भारत में कुछ साल पहले तक खराब सड़कों की शिकायत आम थी. लेकिन अब देश के कई हिस्सों में एक्सप्रेसवे और हाईवे का नेटवर्क काफी बढ़ गया है. इससे लंबी दूरी का सफर पहले के मुकाबले आसान और तेज हो गया है. हालांकि, हाईवे या एक्सप्रेसवे पर गाड़ी चलाते समय आपने एक बात जरूर नोटिस की होगी. कहीं कारों के लिए 120 KM/H की स्पीड लिमिट होती है, तो कहीं यह 100 या 80 KM/H तक सीमित रहती है. उदाहरण के लिए दिल्लीमुंबई एक्सप्रेसवे और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे जैसे कुछ एक्सप्रेसवे पर कारों के लिए 120 KM/H तक की अधिकतम रफ्तार की अनुमति है. वहीं कई सामान्य नेशनल हाईवे पर यह सीमा 100 या 80 KM/H हो सकती है.

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एक ही देश में अलगअलग सड़कों के लिए स्पीड लिमिट अलग क्यों होती है? क्या सरकार इसे अपनी मर्जी से तय करती है? ऐसा बिल्कुल नहीं है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। स्पीड लिमिट तय करते समय सड़क की बनावट, डिजाइन, ट्रैफिक, मोड़ और सबसे जरूरी बात, लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखा जाता है.

सड़क का डिजाइन सबसे अहम

तय करने में सड़क की बनावट और उसका डिजाइन सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं. एक्सप्रेसवे को इस तरह बनाया जाता है कि वहां हर जगह से कोई वाहन या पैदल व्यक्ति अचानक सड़क पर न आ सके. इसमें एंट्री और एग्जिट के लिए पहले से तय जगह होती हैं. इसके अलावा एक्सप्रेसवे पर आमतौर पर चौराहे, गांव या सड़क किनारे से अचानक आने वाले वाहनों की समस्या कम होती है.

इसी वजह से यहां ज्यादा रफ्तार की अनुमति दी जाती है. दूसरी तरफ, सामान्य नेशनल या स्टेट हाईवे पर गांव, कस्बे, चौराहे और अलगअलग कट मिलते हैं. यहां अचानक कोई वाहन, पैदल व्यक्ति या जानवर सड़क पर आ सकता है. ऐसे में हादसे का खतरा कम करने के लिए स्पीड लिमिट घटा दी जाती है.

मोड़ और विजिबिलिटी भी तय करते हैं रफ्तार

सड़क बनाते समय इंजीनियर इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि वाहन किसी मोड़ से कितनी रफ्तार पर सुरक्षित तरीके से निकल सकता है. एक्सप्रेसवे पर आमतौर पर मोड़ लंबे और ज्यादा खुली विजिबिलिटी वाले बनाए जाते हैं. इससे को आगे का रास्ता पहले से दिखाई देता है और तेज रफ्तार में भी गाड़ी को संभालना आसान रहता है.

कुछ मोड़ों पर सड़क को हल्का सा झुकाव भी दिया जाता है, ताकि गाड़ी संतुलित रहे. इसे कैंबर या बैंकिंग एंगल कहा जाता है. वहीं सामान्य सड़कों और खासकर पहाड़ी इलाकों में मोड़ ज्यादा तीखे हो सकते हैं. ऐसे स्थानों पर तेज रफ्तार में अचानक ब्रेक लगाने से गाड़ी के फिसलने या नियंत्रण से बाहर होने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए मोड़, पुल, ढलान और ऐसे दूसरे संवेदनशील हिस्सों के पास स्पीड लिमिट कम कर दी जाती है.

हर वाहन के लिए एक जैसी स्पीड लिमिट नहीं

स्पीड लिमिट सिर्फ सड़क के हिसाब से तय नहीं होती. यह इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप कौनसा वाहन चला रहे हैं. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के नियमों के मुताबिक, एक्सप्रेसवे पर पैसेंजर कारों के लिए अधिकतम स्पीड लिमिट 120 KM/H है. वहीं भारी ट्रक और बस जैसे वाहनों के लिए यह सीमा 80 KM/H रखी गई है.

इसकी वजह साफ है. भारी वाहन को रोकने के लिए ज्यादा दूरी की जरूरत होती है. अचानक ब्रेक लगाने पर कार की तुलना में भारी वाहन को रुकने में ज्यादा समय और दूरी लग सकती है.

इसके अलावा सड़क पर कितनी लेन हैं और वहां ट्रैफिक कितना है, इसका भी असर स्पीड लिमिट पर पड़ता है. ज्यादा लेन और कम ट्रैफिक वाली सड़क पर अधिक रफ्तार की अनुमति दी जा सकती है. वहीं व्यस्त दोलेन या चारलेन वाली सड़कों पर सुरक्षा के लिए रफ्तार को सीमित रखा जाता है.

स्पीड लिमिट का मतलब सिर्फ चालान नहीं

सड़क किनारे लगा स्पीड लिमिट का बोर्ड सिर्फ चालान से बचने के लिए नहीं है. यह ड्राइवर को बताता है कि उस हिस्से में कितनी रफ्तार सुरक्षित मानी गई है. तेज रफ्तार पर बारिश या पानी जमा होने की स्थिति में गाड़ी के टायर सड़क पर अपनी पकड़ खो सकते हैं और एक्वाप्लेनिंग जैसी स्थिति बन सकती है. अचानक ब्रेक लगाने या मोड़ आने पर भी ज्यादा स्पीड पर गाड़ी को संभालना मुश्किल हो सकता है.

इसलिए अगली बार जब हाईवे या एक्सप्रेसवे पर स्पीड लिमिट का बोर्ड देखें, तो उसे सिर्फ एक नियम न समझें. यह आपकी सुरक्षा के लिए दिया गया संकेत है.हमेशा सड़क की स्थिति, मौसम और वहां लगी स्पीड लिमिट को ध्यान में रखकर ही गाड़ी चलाएं. कुछ मिनट जल्दी पहुंचने से ज्यादा जरूरी है कि आप सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचें.