उत्तर प्रदेश में कानून की रक्षा करने वाले ही कानून के कठघरे में खड़े हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य में वकालत पेशे की स्थिति पर बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि वकालत की आड़ में गैंगस्टर, माफिया और आपराधिक तत्व सक्रिय हैं. कोर्ट ने यह टिप्पणी कफील खान बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले की सुनवाई के दौरान की. सुनवाई में पेश आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश के 4,157 अधिवक्ता 5,056 आपराधिक मामलों में आरोपी हैं. इनमें कई ऐसे वकील भी हैं जिन पर दर्जनों मुकदमे लंबित हैं, लेकिन वे अब भी अदालतों में प्रैक्टिस कर रहे हैं.

आखिर क्या है पूरा मामला?
यह मामला डॉ. कफील खान बनाम उत्तर प्रदेश सरकार से जुड़ा है. सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में अधिवक्ताओं के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का ब्योरा तलब किया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। पेश आंकड़ों में सामने आया कि उत्तर प्रदेश के 4,157 वकील 5,056 आपराधिक मामलों में आरोपी हैं. इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि कुछ लोग वकालत की आड़ में गैंगस्टर और माफिया की तरह काम कर रहे हैं. अदालत ने बार काउंसिल की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और आपराधिक मामलों में फंसे वकीलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए.
वकालत को बना लिया “सुरक्षित शरण”: अदालत
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश की बार एसोसिएशन और बार काउंसिल वर्षों से ऐसे अधिवक्ताओं पर प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रही हैं. अदालत ने टिप्पणी की कि कुछ लोगों ने वकालत को “सुरक्षित शरण” बना लिया है और राजनीतिक संरक्षण और दबाव समूहों के कारण जिला अदालतों के न्यायाधीश भी उनके खिलाफ कार्रवाई करने से बचते हैं.
4,157 वकीलों पर 5,056 आपराधिक मामले
हाईकोर्ट के सामने पेश आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में कुल 4,157 अधिवक्ता 5,056 आपराधिक मामलों में शामिल हैं. इनमें 418 वकीलों पर तीन या उससे अधिक मुकदमे दर्ज हैं. 28 अधिवक्ताओं पर 11 या उससे ज्यादा मामले, 126 पर पांच से दस मामले और 264 वकीलों पर तीन से चार आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं. कोर्ट ने इसे न्याय व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि कुछ अधिवक्ताओं के खिलाफ 46 तक आपराधिक मामले दर्ज हैं, लेकिन उन्हें अब भी अदालतों में वकालत करने की अनुमति मिली हुई है.
| जोन/कमिश्नरेट | आपराधिक मामलों में शामिल अधिवक्ता | कुल आपराधिक मामले |
| आगरा जोन | 138 | 249 |
| प्रयागराज जोन | 127 | 184 |
| मेरठ जोन | 118 | 201 |
| गोरखपुर जोन | 359 | 476 |
| कानपुर जोन | 191 | 333 |
| बरेली जोन | 534 | 762 |
| वाराणसी जोन | 300 | 364 |
| लखनऊ जोन | 301 | 444 |
| प्रयागराज कमिश्नरेट | 226 | 350 |
| आगरा कमिश्नरेट | 32 | 50 |
| गाजियाबाद कमिश्नरेट | 168 | 79 |
| कानपुर नगर कमिश्नरेट | 323 | 460 |
| लखनऊ कमिश्नरेट | 917 | 586 |
| वाराणसी कमिश्नरेट | 403 | 500 |
| गौतम बुद्ध नगर कमिश्नरेट | 18 | 16 |
| जीआरपी | 2 | 2 |
| कुल | 4,157 | 5,056 |
सोर्स barandbench
लखनऊ सबसे आगे, कई जोन में सैकड़ों वकील आरोपी
कोर्ट के रिकॉर्ड में शामिल आंकड़ों के मुताबिक सबसे अधिक मामले लखनऊ पुलिस कमिश्नरेट में सामने आए. यहां 917 अधिवक्ताओं के खिलाफ 586 मामले दर्ज हैं. वहीं बरेली जोन में 534 वकीलों पर 762, वाराणसी कमिश्नरेट में 403 वकीलों पर 500, गोरखपुर जोन में 359 वकीलों पर 476 और कानपुर नगर कमिश्नरेट में 323 वकीलों पर 460 मामले दर्ज हैं. अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि अकेले लखनऊ के वजीरगंज थाने में 422 अधिवक्ताओं के खिलाफ 236 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है.
‘वकालत की आड़ में गैंगस्टर बन रहे हैं’
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में कानूनी पेशे में ऐसे लोग घुसपैठ कर चुके हैं जो कानून के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत हैं. अदालत के अनुसार, जिला अदालतों में कानून की पढ़ाई कर चुके संगठित गिरोह सक्रिय हैं, जो कोर्ट के आदेश लागू कराने, जमीन और मकान खाली कराने तथा विवाद सुलझाने के नाम पर दबाव और धमकी का सहारा लेते हैं. कोर्ट ने कहा कि ऐसे माहौल में नए अधिवक्ता और नए न्यायिक अधिकारी निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से काम करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं.
बार काउंसिल की भूमिका पर सवाल
अदालत ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि प्रदेश में अधिवक्ताओं के सत्यापन अभियान के दौरान केवल 105 फर्जी डिग्रीधारी वकीलों की पहचान होना वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता. इतने बड़े अधिवक्ता समुदाय में यह संख्या बेहद कम प्रतीत होती है. कोर्ट ने माना कि बार काउंसिल अपने नियामक दायित्वों का प्रभावी तरीके से निर्वहन करने में विफल रही है, जिसके कारण आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को भी वकालत करने का अवसर मिलता रहा.
हाईकोर्ट के सख्त निर्देश
- मामले की गंभीरता को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं.
- किसी भी अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई उसके गृह जिले से कम से कम 100 किलोमीटर दूर स्थित दूसरे जिले की अदालत में स्थानांतरित की जाए.
- फर्जी डिग्री वाले 105 अधिवक्ताओं के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और अन्य संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज की जाए.
- गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल अधिवक्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर उनके लाइसेंस निलंबित करने पर विचार किया जाए.
- प्रदेश के 5.37 लाख पंजीकृत अधिवक्ताओं का ऑडिट कराया जाए, ताकि फर्जी नामांकन और “घोस्ट एडवोकेट्स” की पहचान हो सके.
- जिन 2.6 लाख अधिवक्ताओं ने अब तक प्रैक्टिस प्रमाणपत्र नहीं लिया है, उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर उनका नामांकन समीक्षा के दायरे में लाया जाए.
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया से नियमों में संशोधन कर पुलिस वेरिफिकेशन को अधिवक्ता के नामांकन के लिए अनिवार्य करने की सिफारिश की जाए.
‘कानून दो बार मरता है’
अपने आदेश की शुरुआत में ही न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा, “कानून दो बार मरता है. पहली बार तब, जब उसके संरक्षक ही अपराधी बन जाते हैं और दूसरी बार तब, जब न्यायाधीश चुप्पी साध लेते हैं. दोनों ही स्थितियों में कानून का शासन सबसे बड़ा शिकार बनता है.”
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल कुछ अधिवक्ताओं के आचरण पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था, बार काउंसिल और वकालत पेशे की विश्वसनीयता पर भी गंभीर चिंता व्यक्त करती है. अदालत के निर्देशों के बाद अब नजर इस बात पर रहेगी कि राज्य सरकार, बार काउंसिल और संबंधित संस्थाएं इन आदेशों को किस तरह लागू करती हैं.



