फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल 2026 फिर चर्चा में है. इसकी दो वजहें हैं. एक तो सरकार ने बीते 25 मार्च को इसे संसद में पेश किया था. लेकिन अभी यह पास नहीं हुआ है. दूसरी वजह यह है कि इसे लेकर दुनिया के अनेक हिस्सों से प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. इसी मुद्दे पर अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रखी है. उन्होंने इस बारे में फैल रही अफवाहों को सच्चाई से दूर बताते हुए कुछ तथ्य भी रखा है. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि भारत में राजनीतिक पार्टियों को विदेशी फंडिंग को लेकर क्या नियम हैं? इसका इतिहास और जुड़े बड़े विवाद भी जानेंगे.

विदेशी फंडिंग को लेकर भारत में लंबे समय से चिंता रही है. आशंका यह रहती है कि कोई विदेशी सरकार, कंपनी या संस्था भारतीय राजनीति को प्रभावित न करे. इसी कारण कानून राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने से रोकता है. यह नियम केवल चुनावी खर्च से जुड़ा नहीं है. इसका संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा, नीतिनिर्माण, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता से भी है.
भारत में कौनकौन से मुख्य कानून हैं?
इस विषय में दो कानून खास महत्वपूर्ण हैं.
- एक: Foreign Contribution Act, यानी FCRA. हिंदी में इसे विदेशी अंशदान अधिनियम कहा जाता है.
- दूसरा: Representation of the People Act, 1951. यह चुनाव और राजनीतिक दलों से जुड़े कई नियम तय करता है.
FCRA का मूल विचार सरल है. विदेश से आने वाला चंदा भारतीय राजनीति, चुनाव या सार्वजनिक नीति को अनुचित ढंग से प्रभावित नहीं करना चाहिए.
राजनीतिक दलों पर कानूनन सीधी रोक
FCRA के तहत राजनीतिक दल विदेशी अंशदान नहीं ले सकते. दल के पदाधिकारी भी इस रोक के दायरे में आते हैं. चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर भी विदेशी योगदान लेने की पाबंदी है. सांसद, विधायक, सरकारी कर्मचारी और न्यायाधीश जैसी कई श्रेणियों पर भी नियम लागू होते हैं. यहां विदेशी अंशदान का अर्थ केवल नकद पैसा नहीं है. इसमें विदेशी स्रोत से मिला दान, वस्तु, प्रतिभूति या अन्य आर्थिक मदद भी आ सकती है. कानून का उद्देश्य यह है कि भारतीय राजनीतिक प्रक्रिया का नियंत्रण भारतीय नागरिकों और भारतीय संस्थाओं के हाथ में रहे.
चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर भी विदेशी योगदान लेने की पाबंदी है.
विदेशी स्रोत किसे माना जाता है?
सामान्य तौर पर विदेशी सरकार, विदेशी कंपनी, विदेशी नागरिक, अंतरराष्ट्रीय संस्था और विदेशी ट्रस्ट विदेशी स्रोत माने जा सकते हैं. लेकिन कंपनियों के मामले में कानून की व्याख्या कई बार बदली है. यहीं से बड़ा राजनीतिक और कानूनी विवाद शुरू हुआ. किसी कंपनी का भारत में पंजीकृत होना हमेशा पर्याप्त नहीं माना गया. पहले उसके शेयरों पर विदेशी नियंत्रण या हिस्सेदारी भी महत्वपूर्ण मानी जाती थी. यानी कंपनी भारत में काम कर रही हो, लेकिन उसकी हिस्सेदारी का बड़ा भाग विदेशियों के पास हो, तो उसे विदेशी स्रोत माना जा सकता था.
क्या है FCRA का इतिहास?
भारत में विदेशी चंदे को नियंत्रित करने के लिए पहला FCRA वर्ष 1976 में बनाया गया था. उस समय देश में विदेशी प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता थी. इस कानून ने राजनीतिक दलों और कई सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के लिए विदेशी चंदे पर रोक लगाई. वर्ष 1984 में कानून को और मजबूत किया गया. विदेशी फंड लेने वाले संगठनों के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया सख्त हुई.
वर्ष 2010 में पुराना कानून बदलकर नया FCRA लागू किया गया. इसमें विदेशी योगदान की परिभाषा, पंजीकरण, नवीनीकरण और कार्रवाई के विस्तृत प्रावधान शामिल किए गए. वर्ष 2020 में भी बड़े बदलाव हुए. ये बदलाव मुख्यतः गैरसरकारी संगठनों और विदेशी फंड के उपयोग से जुड़े थे. हालांकि, राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदे पर मूल रोक पहले की तरह बनी रही.
दिल्ली हाई कोर्ट.
फिर आया दिल्ली हाईकोर्ट फैसला
विदेशी फंडिंग से जुड़ा सबसे चर्चित विवाद वर्ष 2014 में सामने आया. दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया. मामला विदेशी हिस्सेदारी वाली कंपनियों से चंदा मिलने का था. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ऐसी कंपनियों को विदेशी स्रोत माना जाना चाहिए. इसलिए उनसे राजनीतिक चंदा लेना FCRA का उल्लंघन है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उस समय की कानूनी परिभाषा के आधार पर संबंधित कंपनियों को विदेशी स्रोत माना जा सकता है. अदालत ने सरकार और चुनाव आयोग को कार्रवाई पर विचार करने को कहा. इस फैसले ने राजनीति में कॉरपोरेट चंदे और विदेशी स्वामित्व वाली कंपनियों की भूमिका पर बड़ी बहस छेड़ दी थी. जो आज भी मुद्दा है.
कानून में बदलाव हुए लेकिन विवाद कायम
2014 के फैसले के बाद सरकार ने कानून में बदलाव किए. वर्ष 2016 में वित्त अधिनियम के जरिए विदेशी स्रोत की परिभाषा बदली गई. बदलाव का असर उन भारतीय कंपनियों पर पड़ा जिनमें विदेशी निवेश था. कुछ स्थितियों में ऐसी कंपनियों को FCRA के लिए विदेशी स्रोत नहीं माना गया. फिर वर्ष 2018 में एक और संशोधन हुआ. इसे पुराने समय से लागू माना गया. इससे वर्ष 1976 के बाद मिले कुछ कॉरपोरेट चंदों की कानूनी स्थिति पर असर पड़ा. आलोचकों ने कहा कि यह बदलाव राजनीतिक दलों को पुराने मामलों में राहत देने के लिए किया गया.
उनका तर्क था कि कानून को पीछे की तारीख से बदलना जवाबदेही को कमजोर करता है. सरकार का कहना था कि भारतीय कंपनियों में वैध विदेशी निवेश को अपने आप विदेशी राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं माना जा सकता. यह विवाद आज भी राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता की बहस का बड़ा हिस्सा है.
भारतीय करंसी.
क्या भारतीय कंपनी चंदा दे सकती है?
भारतीय कंपनियां राजनीतिक दलों को चंदा दे सकती हैं. लेकिन इसके लिए कंपनी कानून, आयकर नियम और चुनावी नियमों का पालन जरूरी होता है. सरकारी कंपनियों के लिए अलग पाबंदियां हैं. विवाद तब पैदा होता है जब किसी भारतीय कंपनी में विदेशी हिस्सेदारी हो. ऐसे मामलों में यह देखना पड़ता है कि कंपनी की कानूनी स्थिति क्या है और उस समय लागू कानून क्या कहता है? इसलिए हर कंपनी से मिला चंदा विदेशी फंडिंग नहीं होता. लेकिन हर मामले की जांच उसके स्वामित्व, नियंत्रण और कानूनी ढांचे के आधार पर होनी चाहिए.
चुनावी बॉन्ड और पारदर्शिता की बहस
चुनावी बॉन्ड योजना सीधे विदेशी फंडिंग की योजना नहीं थी. लेकिन इसने राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा किया. इस योजना में दानदाता की पहचान आम जनता से छिपी रह सकती थी. आलोचकों ने कहा कि इससे मतदाता नहीं जान पाते कि किस दल को किसने पैसा दिया. समर्थकों का कहना था कि इससे नकद चंदा घट सकता है और बैंकिंग माध्यम से धन आ सकता है. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक ठहराया. अदालत ने मतदाता के सूचना के अधिकार और राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता को महत्वपूर्ण माना. इस फैसले के बाद यह बहस और तेज हुई कि राजनीतिक दलों की आय, बड़े दानदाता और चंदे के स्रोत सार्वजनिक होने चाहिए या नहीं?
विदेशी फंडिंग और एनजीओ का अंतर
विदेशी फंडिंग मामले में राजनीतिक दलों और गैरसरकारी संगठनों के नियम एक जैसे नहीं हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कई एनजीओ, ट्रस्ट और सामाजिक संस्थाएं FCRA पंजीकरण या पूर्व अनुमति के साथ विदेशी फंड ले सकती हैं. उन्हें बैंक खाते, लेखाजोखा, ऑडिट और वार्षिक रिटर्न जैसे नियमों का पालन करना पड़ता है. लेकिन राजनीतिक दलों को ऐसी सामान्य अनुमति नहीं मिलती. उनके लिए विदेशी अंशदान पर सीधी रोक है. कुछ संगठनों को सरकार राजनीतिक प्रकृति का संगठन भी घोषित कर सकती है. ऐसे संगठनों के लिए भी विदेशी फंडिंग पर रोक लग सकती है. इस प्रावधान पर कई बार नागरिक स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण को लेकर बहस हुई है.
राजनीतिक फंडिंग में सबसे जरूरी बात पारदर्शिता है. मतदाता को पता होना चाहिए कि दलों को पैसा कहां से मिल रहा है. कानून स्पष्ट होना चाहिए. नियम सभी दलों पर समान रूप से लागू होने चाहिए. जांच निष्पक्ष होनी चाहिए. विदेशी प्रभाव रोकना जरूरी है, लेकिन यह भी जरूरी है कि नियमों का उपयोग चुनिंदा कार्रवाई के लिए न हो. भारत में विदेशी फंडिंग का कानून राष्ट्रीय हित की रक्षा के लिए बनाया गया है. इसकी सफलता तभी मानी जाएगी, जब राजनीतिक दलों की फंडिंग साफ, जवाबदेह और जनता के सामने हो.



