उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात अभी से सजने लगी है. चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनेअपने समीकरण साधने शुरू कर दिए हैं. इस बार मुकाबला सिर्फ पुराने जातीय समीकरणों, पारंपरिक वोटबैंकों और बड़े राजनीतिक चेहरों तक सीमित नहीं रहने वाला. राजनीतिक दलों की नजर अब उस युवा वोटर पर है, जो सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, कैंपस और रोजगार जैसे मुद्दों से सीधे जुड़ा हुआ है.

यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में अब एक नया शब्द तेजी से चर्चा में है GenZ वोटर. प्रदेश में करीब 20 फीसदी आबादी को युवा या GenZ वोटर के तौर पर टारगेट करते हुए बीजेपी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और चंद्रशेखर आजाद की पार्टी ने अपनीअपनी रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है. राजनीतिक दलों को पता है कि विधानसभा चुनाव में कुछ फीसदी वोटों का मामूली अंतर भी बड़ी संख्या में सीटों के नतीजे बदल सकता है. ऐसे में युवा वोट में छोटासा बदलाव भी चुनावी तस्वीर को पूरी तरह बदल सकता है. इसी को देखते हुए 2027 के चुनाव से पहले यूपी में एक तरह का ‘GenZ वॉर’ शुरू हो गया है.
सपा ने बदली रणनीति, डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स पर दांव
समाजवादी पार्टी ने युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए अपनी पारंपरिक चुनावी रणनीति में बदलाव किया है. पार्टी अब सिर्फ बड़ी रैलियों और राजनीतिक सभाओं के भरोसे नहीं रहना चाहती. इसके बजाय सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म को युवा मतदाताओं तक पहुंचने का बड़ा माध्यम बनाया जा रहा है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से 200 से ज्यादा डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स के साथ बैठक किए जाने की बात सामने आई है.
इन बैठकों का मकसद युवाओं के बीच सीधे डिजिटल संवाद और राजनीतिक मुद्दों की पहुंच बढ़ाना है. सपा की रणनीति में बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे प्रमुख हैं. पार्टी इन मुद्दों से जुड़े कंटेंट को यूट्यूब, इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए ग्रामीण और कस्बाई इलाकों के युवाओं तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है.
इसके साथ ही पार्टी अपने युवा सांसदों के संसद में दिए भाषणों और राजनीतिक गतिविधियों को भी सोशल मीडिया पर प्रमोट कर रही है. इकरा हसन, आदित्य यादव, पुष्पेंद्र सरोज और प्रिया सरोज जैसे युवा चेहरों को इस डिजिटल रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है. इस अभियान की अगुवाई खुद डिंपल यादव कर रही हैं यानी सपा का संदेश साफ है कि युवा वोटर से जुड़ना है तो उसकी भाषा और उसके प्लेटफॉर्म पर पहुंचना होगा.
कांग्रेस का कैंपस कनेक्ट, राहुल गांधी का ‘गूंज’ कार्यक्रम
कांग्रेस भी युवा वोटरों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में है. राहुल गांधी की ओर से प्रयागराज में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के जरिए युवाओं से संवाद की शुरुआत को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई के जरिए विश्वविद्यालयों और कैंपसों में सदस्यता अभियान चलाने की तैयारी है. पार्टी की कोशिश है कि छात्र राजनीति के जरिए युवाओं के बीच अपना संगठनात्मक आधार मजबूत किया जाए.
प्रयागराज जैसे बड़े शैक्षणिक केंद्र से युवाओं के बीच संवाद की शुरुआत भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों, रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं और उच्च शिक्षा से जुड़े मुद्दों को कांग्रेस अपने अभियान का हिस्सा बना रही है. कांग्रेस के सामने हालांकि सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश में अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार मजबूत करने की है.
बसपा का ‘अंकल पॉलिटिक्स’ दांव
बहुजन समाज पार्टी ने भी युवाओं को अपने राजनीतिक अभियान के केंद्र में लाने की कोशिश तेज कर दी है. पार्टी में आकाश आनंद को युवा चेहरे के तौर पर आगे किया जा रहा है. आकाश आनंद ने हाथरस से रैलियों के जरिए युवाओं और खासकर दलितपिछड़े वर्ग के युवा मतदाताओं को जोड़ने का अभियान शुरू किया है. उनकी राजनीति में एक खास तरह की पीढ़ीगत अपील दिखाई देती है.
आकाश आनंद ने अखिलेश यादव और राहुल गांधी को अंकल’ कहकर जिस तरह निशाना साधा, उसमें भी यही रणनीति नजर आती है. संदेश यह देने की कोशिश है कि पुरानी पीढ़ी की राजनीति के मुकाबले युवा नेतृत्व युवाओं की समस्याओं को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकता है. बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी युवाओं और GenZ के साथ खड़े होने की बात कही है. ऐसे में पार्टी की कोशिश युवा दलित और पिछड़े वोटरों को अपने साथ जोड़ने की है.
चंद्रशेखर आजाद भी युवाओं के बीच सक्रिय
आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद भी युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार सक्रिय दिखाई दे रहे हैं. सड़क पर उतरने से लेकर युवाओं के रोजगार, शिक्षा और सामाजिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाने की उनकी रणनीति पहले से ही चर्चा में रही है. ऐसे में 2027 के चुनाव में युवा वोटर को लेकर विपक्षी खेमे में कई समानांतर रणनीतियां दिखाई दे रही हैं.
सपा डिजिटल माध्यम से पहुंच बढ़ा रही है, कांग्रेस कैंपस कनेक्ट पर जोर दे रही है, बसपा आकाश आनंद के युवा चेहरे को आगे कर रही है और चंद्रशेखर आजाद सड़क के आंदोलन के जरिए युवाओं को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
बीजेपी और योगी सरकार ने भी बनाया ‘युवा चक्रव्यूह’
विपक्षी दलों की इस रणनीति के बीच बीजेपी और योगी सरकार ने भी युवाओं को लेकर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. योगी सरकार की ओर से युवा नीति और युवा आयोग की दिशा में काम किए जाने की बात सामने आई है. सरकार की कोशिश है कि युवाओं से जुड़े मुद्दों को संस्थागत तरीके से सुना जाए और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए अलग तंत्र तैयार किया जाए. इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलगअलग विश्वविद्यालयों में छात्रों से सीधे संवाद का प्लान भी तैयार किया जा रहा है.
इस संवाद की खास बात यह होगी कि मुख्यमंत्री सिर्फ भाषण नहीं देंगे, बल्कि छात्रों के सवाल सुनेंगे और उनके जवाब भी देंगे यानी सरकार की कोशिश वनवे कम्युनिकेशन के बजाय टूवे संवाद को बढ़ावा देने की है. इसके अलावा युवा आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों को स्कूलों में जाकर करियर, स्टार्टअप और टेक्नोलॉजी से जुड़े विषयों पर संवाद करने की योजना भी इस रणनीति का हिस्सा है.
युवा सलाहकार समितियों का प्लान
बीजेपी की ओर से युवाओं से जमीनी स्तर पर जुड़ने के लिए जिला और ब्लॉक स्तर पर युवा सलाहकार समितियां बनाने की योजना भी चर्चा में है. इन समितियों में छात्र नेताओं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं और डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स को शामिल किए जाने की बात है. इसका उद्देश्य युवाओं के स्थानीय मुद्दों को सीधे सरकार तक पहुंचाना है यानी सरकार की रणनीति सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं के लिए एक ऐसा नेटवर्क तैयार करने की है, जिसके जरिए उनकी समस्याओं की जानकारी संगठन और सरकार तक पहुंचती रहे.
RSS की भी ग्राउंड मैपिंग
युवा वोटरों को लेकर बीजेपी के साथसाथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रियता भी महत्वपूर्ण है. बताया जा रहा है कि संघ ने उत्तर प्रदेश को पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में बांटकर विश्वविद्यालयों और कैंपसों में युवाओं के बीच पहुंच बनाने की रणनीति तैयार की है. क्षेत्र प्रचारकों को छात्रों की भावनाओं और उनके मुद्दों को समझने और इसकी रिपोर्ट संगठन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गई है.
बीजेपी नेताओं को डिजिटल ट्रेनिंग
युवाओं की बदलती राजनीतिक भाषा को बीजेपी भी समझ रही है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। पार्टी अपने जनप्रतिनिधियों को सोशल मीडिया, रील्स, ट्रेंडिंग मुद्दों और X जैसे प्लेटफॉर्म पर सक्रिय होने की ट्रेनिंग दे रही है. खासतौर पर इंस्टाग्राम को लेकर. इसका मकसद यही है कि बीजेपी के नेता सिर्फ पारंपरिक भाषणों और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित न रहें, बल्कि सोशल मीडिया पर भी युवाओं के सवालों और मुद्दों से सीधे जुड़ें.
आखिर युवा वोट इतना महत्वपूर्ण क्यों?
उत्तर प्रदेश में चुनावी मुकाबला अक्सर बेहद करीबी रहा है. कई सीटों पर कुछ हजार वोटों का अंतर नतीजा बदल देता है. ऐसे में अगर किसी राजनीतिक दल को युवा मतदाताओं के एक हिस्से का भी अतिरिक्त समर्थन मिलता है तो इसका सीधा असर विधानसभा सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है. युवाओं के बीच रोजगार, पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाएं, शिक्षा, डिजिटल अवसर, स्टार्टअप, महंगाई और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
2027 में किसका चलेगा युवा कार्ड?
उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी लड़ाई जैसेजैसे आगे बढ़ेगी, युवा वोटर को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है. एक तरफ अखिलेश यादव की डिजिटल रणनीति और युवा सांसदों के चेहरे हैं. दूसरी तरफ राहुल गांधी का कैंपस और युवा संवाद है. बसपा आकाश आनंद के जरिए नई पीढ़ी को साधने की कोशिश कर रही है. चंद्रशेखर आजाद सड़क की राजनीति के जरिए युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने में जुटे हैं.
वहीं, बीजेपी और योगी सरकार ने युवा नीति, युवा आयोग, मुख्यमंत्री का टूवे संवाद, युवा सलाहकार समितियों, डिजिटल ट्रेनिंग और जमीनी संगठन के जरिए अपना अलग मॉडल तैयार किया है. संघ की कैंपस मैपिंग इस रणनीति को और व्यापक बनाती है. साफ है कि 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव सिर्फ जातीय समीकरणों और पुराने वोटबैंक की लड़ाई नहीं रहने वाला. मोबाइल स्क्रीन से लेकर विश्वविद्यालय के कैंपस और प्रतियोगी परीक्षा की लाइब्रेरी तक, युवा अब चुनावी राजनीति के केंद्र में है.



