सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही चारों ओर शिव भक्तों की गूंज सुनाई देने लगती है। मंदिरों में जल चढ़ाते शिवभक्त हों या फिर कांवड़ यात्रा पर निकले कांवड़िए। हर किसी की जुबान पर सिर्फ एक ही नाम ‘हर हर महादेव’ होता है। इस जयघोष के बिना यह पर्व अधूरा माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह जयघोष लोग क्यों करते हैं और इसकी शुरूआत कहां से हुई है।

पहली बार ‘हरहर महादेव’ का उत्घोष

पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था, तो उसमें से बेहद विषैला हलाहल विष निकला था। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इस विष की तपन से पूरी सृष्टि जलने लगी थी। संसार की रक्षा के लिए भगवान शंकर ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। भगवान शिव के इस त्याग से प्रसन्न होकर सभी ऋषियोंमुनियों और देवताओं ने आभार व्यक्त करने के लिए पहली बार ‘हर हर महादेव’ का जयघोष किया था।

इस जयघोष का अर्थ

‘हर हर महादेव’ सिर्फ एक जयकारा नहीं बल्कि भगवान शिव से जुड़ी अटूट श्रद्धा और विश्वाक का प्रतीक है। जबजब देवताओं पर कोई संकट आया था, या फिर कोई महान असुर सृष्टि पर अत्याचार करने लगा, तो लोगों ने मदद के लिए भगवान शिव का आह्वान किया। भोलेनाथ ने हमेशा आगे आकर अपने सभी भक्तों के सभी कष्टों और पापों का हरण किया था। यही वजह है कि संकट या परेशानी के समय शिव को याद करते हुए भक्त ‘हर हर महादेव’ का जयघोष करने लगे।

जयघोष करने से मिलती है ताकत

सावन के महीने में जब कांवड़िए पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल शिवधाम की तरफ बढ़ते हैं, तो ‘हर हर महादेव’ का जयघोष करते हैं। सैकड़ों किमी की थकान भरे सफर में यह मंत्र भक्तों के अंदर एक नई ऊर्जा, भक्ति और जोश का संचार करता है। माना जाता है कि इस जयघोष के उच्चारण मात्र से मन की घबराहट और शरीर की शारीरिक थकान मिट जाती है। इस कारण से सावन का पवित्र महीना इस पावन जयकारे के बिना अधूरा माना जाता है।
शिव मंत्र या ‘हर हर महादेव’ का नियमित जाप करने से शरीर में तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन कम होता है। इससे चिंता, डिप्रेशन और घबराहट दूर होता है और मन शांत होता है। वहीं दिमाग की याददाश्त और ध्यान लगाने की क्षमता बेहतर होती है। सरल शब्दों, यह जाप दिमाग को तनावमुक्त और तेज बनाने वाली एक नेचुरल थेरेपी है।