कुछ महिलाओं को गर्भावस्था में डायबिटीज हो सकती है. इसे जेस्टेशनल डायबिटीज कहते हैं. जेस्टेशनल डायबिटीज गर्भवती महिलाओं में ब्लड शुगर का लेवल बढ़ने की स्थिति है. यह उन महिलाओं को भी हो सकता है जिन्हें पहले कभी डायबिटीज नहीं थी. यह तब होता है जब प्लेसेंटा से बनने वाले हार्मोन के कारण शरीर का इंसुलिन ठीक से काम नहीं कर पाता. इस स्थिति को इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं, जिससे शरीर को ज्यादा इंसुलिन की ज़रूरत पड़ती है.

गर्भवती महिलाओं को दिन में लगभग तीन से चार बार इंसुलिन इंजेक्शन की जरूरत पड़ सकती है. अगर इंसुलिन की यह जरूरत पूरी नहीं होती है, तो मां के शरीर में ग्लूकोज का लेवल बढ़ जाता है, जिससे मां और बच्चे दोनों की सेहत पर गंभीर असर पड़ सकता है.

आइए, जेस्टेशनल डायबिटीज से जुड़े ब्लड शुगर के सही लेवल, खानपान से जुड़ी जरूरी बातों और सावधानियों के बारे में जानें.

प्रेग्नेंसी में ब्लड शुगर लेवल कितना होना चाहिए?

फास्टिंग : 6090 mg/dL
खाना खाने से पहले: 60105 mg/dL
खाना खाने के 1 घंटे बाद: 130140 mg/dL
खाना खाने के 2 घंटे बाद: 120 mg/dL से कम
सुबह 2:00 बजे से 6:00 बजे के बीच: 6090 mg/dL

जेस्टेशनल डायबिटीज के लक्षण और पहचान

जेस्टेशनल डायबिटीज में अक्सर कोई खास लक्षण या चेतावनी वाले संकेत नहीं दिखते. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसीलिए स्क्रीनिंग टेस्ट करवाना बहुत ज़रूरी है. कभीकभी, बहुत ज़्यादा प्यास लगना या बारबार पेशाब आना जैसे लक्षण इस स्थिति का संकेत हो सकते हैं. जेस्टेशनल डायबिटीज की पहचान ब्लड टेस्ट से की जाती है.

ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन, या हीमोग्लोबिन ए1सी भी एक तरह का टेस्ट है. इस टेस्ट का इस्तेमाल डायबिटीज के मरीजों में लंबे समय तक ब्लड शुगर लेवल की निगरानी के लिए किया जाता है. हीमोग्लोबिन A1c लेवल पिछले कुछ महीनों के औसत ब्लड ग्लूकोज़ लेवल को मापता है.

जेस्टेशनल डायबिटीज के कारणों में शामिल हैं:

ज्यादा वजन या मोटापा होना.

फिजिकली एक्टिव न होना

प्रीडायबिटीक होना.

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम जैसी हार्मोन से जुड़ी समस्या होना.

मातापिता या भाईबहन को डायबिटीड होना.

9 पाउंड से ज्यादा वजन वाले बच्चे को जन्म देना.

खानपान में बदलाव

आयुर्वेदिक डॉक्टर चंचल शर्मा कहती हैं कि ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज और दालें/फलियां खाएं. इसके अलावा रिफाइंड चीनी, प्रोसेस किए हुए खाद्य पदार्थ और भारी, तैलीय और मीठे खाद्य पदार्थों से बचिए. कड़वे, कसैले और तीखे स्वाद वाले खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल करें.

लाइफस्टाइल में करें ये बदलाव

नियमित व्यायाम, जैसे कि टहलना, योग और हल्की स्ट्रेचिंग.

योग, ध्यान और गहरी सांस लेने के व्यायाम नर्वस सिस्टम को बैलेंस करते हैं.

पर्याप्त आराम और नींद जरूरी लें.

डिटॉक्सिफिकेशन थेरेपी आयुर्वेद कई तरह की डिटॉक्सिफिकेशन थेरेपी देता है, जिन्हें सामूहिक रूप से पंचकर्म कहा जाता है. ये थेरेपी किसी योग्य प्रैक्टिशनर की देखरेख में जेस्टेशनल डायबिटीज़ को मैनेज करने में फायदेमंद हो सकती हैं. ये थेरेपी शरीर से टॉक्सिन को बाहर निकालने, पाचन और मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने और दोषों में संतुलन बहाल करने में मदद करती हैं.