करीब साढ़े चार साल तक देश के शिक्षा मंत्रालय की कमान संभालने वाले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा भेज दिया है. पिछले एक महीने से NEETUG 2026 पेपर लीक को लेकर देशभर में छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी था, जिसने दिल्ली के जंतरमंतर से लेकर कई राज्यों तक राजनीतिक माहौल गर्म रखा. अपने इस्तीफे में धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि वह छात्रों के भविष्य की रक्षा और देश की एकता बनाए रखने के लिए यह फैसला ले रहे हैं. हालांकि प्रधानमंत्री ने अभी उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है. उनके कार्यकाल में नई शिक्षा नीति लागू हुई.हालांकि, इसी दौरान कई ऐसे विवाद भी सामने आए, जिन्होंने सरकार और शिक्षा मंत्रालय दोनों को लगातार सवालों के घेरे में रखा.

इस्तीफा क्यों चर्चा में है?
शनिवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा भेज दिया. हाल के दिनों में NEETUG 2026 पेपर लीक को लेकर देशभर में छात्रों का आंदोलन तेज हो गया था. दिल्ली के जंतरमंतर समेत कई शहरों में प्रदर्शन हुए और सरकार से जवाब मांगा गया. आंदोलन कर रहे संगठनों ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी प्रमुख मांग बनाया था. सोशल मीडिया पर जारी अपने पत्र में प्रधान ने कहा कि वह छात्रों के हित, राष्ट्रीय एकता और मौजूदा हालात को देखते हुए पद छोड़ रहे हैं. फिलहाल उनके इस्तीफे पर अंतिम फैसला प्रधानमंत्री की ओर से आना बाकी है.
शपथ के दिन ही क्यों घिरे थे?
जून 2024 में जब 18वीं लोकसभा के गठन के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने मंत्री पद की शपथ ली, तभी विपक्ष ने उन्हें घेर लिया. संसद में विपक्षी सांसदों ने ‘नीट’ और ‘ShameShame’ के नारे लगाए. उस समय NEETUG 2024 में कथित पेपर लीक और ग्रेस मार्क्स को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन चल रहे थे. विपक्ष लगातार सरकार से जवाब मांग रहा था और मामले पर संसद में चर्चा की मांग कर रहा था. शपथ ग्रहण का यह विरोध उनके दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही विवादों का संकेत बन गया.
NEET पेपर लीक सबसे बड़ा संकट क्यों बना?
धर्मेंद्र प्रधान के पूरे कार्यकाल में सबसे बड़ा विवाद NEET परीक्षा को लेकर रहा. 2024 में बिहार समेत कई राज्यों से पेपर लीक और अनियमितताओं के आरोप लगे. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, CBI जांच हुई और NTA के शीर्ष स्तर पर बदलाव भी देखने को मिले. इसके बाद 2026 में भी 3 मई को हुई NEETUG परीक्षा पेपर लीक के आरोपों के बाद 12 मई को रद्द करनी पड़ी. राजस्थान के कोचिंग सेंटरों से जुड़े कथित लीक के बाद 21 जून को दोबारा परीक्षा कराई गई. इस पूरे घटनाक्रम ने लाखों छात्रों को प्रभावित किया और शिक्षा मंत्रालय पर लगातार सवाल उठे.
UGCNET रद्द होने से क्यों बढ़ा विवाद?
NEET विवाद के बीच जून 2024 में एक और बड़ा झटका तब लगा, जब UGCNET परीक्षा आयोजित होने के सिर्फ एक दिन बाद ही रद्द कर दी गई. जांच एजेंसियों को जानकारी मिली थी कि प्रश्नपत्र टेलीग्राम और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए लीक हुआ है. इसके बाद शिक्षा मंत्रालय ने परीक्षा रद्द कर CBI जांच के आदेश दिए. लगातार दो राष्ट्रीय परीक्षाओं में गड़बड़ी सामने आने से छात्रों का भरोसा हिल गया और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी NTA की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे.
NTA लगातार सवालों के घेरे में क्यों रही?
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में NTA पर तकनीकी गड़बड़ियों, डेटा सुरक्षा, गलत मूल्यांकन और आउटसोर्सिंग जैसे कई आरोप लगे. NEET, JEE, CUET और NET जैसी बड़ी परीक्षाएं कराने वाली इस एजेंसी की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष और विशेषज्ञ लगातार सवाल उठाते रहे. सुधार के लिए इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में समिति भी बनाई गई, लेकिन विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुए. कई अधिकारियों के तबादले और नेतृत्व में बदलाव के बावजूद परीक्षा प्रणाली को लेकर बहस जारी रही.
CBSE और मूल्यांकन पर क्या हुआ?
साल 2026 में CBSE ने 12वीं बोर्ड परीक्षा की कॉपियों के मूल्यांकन के लिए ऑनस्क्रीन मार्किंग प्रणाली लागू की. लेकिन इसके बाद स्कैनिंग की खराब गुणवत्ता, तकनीकी दिक्कतों और मूल्यांकन में गड़बड़ियों की शिकायतें सामने आईं. छात्रों और शिक्षकों ने विरोध जताया. जानकारी सामने आई कि जनवरी 2026 की ट्रायल रिपोर्ट में कई तकनीकी खामियां पहले ही बताई गई थीं, लेकिन उन्हें समय रहते दूर नहीं किया गया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। विवाद बढ़ने पर कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का तबादला हुआ और मामले की जांच के लिए समिति बनाई गई.
PM SHRI और भाषा विवाद क्यों बढ़ा?
प्रधान के कार्यकाल में नई शिक्षा नीति के तहत शुरू हुई PM SHRI स्कूल योजना भी विवादों में रही. तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे राज्यों ने केंद्र के साथ समझौता करने में देरी की या विरोध जताया. इन राज्यों का आरोप था कि केंद्र सरकार शिक्षा फंड को नई शिक्षा नीति से जोड़ रही है. इसी दौरान तीनभाषा फॉर्मूले को लेकर भी बड़ा विवाद खड़ा हुआ. खासकर तमिलनाडु ने हिंदी थोपने का आरोपलगाया, जबकि धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि यह नीति मातृभाषा और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है.
NCERT और UGC नियमों पर क्यों मचा बवाल?
NCERT की किताबों से मुगल इतिहास, 2002 गुजरात दंगों, शीत युद्ध और लोकतांत्रिक आंदोलनों से जुड़े कुछ हिस्से हटाने के फैसले पर भी सरकार को आलोचना झेलनी पड़ी. विपक्ष और कई शिक्षाविदों ने इसे इतिहास बदलने की कोशिश बताया. वहीं जनवरी 2025 में UGC ने कुलपति नियुक्ति के नए मसौदा नियम जारी किए, जिसमें गैरशैक्षणिक और उद्योग जगत के लोगों को भी कुलपति बनने की पात्रता देने का प्रस्ताव था. कई राज्यों और विश्वविद्यालयों ने इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और संघीय ढांचे पर असर डालने वाला कदम बताया.
आखिरी विवाद कौन सा बना?
साल 2026 की शुरुआत में UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातीय भेदभाव रोकने के लिए नए ‘इक्विटी रेगुलेशन’ जारी किए. इन नियमों के तहत विशेष समितियां बनाने और SC, ST तथा OBC वर्ग से जुड़े प्रावधान शामिल किए गए. हालांकि कई संगठनों ने इनके दुरुपयोग और सामाजिक विभाजन की आशंका जताई. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने जनवरी 2026 में इन नियमों के लागू होने पर रोक लगा दी और फिलहाल 2012 के पुराने नियमों को जारी रखने का आदेश दिया. इसी तरह लगातार विवादों ने धर्मेंद्र प्रधान के पूरे कार्यकाल को राजनीतिक और शैक्षणिक बहस का केंद्र बनाए रखा.



