यूपी की राजनीति में चुनाव आते ही कुछ जातियां अचानक राजनीति विमर्श के केंद्र में आ जाती हैं. ब्राह्मण भी इन्हीं जातियों में एक है. विधानसभा या लोकसभा चुनाव आते ही तकरीबन हर दल की तरफ से ब्राह्मणों को अपने पाले में करने की कवायद शुरू हो जाती है. राजनीतिक दल ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित करते हैं. बड़े ब्राह्मण नेताओं को आगे लाकर इस समाज को साधने की कोशिश करते हुए चुनावों में लाभ लेना चाहते हैं.

सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों है जब उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी कई अन्य बड़े सामाजिक समूहों से कम है. इसके बावजूद राजनीतिक दल उन्हें साधने के लिए इतनी मेहनत क्यों करते हैं. इसका जवाब ब्राह्मण समाज की जनसंख्या नहीं बल्कि, उनके भौगोलिक फैलाव, सामाजिक प्रभाव और चुनावी भूमिका के पीछे छिपा है.

यूपी में ब्राह्मण आबादी कितनी है?

उत्तर प्रदेश में अभी तक जातिवार जनगणना के आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. अलगअलग राजनीतिक विश्लेषणों और अनुमानों के प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी 9 प्रतिशत के मानी जाती है. हालांकि, कई जाति समूहों के मुकाबले इनकी संख्या इतनी अधिक नहीं है. लेकिन इनकी सबसे अधिक संख्या मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में है. इसके अलावा बुंदेलखंड इलाके में भी ब्राह्मणों की आबादी पाई जाती है.

यूपी में पार्टियों के बीच ब्राह्मण वोटबैंक की अहमियत कितनी?

  • साल 2022 में यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी ने 402 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 40 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे.
  • बीजेपी ने 68 ब्राह्मणों को टिकट दिए थे. ये किसी एक जाति को दिए गए सबसे अधिक टिकट थे.
  • साल 2007 में उसके सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मुले की तहत ब्राह्मणों ने मायावती की सरकार बना दी.
  • कांग्रेस तो एक समय प्रदेश में ब्राह्मणों की पार्टी मानी जाती रही. आजादी के बाद लंबे समय तक यूपी की सत्ता पर काबिज रही
  • कांग्रेस ने यूपी को पंडित गोविंद बल्लभ पंत ,कमलापति त्रिपाठी, हेमवतीनंदन बहुगुणा, नारायणदत्त तिवारी और श्रीपति मिश्र जैसे मुख्यमंत्री भी दिए

इससे साफ है कि दोनों पार्टियां ब्राह्मण वोटों को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं.यूपी की सियासत में भले ही ब्राह्मणों की ताकत सिर्फ 9 फीसदी वोट तक सिमटी हुई है, लेकिन ब्राह्मण समाज का प्रभाव इससे कहीं ज्यादा है और आंकड़े इसकी गवाही भी देते हैं. यूपी के करीब 60 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण निर्णायक भूमिका में हैं तो वहीं दर्जनभर जिले में इसकी आबादी 20 फीसदी भी ज्यादा है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। 2017 में यूपी के 312 बीजेपी विधायकों में से 58 ब्राह्मण उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. वहीं, 2022 की विधानसभा में यह संख्या 46 थी.

2017 और 2022 के चुनावों में कितने प्रतिशत ब्राह्मणों ने बीजेपी को वोट दिया?

  • सीएसडीएसलोकनीति के सर्वे के मुताबिक 2022 के विधानसभा चुनाव में 89 फीसदी ब्राह्मणों ने बीजेपी गठबंधन को वोट दिया.
  • इसी चुनाव में 6 फीसदी ब्राह्मणों ने समाजवादी पार्टी के गठबंधन को वोट दिया
  • 2017 में 83 फीसदी ब्राह्मणों ने बीजेपी गठबंधन के पक्ष में मतदान किया था.
  • इस दौरान 7 फीसदी ब्राह्मणों ने समाजवादी पार्टी के गठबंधन को वोट दिया था.

अखिलेश यादव क्यों और कैसे ब्राह्मणों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं?

इसका साफसाफ अर्थ यह है कि पिछले दोनों विधानसभाओं में बीजेपी को ब्राह्मण समाज का एकतरफा समर्थन मिला. ब्राह्मणों के साथ अन्य समुदाय के वोट मिल जाते है, तो यह तगड़ा वोटबैंक बन जाता है, जिसके बदौलत बीजेपी सत्ता तक पहुंची. यही वजह है अखिलेश यादव, ब्राह्मण वोटबैंक को बीजेपी से अलग करने की कवायद में लगे हुए हैं. इसके लिए समाजवादी पार्टी की तरफ से यूजीसी विवाद के बीच 19 अप्रैल 2026 को परशुराम जयंती भी मनाई गई.

ब्राह्मणों को साधने के लिए ही समाजवादी पार्टी की तरफ से विधानसभा चुनाव में माता प्रसाद पांडेय को आगे किया गया है. उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. साथ हीअखिलेश यादव अब अपनी PDA रणनीति को आगे बढ़ाते हुए इसमें ‘अगड़ा’ वर्ग को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. यही वजह है कि वह गोरखपुर के वरिष्ठ ब्राह्मण नेता रहे हरिशंकर तिवारी को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित समारोह में शामिल हुए थे. इसके अलावा उनके बेटे विनय शंकर तिवारी पर सरकार की कार्रवाई का भी जमकर विरोध करते रहे हैं. इसके अलावा गोरखपुर के तिवारी हाता के समर्थन पर सीएम योगी पर लगातार तंज कसते हुए योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी कहते रहे हैं.

बीजेपी सरकार से ब्राह्मण क्यों बताए जा रहे नाराज?

योगी सरकार पर लगातार ठाकुरवाद के आरोप लगे. इस बीच ब्राह्मण विधायकों ने अपनी एक अलग बैठक भी कर ली. इन सबके बीच बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी बीजेपी ब्राह्मण विधायकों को चेतावनी भी दे डाली. कहा जा रहा है कि इससे भी ब्राह्मण समाज के अंदर एक नाराजगी आई है. उनका तर्क है कि जब क्षत्रिय और कुर्मी विधायकों ने अपनी अलग बैठक की तो उन्हें कुछ नहीं कहा गया. फिर ब्राह्मण विधायकों के साथ ऐसा सलूक क्यों.

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इक्विटी विवाद ने पहली बार बीजेपी के इस सवर्ण वोट बैंक में असंतोष पैदा किया. उत्तर प्रदेश में इसका खास असर देखने को मिला. बरेली के एक मजिस्ट्रेट ने विरोध में इस्तीफा दे दिया और लखनऊ में बीजेपी के 10 से अधिक सदस्यों ने पार्टी छोड़ दी.यह केवल विपक्ष का प्रचार नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बीजेपी को ब्राह्मणों के समर्थन में दरार के रूप में देखा जा रहा है.

बीजेपी कैसे ब्राह्मणों को अपने पाले में ही रखने की कोशिश कर रही है?

1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के बाद बड़ी संख्या में ब्राह्मण मतदाता बीजेपी के साथ आए. अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र और बाद में कई अन्य नेताओं ने इस वर्ग में पार्टी की पकड़ मजबूत की. 2014 के बाद बीजेपी ने गैरयादव ओबीसी, गैरजाटव दलित और सवर्ण वोटों का व्यापक गठजोड़ बनाया. इसमें ब्राह्मण समाज महत्वपूर्ण स्तंभ रहा. आज भी बीजेपी का सवर्ण आधार काफी हद तक ब्राह्मण मतदाताओं पर निर्भर माना जाता है.

बीजेपी ने अपनी रणनीति बदली. प्रदेश के ब्राह्मण नेताओं और मंत्रियों के साथ मंथन किया, फीडबैक लिया और एक कमेटी बनाकर ब्राह्मणों को बीजेपी के पाले में फिर से लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई. यही वजह है अब जब बीजेपी को इस वोटबैंक में दरार दिखा तो ब्राह्मण चेहरे मनोज पांडे को कैबिनेट में जगह दी गई.

क्या कांग्रेस के बाद ब्राह्मणों को अपने पाले में करने का मौका है?

आजादी के बाद कई दशकों तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मजबूत सामाजिक आधार ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समुदायों पर टिका रहा. प्रदेश को कमलापति त्रिपाठी और हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे बड़े ब्राह्मण नेता दिए. हालांकि, 1989 के बाद मंडल और कमंडल की राजनीति ने राज्य का राजनीतिक समीकरण बदल दिया. कांग्रेस कमजोर होती गई और ब्राह्मण मतदाता धीरेधीरे दूसरी पार्टियों की ओर बढ़ने लगे. हालांकि, कांग्रेस के पास फिर से एक मौका है. बीजेपी के पास ब्राह्मणों का वोट बैंक खिसकता है तो कांग्रेस उनके लिए विकल्प साबित हो सकती है.

2007 में मायावती ने कैसे समझा दी थी ब्राह्मण वोटबैंक की अहमियत?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों की भूमिका की अहमियत साल 2007 के चुनाव में पहली बार नजर आई. बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने दलितब्राह्मण सामाजिक समीकरण तैयार किया. पार्टी के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा को ब्राह्मण चेहरा बनाया गया और पूरे प्रदेश में ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किए गए.इस रणनीति का नतीजा यह हुआ कि बीएसपी को बहुमत मिला, वह प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो गया. इसके बाद ही सभी दलों ने यह समझ लिया कि यदि ब्राह्मण मतदाता किसी दल के साथ बड़ी संख्या में जुड़ते हैं तो चुनावी तस्वीर बदल सकती है. यही वजह है कि बसपा ने सतीश चंद्र मिश्र को अब तक पार्टी का प्रमुख चेहरा बनाए रखा है.

सिर्फ संख्या नहीं, प्रभाव भी बड़ी वजह

राजनीति में केवल आबादी ही मायने नहीं रखती. यह भी देखा जाता है कि कोई समुदाय कितनी सीटों पर प्रभाव डाल सकता है. यूपी में ब्राह्मण समाज का वोट किसी एक जिले या क्षेत्र तक सीमित नहीं है. यही कारण है कि कोई भी पार्टी पूरे प्रदेश में चुनावी रणनीति बनाते समय इस वर्ग को नजरअंदाज नहीं कर सकती. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ब्राह्मण मतदाता अपेक्षाकृत अधिक स्विंग वोटर भी रहे हैं. वह परिस्थितियों, नेतृत्व और मुद्दों के आधार पर अपना रुख बदलते रहे हैं. हालांकि, केवल ब्राह्मण वोटों के सहारे सरकार नहीं बना सकता. लेकिन ब्राह्मण वोट कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. इसके अलावा ब्राह्मण समाज को लेकर यह भी कहा जाता है कि अन्य जातीय समुहों के भी वोट बैंक को प्रभावित करने की क्षमता रखता है.