भुवनेश्वर: दिल्ली में जंतरमंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी की प्रमुख मांग है कि नीट परीक्षा का पेपर लीक होने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की इस्तीफा दें। सीजेपी के संसद मार्च के बाद भी ऐसी स्थिति नहीं दिख रही है कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अगुवाई वाली सरकारों में ऐसा कम ही हुआ है कि आंदोलन और विपक्ष की मांग पर किसी मंत्री ने पद छोड़ा हो। गुजरात से दिल्ली तक के सफर में पीएम मोदी ने अपने हिसाब से फैसले ले आए हैं, हालांकि इसके बाद भी सवाल उठा रहा है कि सरकार क्यों इतने बड़े प्रदर्शन के बाद सरकार बहुत ज्यादा चिंतित भी नहीं दिख रही है।

शीर्ष सात मंत्रियों में हैं धर्मेंद्र प्रधान

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद धर्मेंद्र प्रधान उन सात मंत्रियों में शामिल हैं। जो लगातार तीसरे कार्यकाल में सरकार का हिस्सा हैं। इनमें राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल, राव इंद्रजीत सिंह और डॉ. जितेंद्र सिंह का नाम शामिल है। गृह मंत्री अमित शाह और एस. एस जयशंकर भी धर्मेंद्र प्रधान समेत सात नेताओं से बाद में मोदी सरकार का हिस्सा बने हैं। वे अब तक कई अहम विभाग संभाल चुके हैं।

12 साल से मंत्री हैं धर्मेंद्र प्रधान
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री: 2014 2021
कौशल विकास और उद्यमिता मंत्री: 2017 2024
इस्पात मंत्री: 2019 2021
शिक्षा मंत्री: 2021 से अब तक

मोदी सरकार में शिक्षा मंत्रियों का कार्यकाल
स्मृति ईरानी 2 साल 36 दिन
प्रकाश जावडेकर 2 साल, 329 दिन
रमेश पोखरियाल 2 साल, 38 दिन
धर्मेंद्र प्रधान 5 साल, 13 दिन

आगे तोड़ेंगे मुरली मनोहर जोशी का रिकाॅर्ड

अगर धर्मेंद्र प्रधान कुछ और वक्त तक शिक्षा मंत्री रहते हैं तो वह जल्द ही डॉ. मुरली मनोहर जोशी का रिकॉर्ड तोड़ देंगे। मुरली मनोहर जोशी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में लगभग 6 वर्ष 2 महीने तक इस पद पर रहे। मुरली मनोहर जोशी को क्रॉस करने के बाद उनसे आगे मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, अर्जुन सिंह, के एल श्रीमाली रह जाएंगे। अर्जुन सिंह ने दो कार्यकाल को मिलकर कुल आठ साल 183 दिन शिक्षा मंत्री रहे जबकि श्रीमाली पांच साल 280 दिन। श्रीमाल का रिकॉर्ड भी प्रधान अगले महीने में तोड़ देंगे।

इस्तीफा नहीं होने के पांच कारण

अब बात धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की। कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट के बीच पेपर लीक के लिए इस्तीफा मांगा जा रहा है लेकिन सरकार ने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया कि उनका इस्तीफा होगा। इसकी बड़ी वजह है कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में क्रेडिबिलिटी की कमी और जोश अधिक है। सरकार को अपने आंकलन में उतना कोई बड़ा नुकसान होता नहीं दिख रहा है। मॉनसून सत्र जरूर चल रहा है लेकिन कोई चुनाव सिर पर नहीं है। तीसरी बात यह है कि पीएम मोदी की सरकार में हर मंत्री के कामकाज पर पीएमओ की सीधी नजर रहती है। अगर धर्मेंद्र प्रधान सही परफॉर्म नहीं कर रहे थे तो शायद ही 12 साल लगातर टिक पाते।

जिस नीट यूजी परीक्षा के पेपर लीक को आधार बनाकर धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगा जा रहा है। वह परीक्षा हो चुकी है। रिजल्ट भी आ चुका है l मुझे लगता है अंग्रेजकांग्रेस के जमाने से जो गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा था उसमें शिक्षा मंत्री बदलाव कर रहे हैं। इसलिए वामपंथी संगठन अधिक नाराज हैं। इस्तीफे और विरोध की बड़ी वजह भी यही लगती है। कॉकरोच जनता पार्टी की क्रेडिबिलिटी कम है, फिर उन्होंने अपने आंदोलन का राजनीतिकरण भी होने दिया।

ऐसे में चर्चा है कि उनका प्रदर्शन सरकार की अगुवाई करते पीएम मोदी और अमित शाह की नजर में ठीक है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। चौथी बात है कि कॉकरोच जनता पार्टी जिसके प्रदर्शन को ‘Gen Z प्रोटेस्ट’ कहा जा रहा है उसकी मांगें ठीक नहीं है। वे इस्तीफा मांग रहे है कि लेकिन अल्टरनेट नहीं बता पा रहे हैं। आखिर क्या होना चाहिए? 20 जुलाई को पहली बार उन्होंने लिखित में पहली बार कुछ जेपी नड्‌डा को सौंपा। यह मात्र संयोग है कि जिन धर्मेंद्र प्रधान ने जुलाई में केंद्रीय शिक्षा मंत्री का पद संभाला था। उनके इस्तीफे की मांग को लेकर जुलाई महीने में दिल्ली अशांत है। मॉनसून सत्र में सदन नहीं चल पा रहा है।

प्रधान की सबसे बड़ी मजबूती

पांचवीं और अहम बात यह है कि धर्मेंद्र प्रधान कोई आयातित नेता नहीं है। वे एबीवीपी से बीजेपी में आए हैं। भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के अध्यक्ष रहे हैं। अगर उनका इस्तीफा होता है तो पीएम मोदी के अब तक कार्यकाल में पहली बार विपक्ष या कॉकरोच जनता पार्टी को समर्थन देने वाले दलों को मनोवैज्ञानिक लाभ मिलेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है अगर धर्मेंद्र प्रधान का मंत्रालय चेंज हुआ या इस्तीफा तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, एबीवीपी, बीजेपी और पीएम मोदी के लिए असहज स्थिति का निर्माण होगा। इसके अलावा एक और दलील दी जा रही है कि उन्होंने पाठ्यक्रम में जिस तरह से आरएसएस की मर्जी के अनकूल बदलाव किए हैं, वह भी उनके विरोध का एक बड़ा कारण है। अब मुगल शासक ‘अकबर द ग्रेट’ पाठ्यक्रम में नहीं है बल्कि आपातकाल पढ़ाया जा रहा है।