सपना हर कोई देखता है, लेकिन हर सपना सुबह तक याद नहीं रहता. कुछ बिल्कुल याद नहीं रहता. कुछ थोड़ाबहुत मेमोरी में रह जाता है. अब सवाल है कि सपना देखते ही क्यों है और यह पूरी तरह से याद क्यों रहता. विज्ञान कहता है, सपने का कनेक्शन इस बात से होता है कि हमारे दिमाग की मेमोरी कैसी है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। सोते समय कौनकौन सी बातें याद हैं और वो इंसान भावनात्मक रूप से यानी इमोशनली कैसा है.

नींद कई चरणों में बंटी होती है. इसका एक हिस्सा है REM स्लीप. सपने नींद के इसी चरण में आते हैं. इस दौरान आंखें तेजी से इधरउधर घूमती हैं, दिल की धड़कन और सांस की रफ्तार बदलती रहती है, और दिमाग लगभग उतना ही सक्रिय हो जाता है जितना जागते समय होता है, बस शरीर सोया रहता है.
सपने क्यों आते हैं?
इस सवाल पर वैज्ञानिकों के बीच अभी भी पूरी सहमति नहीं है, लेकिन कुछ ठोस थ्योरी बताई गई हैं.
1 मेमोरी प्रोसेसिंग थ्योरी
इस थ्योरी की सबसे ज्यादा मानी जाने वाली वजह यह है कि नींद के दौरान दिमाग जरूरी जानकारियों और यादों को व्यवस्थित करता है, यही वजह है कि कोई नई चीज सीखने के बाद अच्छी नींद लेने से उसे बेहतर तरीके से याद रखा जा सकता है.
सपने इसी प्रोसेस का एक साइडइफेक्ट माने जाते हैं. दिमाग दिनभर जमा हुई जानकारी को छांटता है, जरूरी यादों को पक्का करता है और बेकार डेटा को हटाता है.
नींद के दौरान दिमाग जरूरी जानकारियों और यादों को व्यवस्थित करता है. फोटो: Pexels
2दिमाग का कौन सा हिस्सा शामिल?
ब्रेन स्कैन से पता चलता है कि सपने देखते वक्त याद्दाश्त, इमोशन और कल्पना से जुड़े दिमाग के कई हिस्से बेहद सक्रिय हो जाते हैं. हिप्पोकैम्पस दिनभर की यादों को प्रोसेस करने में मदद करता है, जबकि एमिग्डाला भी उसी समय बहुत सक्रिय हो जाता है.
यही वजह है कि कई सपनों में डर, चिंता या भावनाएं शामिल होती हैं. दिमाग असल में उन्हीं भावनाओं को प्रोसेस कर रहा होता है जो दिनभर में अनुभव हुईं या कुछ समय पहले हुई.
3 इमोशनल रिहर्सल थ्योरी
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि सपने एक तरह की “इमोशनल रिहर्सल” हैं. दिमाग मुश्किल या तनावपूर्ण स्थितियों को सुरक्षित माहौल में दोहराकर हमें असल जिंदगी में उनसे निपटने के लिए तैयार करता है.
नींद के जिस भी चरण में हम अचानक जागते हैं, उसका असर मेमोरी पर पड़ता है. फोटो: Pexels
पूरा सपना क्यों नहीं याद रहता?
यहां दिमाग की केमिस्ट्री एक बड़ा रोल निभाती है. REM स्लीप के दौरान ‘नॉरपेनेफ्रिन’ नाम का एक केमिकल दिमाग में बेहद कम मात्रा में मौजूद होता है. यह वही केमिकल है जो हमें नई यादों को मजबूती से दर्ज करने और बाद में याद रखने में मदद करता है. चूंकि सपने देखते वक्त इसका स्तर बहुत नीचे रहता है, दिमाग उस अनुभव को स्थायी याददाश्त में ठीक से “सेव” नहीं कर पाता. इसलिए जागते ही ज्यादातर सपने धुंधले पड़ने लगते हैं और कुछ ही मिनटों में पूरी तरह गायब हो जाते हैं.
इसके अलावा टाइमिंग का भी बड़ा असर होता है. नींद के जिस भी चरण में हम अचानक जागते हैं, उसका असर याद रहने पर पड़ता है. अगर कोई व्यक्ति REM चरण के ठीक अंत में जागता है, जब शरीर नींद के अगले चरण के लिए तैयार हो रहा होता है. तो उसे अपने सपने सबसे ज्यादा याद रहते हैं. यही वजह है कि अलार्म की आवाज से अचानक जागने पर कई बार सपना बहुत साफ याद रहता है, जबकि अपनेआप धीरेधीरे जागने पर वही सपना कुछ ही देर में भूल जाता है.



