आज मोबाइल पर कुछ टैप करते ही पैसा देश के किसी भी हिस्से में पहुंच जाता है. लेकिन भारत में पैसे को बिना नकद इधरउधर ले जाए एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की कहानी नई नहीं है. सदियों पहले हुंडी के जरिए व्यापारी दूर बैठे व्यक्ति तक रकम पहुंचाते थे. इसके बाद बैंकिंग व्यवस्था, आरबीआई, इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर, एटीएम और कार्ड से होते हुए भारत यूपीआई तक पहुंचा. यानी आज का एक छोटा सा यूपीआई भुगतान सदियों से चल रही भुगतान व्यवस्था के विकास की अगली कड़ी है.

हुंडी से शुरू हुई पैसे को दूर भेजने की कहानी

भारत में बैंकिंग व्यवस्था आने से बहुत पहले हुंडी के जरिए रकम को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का तरीका मौजूद था. भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक, हुंडी भारत में विकसित हुआ एक क्रेडिट इंस्ट्रूमेंट था, जिसका इस्तेमाल 12वीं सदी में बड़े पैमाने पर होता था और यह बाद के दौर में भी जारी रहा. इसका इस्तेमाल रकम भेजने, कर्ज लेने और व्यापार के वित्तपोषण के लिए किया जाता था. अलगअलग तरह की हुंडी में दर्शनी हुंडी मांग पर भुगतान के लिए थी, जबकि मुद्दती हुंडी तय समय या तारीख पर देय होती थी.

औपनिवेशिक काल और आधुनिक बैंकिंग ढांचे की स्थापना

देशी हुंडी नेटवर्क के साथसाथ ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था की नींव रखी गई. वर्ष 1806 में बैंक ऑफ बंगाल, 1840 में बैंक ऑफ बॉम्बे और 1843 में बैंक ऑफ मद्रास की स्थापना हुई, जिन्हें बाद में 1921 में मिलाकर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया बनाया गया. इसके बाद 1 अप्रैल 1935 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934 के तहत आरबीआई ने अपना कामकाज शुरू किया, जिसका मुख्य उद्देश्य करेंसी नोट जारी करना और देश में मौद्रिक स्थिरता बनाए रखना था. आजादी के समय यानी 1947 तक भारत में पारंपरिक देशी नेटवर्क और औपनिवेशिक बैंकिंग प्रणाली दोनों एक साथ काम कर रहे थे.

आजादी के बाद बैंकिंग पहुंची आम लोगों तक

आजादी के बाद सिर्फ पैसा भेजना ही चुनौती नहीं था, बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना भी जरूरी था. 1955 में इम्पीरियल बैंक को स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में बदला गया. 1969 में 14 बड़े वाणिज्यिक बैंकों और 1980 में छह अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 1969 में देश में 8,262 बैंक शाखाएं थीं, जो मार्च 1990 तक बढ़कर 59,752 हो गईं. लीड बैंक योजना, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कर्ज जैसी पहलों के जरिए बैंकिंग नेटवर्क को ग्रामीण इलाकों और ज्यादा लोगों तक पहुंचाया गया.

कागज से इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की ओर बढ़ा देश

बैंकिंग शाखाओं के विस्तार के बाद भुगतान व्यवस्था में इलेक्ट्रॉनिक बदलाव शुरू हुआ. 1990 के दशक में आरबीआई की इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर व्यवस्था सामने आई. 26 मार्च 2004 को आरटीजीएस शुरू हुआ, जबकि नवंबर 2005 में एनईएफटी ने बैंक ग्राहकों को देशभर में इलेक्ट्रॉनिक तरीके से पैसा भेजने की सुविधा दी. 2007 के पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट ने भुगतान प्रणालियों के लिए कानूनी ढांचा दिया. 2008 में एनपीसीआई की स्थापना हुई और 2010 में आईएमपीएस आया, जिसने कई माध्यमों से तुरंत और चौबीसों घंटे बैंक ट्रांसफर की सुविधा उपलब्ध कराई.

जन धन, आधार और मोबाइल ने तैयार की डिजिटल नींव

डिजिटल भुगतान को बड़े स्तर पर पहुंचाने के लिए लोगों के पास बैंक खाते होना जरूरी था. प्रधानमंत्री जन धन योजना की घोषणा 15 अगस्त 2014 को हुई और इसे 28 अगस्त 2014 को शुरू किया गया. इसका मकसद लोगों तक बैंकिंग, जमा, पैसे भेजने, कर्ज, बीमा और पेंशन जैसी सुविधाएं पहुंचाना था. 22 जुलाई 2026 तक पीएमजेडीवाई के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 58.84 करोड़ लाभार्थी थे, जबकि खातों में 3.11 लाख करोड़ रुपये जमा थे और 41.01 करोड़ रुपे डेबिट कार्ड जारी किए जा चुके थे. आधार और मोबाइल के साथ जन धन ने डिजिटल वित्तीय ढांचे की नींव तैयार की.

यूपीआई ने सेकंडों में बदल दिया पैसे भेजने का तरीका

एनपीसीआई ने 11 अप्रैल 2016 को यूपीआई लॉन्च किया. इसका पायलट लॉन्च तत्कालीन आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने मुंबई में किया था और इसमें 21 सदस्य बैंक शामिल थे. यूपीआई ने अलगअलग बैंक खातों को एक साझा इंटरफेस से जोड़कर तुरंत भुगतान की सुविधा दी. आईएमपीएस ने तत्काल ट्रांसफर का आधार दिया, बैंकों ने खाते उपलब्ध कराए और मोबाइल फोन इंटरफेस बना. इसके बाद यूपीआई ने इन सभी को एक साझा भुगतान व्यवस्था में जोड़ दिया. 25 अगस्त 2016 तक यूपीआई से जुड़े ऐप गूगल प्ले स्टोर पर दिखाई देने लगे थे. जुलाई 2026 में यूपीआई ने 23.66 अरब लेनदेन किए, जिनकी कुल कीमत 29.88 लाख करोड़ रुपये रही.

हुंडी से यूपीआई तक, सवाल वही रहा

यूपीआई की सफलता सिर्फ अरबों लेनदेन की संख्या में नहीं है. इसके पीछे बैंक खाते, बैंक शाखाएं, पहचान व्यवस्था, मोबाइल कनेक्टिविटी, इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग, भुगतान निपटान और साझा तकनीकी मानकों का पूरा ढांचा काम करता है. इसलिए भारत की यूपीआई कहानी 2016 से शुरू नहीं होती. इसकी जड़ें उस हुंडी व्यवस्था तक जाती हैं, जिसने सदियों पहले बिना नकद को फिजिकली ले जाए दूर तक रकम पहुंचाने का रास्ता दिया था. तकनीक लगातार बदलती रही, लेकिन सवाल वही रहा कि पैसे को सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से दूरी पार कैसे पहुंचाया जाए. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यूपीआई ने इसी सदियों पुराने सवाल का जवाब कुछ टैप में दे दिया.