दिल्ली में जून और जुलाई की शुरुआत के बीच मौसम ने कई रंग दिखाए. कहीं तेज धूप और लू रही. कहीं उमस बढ़ी. कई इलाकों में धूल भरी आंधी चली. कुछ जगह हल्की बारिश हुई, लेकिन लगातार और व्यापक बारिश का इंतजार अभी भी बना हुआ है. 30 दिनों के मौसम पैटर्न से साफ है कि दिल्ली में गर्मी तुरंत खत्म नहीं हुई. मानसून की दस्तक के बाद भी मौसम पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ. गर्म, शुष्क हवा और नमी वाली हवा के टकराव ने आंधी, गरज और छिटपुट बारिश की स्थितियां बनाईं. आइए, इस पूरे मसले को समझने का प्रयास करते हैं.

जून के अंत तक दिल्लीएनसीआर में अधिकतम तापमान कई दिनों तक 40 डिग्री सेल्सियस या उससे ऊपर बना रहा. तेज धूप ने जमीन को बहुत गर्म कर दिया. रात के तापमान में भी पर्याप्त गिरावट नहीं हुई. इससे लोगों को दिन और रात, दोनों समय गर्मी महसूस हुई. लू की स्थिति तब बनती है, जब अधिकतम तापमान सामान्य से काफी ऊपर चला जाए और गर्म, शुष्क हवाएं चलें.
उत्तरपश्चिम भारत के कई हिस्सों में ऐसी ही परिस्थितियां बनी रहीं. दिल्ली पर राजस्थान और आसपास के शुष्क इलाकों से आने वाली गर्म हवाओं का असर पड़ा. बारिश की कमी ने इस समस्या को और बढ़ाया. जब जमीन सूखी रहती है, तो वह सूरज की गर्मी तेजी से सोखती है. इसके बाद आसपास की हवा भी ज्यादा गर्म हो जाती है. शहरों में कंक्रीट, सड़कें, वाहन और इमारतें गर्मी को लंबे समय तक रोकती हैं. इसे शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव भी कहा जाता है.
जून में हीटवेव ने परेशान किया. फोटो: PTI
मानसून आया, फिर भी राहत पूरी क्यों नहीं मिली?
मानसून का किसी शहर में पहुंचना और उसका लगातार सक्रिय रहना, दो अलग बातें हैं. दिल्ली में मानसून की अनुकूल परिस्थितियां बनने के बाद भी शुरुआत में बारिश हर इलाके में एक जैसी नहीं हुई. कहीं बादल आए, तेज हवा चली और कुछ बूंदें पड़ीं. कहीं गरज के साथ बारिश हुई, लेकिन कई जगह मौसम फिर गर्म और उमस भरा हो गया.
दक्षिणपश्चिम मानसून नमी लेकर आता है. पर दिल्ली तक पहुंचने से पहले उसकी गति, हवा की दिशा और दबाव तंत्र बहुत मायने रखते हैं. यदि नमी वाली हवाएं कमजोर पड़ जाएं या पश्चिम से गर्म व शुष्क हवा बनी रहे, तो बारिश का दायरा सीमित रह जाता है. ऐसे समय में बादल दिखते तो हैं, लेकिन लगातार वर्षा नहीं होती. मौसम की कई रिपोर्ट्स में जून के अंतिम दिनों में दिल्लीएनसीआर के लिए आंशिक बादल, तेज हवाएं, धूल भरी आंधी और हल्की बारिश की संभावना बताई गई थी. मानसून के अगले कुछ दिनों में अधिक सक्रिय होने का अनुमान दिया गया था, पर असल में ऐसा कुछ ठोस नहीं दिखाई दिया.
मानसून से राहत नहीं मिली. फोटो: PTI
धूलआंधी का कारण क्या है?
धूलआंधी के लिए तीन चीजें जरूरी होती हैं. पहली, सूखी और ढीली मिट्टी. दूसरी, तेज गर्मी. तीसरी, हवा की तेज रफ्तार. जून के अंत में दिल्ली और इसके आसपास के मैदानी क्षेत्रों में ये तीनों स्थितियां मौजूद थीं. दिन में जमीन बहुत गर्म हुई. गर्म हवा ऊपर उठी. दूसरी तरफ, कुछ ऊंचाई पर ठंडी या नमी वाली हवा पहुंची. इस अंतर से वातावरण अस्थिर हुआ. जब तेज हवा नीचे की ओर आई, तो उसने जमीन की धूल को ऊपर उड़ा दिया. यही धूलआंधी बनकर हमारे सामने आई. राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी क्षेत्रों की शुष्क भूमि भी दिल्ली की हवा को प्रभावित करती है. तेज पश्चिमी या दक्षिणपश्चिमी हवाएं धूल के कणों को दिल्लीएनसीआर तक ला सकती हैं. निर्माण कार्य, खुली मिट्टी, खराब सड़क किनारे और खाली प्लॉट स्थानीय धूल को भी बढ़ाते हैं. धूलआंधी के दौरान दृश्यता घट जाती है. आंखों में जलन हो सकती है. सांस लेने में परेशानी बढ़ती है. दमा, एलर्जी और फेफड़ों की बीमारी वाले लोगों को अधिक सावधानी की जरूरत होती है.
दिल्ली का हाल.
आंधी, बिजली और बारिश का साथ कैसे बनता है?
गर्मियों के अंत और मानसून की शुरुआत में दिल्ली में स्थानीय स्तर के तूफानी बादल बनना आम है. इन्हें संवहनीय बादल कहा जाता है. तेज गर्मी से जमीन के पास की हवा ऊपर उठती है. यदि उसे पर्याप्त नमी मिल जाए, तो बड़े बादल बनते हैं. ये बादल गरज, बिजली, तेज हवा और अचानक बारिश ला सकते हैं. कई बार तेज आंधी के बाद कुछ मिनट या घंटे की बारिश होती है. इससे तापमान थोड़ी देर के लिए नीचे आता है, लेकिन यदि बारिश कम हो और नमी ज्यादा हो, तो बाद में उमस बढ़ जाती है. इसलिए लोगों को लगता है कि बारिश के बावजूद गर्मी कम नहीं हुई. 30 जून के आसपास दिल्ली में धूल भरी आंधी और तेज हवा के साथ छिटपुट बूंदाबांदी की संभावना बताई गई थी. पर, ऐसा कुछ खास दिखा नहीं.
30 दिन का पैटर्न क्या बताता है?
जून के आखिरी सप्ताह और जुलाई के आरंभ का पैटर्न एक संक्रमण काल दिखाता है. शुरुआत में गर्मी तेज रही. अधिकतम तापमान ऊंचा रहा. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसके बाद बादल और नमी बढ़ने लगी. कुछ जगहों पर तेज हवा, आंधी और बारिश हुई. फिर धीरेधीरे बारिश वाले दिनों की संभावना बढ़ी. दिल्ली में जुलाई आमतौर पर मानसूनी महीना माना जाता है. इस महीने में तापमान जून की तुलना में कुछ कम होता है, लेकिन नमी ज्यादा रहती है. जलवायु आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में दिल्ली का औसत अधिकतम तापमान लगभग 33 से 34 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है और वर्षा की मात्रा भी बढ़ जाती है. हालांकि, हर साल बारिश का वितरण अलग होता है. पूरे महीने की सामान्य बारिश अच्छी हो सकती है, लेकिन वह कुछ दिनों में केंद्रित भी हो सकती है. इसलिए मानसून आ गया का अर्थ यह नहीं कि हर दिन बारिश होगी या गर्मी तुरंत खत्म हो जाएगी.
लोगों के लिए क्या सावधानी जरूरी है?
लू के दौरान दोपहर में बाहर निकलने से बचना चाहिए. पानी, ओआरएस, नींबू पानी या छाछ जैसे तरल लेते रहें. हल्के रंग के ढीले कपड़े पहनें. बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों पर खास ध्यान दें. धूलआंधी आने पर खिड़कीदरवाजे बंद रखें. बाहर हों तो आंखों और नाक को कपड़े या मास्क से ढकें. पेड़, बिजली के खंभे और अस्थायी ढांचों से दूर रहें. वाहन चलाते समय गति कम रखें, क्योंकि दृश्यता अचानक घट सकती है. गरज और बिजली के समय खुले मैदान, छत और पेड़ के नीचे खड़े न हों. मौसम विभाग की चेतावनियों को नियमित देखें. दिल्ली में मौसम के तेज बदलावों के बीच यही सबसे उपयोगी तैयारी है.
दिल्ली का 30 दिनों का मौसम पैटर्न बताता है कि लू, धूलआंधी और मानसून की शुरुआती बारिश एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. शुष्क और गर्म जमीन लू तथा धूलआंधी को बढ़ाती है. नमी पहुंचते ही आंधी, बिजली और स्थानीय बारिश की स्थितियां बनती हैं, लेकिन मानसून के स्थिर होने तक गर्मी और उमस का दौर चलता रह सकता है. यही कारण है कि दिल्ली में एक ही सप्ताह में तेज लू, धूल भरी आंधी, बादल, बारिश और उमस देखने को मिलती है. यह बदलाव असामान्य नहीं है, लेकिन बढ़ती शहरी गर्मी और मौसम की अनिश्चितता इसे लोगों के लिए ज्यादा कठिन जरूर बना रही है.



