इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच मुकदमों की सुनवाई टालने और बिना उचित कारण कोर्ट में मौजूद न रहने की प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर की है. कोर्ट ने कहा कि यह वकालत के पेशे की गरिमा के खिलाफ है.कोर्ट ने कहा कि कुछ मामलों में जानबूझकर सुनवाई को आगे बढ़ाने की कोशिश की जाती है. इससे लंबित मुकदमों का बोझ वास्तविक कारणों के बजाय कृत्रिम रूप से बढ़ता है, जिससे न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया प्रभावित होती है.

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने यह टिप्पणी श्रावस्ती के एससीएसटी एक्ट से जुड़े एक आपराधिक मामले में फैसला सुनाते हुए की. बेंच ने कहा ‘निचली अदालतों या न्यायाधिकरण में व्यस्त होने के कारण बारबार सुनवाई टालना और बिना कोई कारण बताए पेश न होना, वकीलों की पेशेवर ज़िम्मेदारियों के प्रति सम्मान की कमी और अदालत के प्रति सम्मान की कमी को दिखाता है. यह वकालत के पेशे में गिरते स्तर को भी उजागर करता है’.

‘मामूली कारणों से सुनवाई टालने की मांग न करें’

जस्टिस विद्यार्थी ने कहा ‘इसलिए बेंच बार के सदस्यों से अनुरोध करता है कि वे हाईकोर्ट के ज़िम्मेदार अधिकारियों के तौर पर अपनी भूमिका के महत्व को समझें, अपनी मदद के स्तर को बेहतर बनाएं और बेतुके या मामूली कारणों से सुनवाई टालने की मांग न करें, क्योंकि इससे बेंचकी उत्पादकता कम होती है और तेज़ी से न्याय मिलने में बाधा आती है’.

‘सुनवाई जानबूझकर नहीं होने दी जाती’

उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में नए मामलों की सुनवाई जानबूझकर नहीं होने दी जाती ताकि वो बिना किसी असरदार आदेश के लंबित रहें, जिससे हाई कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या में कृत्रिम बढ़ोतरी होती है. उन्होंने यह भी कहा कि निचली अदालतें अक्सर सिर्फ़ इसलिए कार्यवाही टाल देती हैं क्योंकि मामला हाई कोर्ट में लंबित है, भले ही कोई अंतरिम आदेश पारित न किया गया हो, जिससे न्याय मिलने में देरी होती है.

कोर्ट ने अपील की खारिज

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने ये टिप्पणियां श्रावस्ती के अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम मामले से जुड़ी एक अपील को खारिज करते हुए कीं. उन्होंने श्रावस्ती के विशेष न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत अंकित यादव को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर बुलाने की अर्ज़ी खारिज कर दी थी.

2022 में दर्ज केस से जुड़ा था मामला

यह मामला 2022 में दर्ज एक मुकदमे से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राम सुरेश यादव और उनके बेटे अंकित यादव ने शिकायतकर्ता और उनके बेटे के साथ मारपीट की और उन्हें जातिआधारित गालियां दीं.

जांच के बाद पुलिस ने केवल राम सुरेश यादव के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करते हुए कहा कि अंकित यादव के खिलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं हैं. मुकदमे के दौरान, अपीलकर्ता ने CRPC की धारा 319 के तहत अंकित यादव को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर बुलाने के लिए एक अर्ज़ी दाखिल की थी.

सबूतों की जांच के बाद, SC/ST मामलों की विशेष अदालत ने पाया कि घायल चश्मदीद गवाह ने साफ़ तौर पर कहा था कि घटना वाली जगह पर राम सुरेश यादव के अलावा कोई और मौजूद नहीं था. अपील करने वाले ने भी अंकित यादव की कोई खास भूमिका नहीं बताई थी. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इन तथ्यों के आधार पर विशेष अदालत ने अर्ज़ी खारिज कर दी जिसके बाद यह अपील दायर की गई.

हाईकोर्ट ने खारिज की अपील

अपील को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने कहा कि CRPC की धारा 319 के तहत मिली शक्ति असाधारण है और इसका इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब सिर्फ़ शुरुआती मामले से ज़्यादा मज़बूत सबूत हों.बेंच ने कहा कि इस मामले में अंकित यादव को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर बुलाने को सही ठहराने के लिए कोई ठोस सबूत या सामग्री मौजूद नहीं थी. इसलिए बेंच को विशेष अदालत के आदेश में ऐसी कोई कमी नहीं मिली जिसके लिए अपील के स्तर पर दखल देने की ज़रूरत हो.