अटल बिहारी वाजपेई ने प्रधानमंत्री के रूप में कुल तीन बार शपथ ली. पहला कार्यकाल 13 दिन, दूसरा 13 महीना और तीसरा कार्यकाल पूरे पांच साल. इस तरह वे कुल छह साल दो महीने देश के पीएम रहे. उन्होंने अपनी पूरी क्षमता से देश के विकास में अपना योगदान दिया. उनके लिए देश सबसे ऊपर था. पर, उनके समूचे कार्यकाल में एक उपलब्धि ऐसी रही है, जिस पर न केवल देश को नाज है, बल्कि पूरी दुनिया हैरान रह गई थी. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए तक हतप्रभ थी. उसे अपने नेटवर्क पर शक होने लगा था. आखिर हो भी क्यों नहीं. बिना किसी शोर शराबे के अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण परमाणु परीक्षण कर दिया था. आइए, आज उनकी पुण्यतिथि के बहाने समझते हैं कि आखिर कैसे उन्होंने सीआईए को चकमा देकर यह काम किया था?

11 मई 1998 की दोपहर भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है. राजस्थान के थार रेगिस्तान में स्थित पोखरण में जमीन के नीचे जोरदार धमाके हुए. इन परमाणु परीक्षणों ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया. भारत अब एक पूर्ण परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र बन चुका था. इस मिशन का सबसे रोमांचक पहलू तकनीकी सफलता नहीं, बल्कि इसकी गोपनीयता थी. अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के पास दुनिया के सबसे उन्नत जासूसी उपग्रह थे. इसके बावजूद भारत ने बिना किसी भनक के इस पूरे मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया.
1995 की असफलता से लिया सबक
भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण साल 1974 में स्माइलिंग बुद्धा के नाम से किया था. उसके बाद के दशकों में अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण कोई नया परीक्षण नहीं हुआ. 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के कार्यकाल में दोबारा परीक्षण की तैयारी हुई थी. उस समय अमेरिकी जासूसी उपग्रहों ने पोखरण में चल रही गतिविधियों को पकड़ लिया था. वाशिंगटन से भारी कूटनीतिक दबाव आया और भारत को यह योजना टालनी पड़ी. भारत ने इस घटना से बहुत बड़ा सबक सीखा. वैज्ञानिक और सुरक्षा सलाहकार समझ गए कि भविष्य में परीक्षण करने के लिए अमेरिकी सेटेलाइट्स की नजरों से बचना अनिवार्य होगा.
11 मई 1998 की दोपहर भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हुई.
अटल बिहारी वाजपेयी का दृढ़ राजनीतिक फैसला
मार्च 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी. शपथ लेने के कुछ ही दिनों बाद वाजपेयी जी ने वैज्ञानिकों और सैन्य अधिकारियों के साथ एक बेहद गोपनीय बैठक की. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इस बैठक में परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. आर. चिदंबरम और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के प्रमुख डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम शामिल थे. अटल बिजारी वाजपेयी ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें परमाणु परीक्षण की तैयारी करने की हरी झंडी दे दी. उनका मानना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं हो सकता.
सीआईए की तकनीकी निगरानी का जाल
उस समय अमेरिकी खुफिया तंत्र बेहद मजबूत था. सीआईए के जासूसी उपग्रह भारत के ऊपर लगातार चक्कर लगा रहे थे. ये सेटेलाइट्स जमीन पर खड़े वाहनों के टायर के निशान और जमीन पर गिरी छोटी से छोटी वस्तु की भी साफ तस्वीर ले सकते थे. इसके अलावा पोखरण रेंज पर अमेरिकी एजेंसियां चौबीसों घंटे नजर रखे हुए थीं. किसी भी असामान्य हलचल, खुदाई या भारी वाहनों की आवाजाही तुरंत वाशिंगटन के नियंत्रण कक्ष में दर्ज हो जाती थी. इसलिए वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिना किसी हलचल के सारे उपकरण पोखरण तक पहुंचाना था.
परीक्षण की तैयारी के लिए अधिकतर भारी काम रात के अंधेरे में किया जाता था.
सेटेलाइट्स के ब्लाइंड स्पॉट का सटीक गणित
इस मिशन में भारतीय वैज्ञानिकों ने गणित और खगोल विज्ञान का अद्भुत इस्तेमाल किया. उन्होंने अमेरिकी सेटेलाइट्स के गुजरने के सटीक समय और उनके ऑर्बिट्स की गणना की. वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि दो सेटेलाइट्स के गुजरने के बीच कुछ समय का ऐसा अंतराल आता है, जब पोखरण पर कोई कैमरा नहीं होता. इस समय को ब्लाइंड स्पॉट कहा गया. भारतीय वैज्ञानिकों और सेना के जवानों ने तय किया कि सारा संवेदनशील काम केवल इसी समयावधि में किया जाएगा. जब भी सेटेलाइट ऊपर आता, पूरा इलाका सामान्य और शांत दिखने लगता था.
सैन्य वर्दी और वैज्ञानिकों के कोड नाम
सीआईए के स्थानीय मुखबिरों और कैमरों को चकमा देने के लिए वैज्ञानिकों ने अनोखा तरीका अपनाया. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और डॉ. आर. चिदंबरम जैसे वरिष्ठ वैज्ञानिकों को सेना की वर्दी पहनाई गई. इससे ऐसा लगता था कि वे सेना के नियमित अभ्यास का हिस्सा हैं. इसके अलावा वैज्ञानिकों के नाम भी बदल दिए गए थे. डॉ. कलाम को मेजर जनरल पृथ्वीराज नाम दिया गया था. डॉ. चिदंबरम को मेजर जनरल नटराज और बार्क के निदेशक डॉ. अनिल काकोडकर को भी सैन्य छद्म नाम दिया गया था. वैज्ञानिक आपस में केवल इन्हीं कोड नामों से बात करते थे ताकि किसी भी वायरलेस इंटरसेप्शन में उनकी पहचान उजागर न हो.
20 मई, 1998 को पोखरण में यहीं परमाणु बम का परीक्षण किया था. फोटो: Getty Images
रात का सन्नाटा और रेत के तूफान का सहारा
मिशन का अधिकतर भारी काम रात के अंधेरे में किया जाता था. परीक्षण के लिए जरूरी कुओं की खुदाई और तारों को बिछाने का काम रात में होता था. वैज्ञानिक सुबह होने से पहले ही सारी मशीनें और उपकरण जमीन के नीचे छिपा देते थे. रात भर की गई खुदाई से निकले मलबे को इस तरह फैलाया जाता था मानो वहां रेत के सामान्य टीले हों. यदि दिन में तेज आंधी या हवा चलती, तो वे जानबूझकर उसका फायदा उठाते थे ताकि वाहनों के पहियों के निशान प्राकृतिक रूप से रेत में दब जाएं.
परमाणु सामग्री को गुपचुप लाया गया
परमाणु सामग्री और संवेदनशील उपकरणों को मुंबई और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र से पोखरण तक लाना बेहद जोखिम भरा था. इसे नियमित उड़ानों या बड़े काफिलों से नहीं भेजा जा सकता था. इसके लिए भारतीय वायुसेना के विमानों का अत्यंत गोपनीय तरीके से उपयोग किया गया. सामान को साधारण बक्सों में पैक किया गया जिन पर सामान्य सैन्य रसद के लेबल लगे थे. पोखरण में इन बक्सों को सीधे भूमिगत शाफ्ट्स में उतारा गया. यह सुनिश्चित किया गया कि सतह पर कोई भी ऐसा कंटेनर न दिखे जिससे परमाणु उपकरण होने का संदेह पैदा हो.
संचार व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण और मौन
सीआईए केवल तस्वीरों पर ही निर्भर नहीं थी, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक और फोन वार्तालाप को भी इंटरसेप्ट करती थी. वाजपेयी जी ने निर्देश दिया था कि इस मिशन से जुड़े लोग किसी भी प्रकार के टेलीफोन या फैक्स का उपयोग नहीं करेंगे. सारी जानकारी आमनेसामने या विशेष दूतों के माध्यम से पहुंचाई जाती थी. यहां तक कि कैबिनेट के प्रमुख मंत्रियों को भी परीक्षण के चंद घंटे पहले ही इसकी पूरी जानकारी दी गई थी. सूचना का दायरा इतना सीमित रखा गया कि लीक होने की संभावना शून्य हो गई.
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी.
बुद्ध मुस्कुराए और दुनिया चौंक गई
11 मई 1998 को दोपहर के समय पोखरण में तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए गए. जमीन थरथरा उठी और पोखरण के ऊपर धूल का एक बड़ा गुबार उठा. कुछ ही देर बाद नई दिल्ली में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. उन्होंने आत्मविश्वास से भरे शब्दों में कहा कि आज दोपहर 3:45 बजे भारत ने पोखरण में तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक किए हैं. 13 मई को भारत ने दो और परीक्षण किए और मिशन पूरा हुआ.
सीआईए की ऐतिहासिक विफलता और भारत का गौरव
यह घोषणा सुनते ही अमेरिकी प्रशासन और सीआईए के होश उड़ गए. अरबों डॉलर की निगरानी प्रणाली और जासूसी उपग्रह धरे के धरे रह गए. अमेरिकी सरकार ने इसे अपनी खुफिया प्रणाली की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक माना. सीआईए के निदेशक को अमेरिकी सीनेट के सामने इस विफलता पर जवाब देना पड़ा. अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक इच्छाशक्ति, डॉ. कलाम और भारतीय वैज्ञानिकों की चतुराई तथा भारतीय सेना के अनुशासन ने मिलकर असंभव को संभव कर दिखाया. इस ऐतिहासिक मिशन ने साबित कर दिया कि भारत न केवल तकनीक में सक्षम है, बल्कि अपनी रणनीतिक सुरक्षा की रक्षा पूरी दुनिया से छिपाकर भी कर सकता है.



