास को सांप्रदायिक ताकत मिटा नहीं सकती’

उन्होंने कहा कि रेशमी रूमाल आंदोलन और माल्टा की कैद हमारी इतिहास की ऐसी रोशन गाथाएं हैं, जिन्हें कोई सांप्रदायिक ताकत मिटा नहीं सकती. उन्होंने कहा कि शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी रहमतुल्लाह अलैह, शेखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी और उनके साथियों को सात समंदर पार माल्टा में इसलिए कैद किया गया था कि वो भारत को ब्रिटिश गुलामी से आजाद देखना चाहते थे.

‘देशभक्ति का प्रमाण मांगने वालों को इतिहास देखना चाहिए’

मौलाना मदनी ने सांप्रदायिक ताकतों से सवाल किया कि जब हमारे बुजुर्ग माल्टा में कैद थे, उलेमा अंग्रेजों के खिलाफ जेलें भर रहे थे और देश की आज़ादी के लिए अपनी जानें कुर्बान कर रहे थे, तो आज देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने वालों के वैचारिक पूर्वज उस समय कहां थे?. उन्होंने कहा कि मुसलमानों और मदरसों से देशभक्ति का प्रमाण मांगने से पहले ऐसे लोगों को इतिहास के आईने में अपना अतीत देखना चाहिए.

‘पहले मुसलमान निशाने पर थे, अब इस्लाम भी निशाने पर है’

मौलाना अरशद मदनी ने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि पहले जो लोग सत्ता में थे, वे इन हालात के लिए जिम्मेदार नहीं थे. उन्होंने कहा कि उस समय भी लोगों ने मुसलमानों को सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचाने की हमेशा कोशिशें कीं और मुस्लिम विरोधी दंगे भी होते रहे. उन्होंने कहा कि लेकिन आज के समय और पहले के हालात में बड़ा फर्क यह है कि उस समय मुसलमान निशाने पर थे, लेकिन अब इस्लाम भी निशाने पर है. उन्होंने कहा कि इस्लाम को मिटाने वाले खुद मिट गए, लेकिन इस्लाम ज़िंदा रहा और कयामत तक जिंदा रहेगा.

मौलाना ने दिया सोवियत रूस का उदाहरण

सोवियत रूस का उदाहरण देते हुए मौलाना मदनी ने कहा कि वहां सालों तक कम्युनिज्म को बढ़ावा देकर इस्लाम को खत्म करने की कोशिशें की जाती रहीं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यहां तक कि मस्जिदों और धार्मिक मदरसों पर पाबंदियां लगा दी गईं और सालों तक मस्जिदों से अज़ान तक की आवाज नहीं आई. लेकिन दुनिया ने देखा कि सोवियत रूस के टुकड़ेटुकड़े हो गए और उसके बाद कई मुस्लिम देश अस्तित्व में आए. उन्होंने कहा कि तमाम जुल्म और बर्बरता के बावजूद इस्लाम ज़िंदा है और मुसलमान जिंदा है.