अब जबकि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के शासन के नौ वर्ष से अधिक व्यतीत हो चुके हैं तो इस बात की मीमांसा भी आवश्यक है कि आखिर जनता के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ क्या मायने रखते हैं? वे कौन से कारण हैं जो उन्हें पूर्ववर्ती शासकों से अलग पहचान देते हैं और उनके प्रति विश्वास का धरातल इतना मजबूत कैसे हुआ? उत्तर प्रदेश के लोगों ने वह समय भी देखा है जब दंगा, दलित उत्पीड़न, सनातन का अपमान और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण इस राज्य की पहचान थे और लोगों को किसी भी मंच पर न्याय की उम्मीद नहीं दिखाई देती थी.

लोग अब वर्तमान भी देख रहे हैं और उत्तर प्रदेश की बदलती आभा भी, जिसने उनका देशविदेश सभी जगह सम्मान बढ़ाया है. के प्रति भरोसे की इस धारणा को एक पंक्ति में कहा जाए तो हम कह सकते हैं कि उनके नेतृत्व में 2017 में सिर्फ सत्ता परिवर्तन ही नहीं हुआ, सुरक्षा, सुशासन, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और विकास एक ही सूत्र में पिरोए गए और यही उत्तर प्रदेश की नई पहचान के रूप में अब स्थापित है.
2017 के पहले के उत्तर प्रदेश के हालात
एक दृष्टि हम 2017 के पहले के उत्तर प्रदेश पर भी डालते हैं. उस समय जिस तरह से वोट की राजनीति चरम पर थी और इसके लिए जिस तरह से सांप्रदायिक तुष्टिकरण को तत्कालीन सरकार ने अपने एजेंडे में शामिल किया, वह एक तरह से राज्य को राजनीतिक गुलामी की ओर ले जाना था. दलितों का उत्पीड़न, अपराधियों और माफियाओं को संरक्षण, विकास की अनदेखी, जनता इन सबके दंश भुगत रही थी लेकिन विरोध का आत्मबल उनसे छीना जा चुका था. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 20142016 के बीच अनुसूचित जाति के विरुद्ध अपराधों में उत्तर प्रदेश देश में सबसे आगे था. दलित उत्पीड़न एक्ट तो इतना निष्प्रभावी था कि उसका कोई अर्थ ही नहीं रह गया था.
मुजफ्फरनगर का दंगा तो राज्य पर ऐसा कलंक है जो शायद ही कभी धोया जा सके. जाने कितने हिंदुओं का पलायन हुआ और जाने कितने लोगों की जमीनें दबंगों ने हथिय़ाई, लेकिन सरकार मूक दर्शक बनी रही. आक्रोश का लावा कभी न कभी फटता ही है और 2017 में लोगों ने इसे अपने मतों से अभिव्यक्त किया. प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से भाजपा को 312 सीटें. यह सिर्फ एक राजनीतिक दल को बहुमत ही नहीं था, अपने अपमान से आहत जनता का विद्रोह था.
सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी कवींद्र प्रताप सिंह
जनता की अपेक्षा को चुनौती माना
जब जनता किसी राजनीतिक दल को इस तरह शिरोधार्य करती है तो सरकार से अपेक्षाएं अत्यंत ही गहरी हो जाती हैं. मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ ने इस चुनौती को समझा ही नहीं, आत्मसात भी किया. पं. दीनदयाल उपाध्याय कहते थे कि जब तक शासन व्यवस्था अपनी सांस्कृतिक आत्मा से विमुख रहेगी, तब तक वह लोककल्याण का वास्तविक मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकती. राज्य को आखिरी पंक्ति में खड़े लोगों तक पहुंचना होगा.
इस अवधारणा को मुख्यमंत्री योगी ने अपने संकल्प में शामिल किया और ‘सुशासन’ को केवल एक प्रशासनिक शब्द ही नहीं, युगांतकारी संकल्प के रूप में आगे बढ़ाया. इसमें उन्होंने वीर सावरकर के विचारों को भी जोड़ा जो यह मानते थे कि शक्ति के बिना शांति की स्थापना असंभव है. योगी ने शक्ति को संकल्प में बदला और माफिया व अपराधियों के खिलाफ जीरो टालरेंस इसका उदाहरण है. कानून सबके लिए एक है, योगी का यह संदेश पूरे प्रदेश में गूंजा.
शपथ लेने के तत्काल बाद ताबड़तोड़ एक्शन
शपथ लेने के तत्काल बाद अवैध बूचड़खानों पर कार्रवाई ने वोट बैंक की राजनीति को पीछे धकेला तो एंटीरोमियो स्क्वाड के गठन ने बेटियों को निडर होकर घर से बाहर निकलने का आत्मबल दिया. माफिया के विरुद्ध अभियान तो शायद राज्य के इतिहास में दर्ज किया जाए. माफिया की कमर टूटने का अर्थ था संगठित अपराध का खात्मा. यानि अब राज्य में व्यापारियों को धमकाकर रंगदारी वसूलने की जुर्रत कोई नहीं करेगा.
जाहिर है कि यह सब एक दिन में नहीं हुआ, लेकिन नौ साल बीत जाने के बाद यदि हम राहत महसूस करते हैं तो यह भाव योगी को राज्य के लिए आवश्यक बनाता है. प्रदेश दंगों से मुक्त हुआ. प्रशासन को सीधा संदेश कि दंगाई किसी भी समुदाय के हों, कार्रवाई अनिवार्य है. मिशन शक्ति अभियान, महिला हेल्पलाइन, और पुलिस में महिला भर्ती ने उस वातावरण को बदलने की कोशिश की जहां बेटी का बाहर निकलना परिवार की चिंता का सबसे बड़ा कारण होता था.
यह कहने की बात नहीं कि निर्भीकता केवल कानून से नहीं आती, उस विश्वास से आती है कि शासन नागरिकों के पक्ष में है और इस सुरक्षित वातावरण ने निवेशकों के लिए जैसे रेड कारपेट बिछा दिया. ‘बीमारू’ राज्य में गिना जाने वाला उत्तर प्रदेश आज देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है. देश ही नहीं विदेश के निवेशक उत्तर प्रदेश आ रहे हैं और आने को आतुर हैं. गंगा एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और दिल्लीमेरठ एक्सप्रेसवे ने न केवल दूरियां घटाईं, बल्कि उन क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ा जो दशकों से उपेक्षित थे. जेवर में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण, उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की स्थापना, डेटा सेंटर नीति, यह नए उत्तर प्रदेश के नक्शे में शामिल हैं.
श्रीरामलला की प्राणप्रतिष्ठा से माहौल बदला
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बात किए बिना बात अधूरी रहेगी. काशी विश्वनाथ धाम कारिडोर, जिसका 2021 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकार्पण किया, धार्मिक पर्यटन की आर्थिक आभा में निखरकर सामने आया. फिर 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्रीरामलला की प्राणप्रतिष्ठा ने सनातनधर्मियों की सदियों की आस्था को प्रतिफल दिया. विकास और सांस्कृतिक गर्व का यह संगम योगी सरकार की वह विशिष्टता है, जो उसे पिछली सरकारों से अलग करता है.
लोगों के जेहन में उमड़ने वाले गूढ़ प्रश्नों का जवाब भी दिया जाना जरूरी है कि आखिर क्या एक व्यक्ति के चाह लेने से इतने परिवर्तन संभव हैं? उत्तर है हां, यह संभव है. जब राज्य के कर्मयोगी शासक को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा संबल व मार्गदर्शन मिल जाता है तो परिणाम आने में बहुत देर नहीं लगती. चूंकि योगी की सबसे बड़ी शक्ति उनकी निर्णय क्षमता है, इसलिए वह जटिल समस्याओं का समाधान भी सहजता से खोजते हैं. कोविड महामारी के दौरान योगी सरकार का प्रबंधन इसका प्रमाण है.
जनता ने दंगों के बदले शांति चुनी
उस समय की प्रशासनिक दक्षता को पूरे देश ने स्वीकार किया. फिर भी अभी बहुत लंबा सफर तय करना है. संतुलित दृष्टि के साथ ही आगे बढ़ना है. प्रदेश की जनता ने दंगों के बदले शांति चुनी है. माफिया नहीं, कानून चुना है. अपमान की जगह गर्व चुना है और इसीलिए योगी आदित्यनाथ को 2022 में भी बहुमत का जनादेश मिला. यह जनादेश इस सोच को था कि राज्य में अराजकता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. सांस्कृतिक आत्मसम्मान और आर्थिक विकास साथसाथ चल सकते हैं. आज जब लोग यह महसूस करते हैं कि सनातन परंपराएं गर्व का विषय हैं, लज्जा का नहीं, तो यह योगी सरकार के प्रति उनकी आत्मिक स्वीकारोक्ति है और इसीलिए यूपी में योगी सरकार होने के मायने अलग हैं, विशिष्ट हैं.



