भारत ने हाल के वर्षों में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में अपनी जगह पक्की करने के लिए कई अहम व्यापार समझौते किए हैं. अमेरिका और कनाडा के साथ बातचीत चल रही है, जबकि यूरोपीय संघ , ब्रिटेन, यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख बाजारों के साथ करार या तो हो चुके हैं या अंतिम चरण में हैं. यह भारत की व्यापार रणनीति में एक बड़ा बदलाव है. अब हम अपने घरेलू बाजार को सिर्फ बचाकर रखने के बजाय दुनिया के ग्लोबल वैल्यू चेन से गहराई से जुड़ रहे हैं. लेकिन, व्यापार विशेषज्ञों की मानें तो कागजों पर हुए इन बड़े करारों के बाद मैदान पर असली लड़ाई अब शुरू हो रही है. चुनौती अब बाजार तक पहुंचने की नहीं, बल्कि उस पहुंच का सही इस्तेमाल करने की है. कंपनियों को अपना पैमाना, गुणवत्ता और नियमों के पालन की क्षमता बढ़ानी होगी, ताकि वे विदेशी प्रतिस्पर्धियों को टक्कर दे सकें.

सिर्फ टैक्स घटने से नहीं बनेगी बात
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशंस के महानिदेशक अजय सहाय के मुताबिक, किसी भी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की कामयाबी सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि कितने उत्पादों पर आयात शुल्क कम हुआ है. यह सिर्फ एक अवसर है. असल कामयाबी तब है जब भारतीय कंपनियां सही कीमत, गुणवत्ता और भरोसेमंद डिलीवरी के साथ उस बाजार में पैठ बनाएं. ब्रिटेन और ओमान जैसे देशों के साथ हुए समझौतों से कपड़ा, चमड़ा, दवा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों को तुरंत फायदा मिल सकता है. यूएई के जरिए पश्चिम एशिया के बाजार खुल रहे हैं, तो ऑस्ट्रेलिया से फार्मा और फूड उत्पादों के रास्ते.
लेकिन, ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के आंकड़े बताते हैं कि भारत का निर्यात करने वाला सिर्फ 2030% तबका ही इन समझौतों का फायदा उठा रहा है, जबकि विदेशी कंपनियां हमारे बाजार में 6070% तक इसका लाभ ले रही हैं. वजह यह है कि विकसित देशों में आयात शुल्क पहले ही बहुत कम है . ऐसे में महज 12% की टैक्स छूट के लिए कंपनियां भारीभरकम कागजी कार्रवाई और सर्टिफिकेशन के झंझट से बचना चाहती हैं.
नियमों का बढ़ता जाल एक नई बाधा
अब व्यापार में असली रुकावट टैक्स नहीं, बल्कि कड़े नियम बन रहे हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। जैसेजैसे हम विकसित देशों के साथ जुड़ रहे हैं, पर्यावरण और पारदर्शिता के मानक सख्त हो रहे हैं. यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. 2026 से लागू होने वाले इस नए नियम के तहत भारतीय निर्यातकों को अपने कार्बन उत्सर्जन का सटीक हिसाब देना होगा. इससे 6 अरब यूरो से ज्यादा का लोहा, स्टील और एल्युमिनियम निर्यात सीधे तौर पर प्रभावित होगा. आंकड़े बताते हैं कि इसके लागू होने के शुरुआती चार महीनों में ही ईयू को भारत का स्टील निर्यात 13% गिर गया.
छोटे और मझोले उद्योगों के लिए यह सबसे बड़ा संकट है. महंगी सर्टिफिकेशन प्रक्रिया के कारण भारत के खेल उत्पाद चीन और पाकिस्तान के मुकाबले 1520% तक महंगे हो जाते हैं. देश के 1.58 करोड़ पंजीकृत एमएसएमई में से केवल 1.5 लाख ही निर्यात कर रहे हैं, जो हमारी निर्यात क्षमता का एक बहुत छोटा हिस्सा है.
कच्चा माल महंगा होने से बिगड़ता खेल
विदेशी बाजारों में भारत की कामयाबी अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि हमारी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कितनी मजबूत है. फिलहाल, ‘इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर’ यानी कच्चे माल पर ज्यादा और तैयार माल पर कम टैक्स, निर्यातकों की कमर तोड़ रहा है. अगर भारत में स्टील और एल्युमिनियम जैसे कच्चे माल पर आयात शुल्क ज्यादा है, तो विदेशी प्रतिस्पर्धी, जिन्हें यह शून्य ड्यूटी पर मिलता है, वे सस्ते में माल बनाकर बाजार पर कब्जा कर लेंगे.
बंदरगाहों की सुस्ती तोड़नी होगी
बेहतरीन करार और सस्ता माल भी तब तक काम नहीं आता, जब तक वह सही समय पर खरीदार तक न पहुंचे. भारत के बंदरगाहों पर अब जहाजों का टर्नअराउंड समय सुधरकर 0.9 दिन हो गया है, जिसे अर्थशास्त्री एक सकारात्मक कदम मानते हैं. लेकिन, सिंगापुर और दुबई के मुकाबले हम ऑटोमेशन और कुशल लॉजिस्टिक्स वर्कफोर्स में अभी भी पीछे हैं. डेलॉयट इंडिया के मुताबिक, भारत को सिर्फ टैक्स छूट से आगे बढ़कर निवेश, डिजिटल ट्रेड और लॉजिस्टिक्स के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा. मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को सीधा बंदरगाहों से जोड़ना होगा. तभी इन अरबों डॉलर के समझौतों का असली फायदा देश की अर्थव्यवस्था और आम कारोबारी तक पहुंच पाएगा.



