दिल्ली के चावड़ी बाजार की एक कोठे वाली लड़की. महज 1415 साल की. लेकिन वह सिर्फ दरबारों में नाचनेगाने वाली लड़की बनकर नहीं रह गई. उसने बंदूक और तोपों के बीच अपनी जगह बनाई. हौसले और जज़्बे की बदौलत फौज की कमान संभाली. मुगल बादशाह की दोस्ती हासिल की. फिर एक दिन ऐसा भी आया जब कमजोर पड़ा दिल्ली का बादशाह अपनी सल्तनत बचाने के लिए उसी औरत की मदद का तलबगार था. यह कहानी है फरजाना की, जिसे दुनिया ने बाद में बेगम समरू के नाम से जाना.

अठारहवीं सदी के हिंदुस्तान में मुगल सल्तनत पस्त हाल थी. मराठे, जाट, रोहिल्ले और सिख दिल्ली पर चढ़ रहे थे. अंग्रेज आंख लगाए थे. तब एक तवायफ़ ने अपनी अक्ल, हौसले और सियासी सूझबूझ से ऐसी सल्तनत खड़ी की कि बड़ेबड़े नवाब और सेनापति भी उससे अदावत मोल लेने से पहले कई बार सोचते थे.
कोठे से शुरू हुआ सफर
फरजाना की शुरुआती जिंदगी के बारे में इतिहासकारों में एक राय नहीं है. कुछ उसे कश्मीरी मूल का बताते हैं . कुछ के मुताबिक वह एक गरीब मुस्लिम परिवार से थी. पिता की मौत के बाद माली हालत खराब हो गई. मजबूरी में दिल्ली के चावड़ी बाजार में खानम जान का कोठा उसका अगला ठिकाना बना. उस दौर में तवायफ़ों के कोठे महज नाचगाने की जगह नहीं थे. वहां शायरी, संगीत, अदब और बातचीत के सलीके की तालीम भी मिलती थी. रईसों, नवाबों, फौजी अफसरों और दरबारियों का आनाजाना रहता था. इन महफिलों में कई बार ऐसे रिश्ते बनते थे जिनका असर दरबार की सियासत तक पहुंचता था.
फरजाना जिसे दुनिया में बेगम समरू के नाम से जाना गया.
फरजाना की जिंदगी में वहां एक दिन नया कद्रदान वाल्टर रेनहार्ड आया. वह भाड़े का फौजी था. अलगअलग हुकूमतों के लिए लड़ चुका था. उसकी वफादारी किसी एक तख्त से बंधी नहीं थी. जहां बेहतर कीमत और मौका मिलता, उसकी फौज वहां पहुंच जाती. 15 साल की फरजाना के इश्क में 45 साल का रेनहार्ड गिरफ्तार हो गया. कोठा छूट गया. दोनों साथ रहने लगे. रेनहार्ड को लोग ‘ले सोमब्र ‘ भी कहते थे. इसी सोमब्र का हिंदुस्तानी अपभ्रंश आगे चलकर समरू बना और फरजाना बेगम समरू कहलाने लगी.
महफिलों से जंग के मैदान तक
रेनहार्ड कोई मामूली सिपाही नहीं था. उसके पास यूरोपीय ट्रेनिंग के सैनिकों की अपनी फौज थी. वह अपनी सैनिक टुकड़ियां अलगअलग भारतीय राजाओंनवाबों को भाड़े पर देता था. फरजाना धीरेधीरे इस फौज का हिस्सा बन गई. हथियार चलाना सीखा. दरबारों के नजदीक पहुंच वहां के तौरतरीकों के साथ सियासी चालें भी समझीं. रेनहार्ड की सोहबत ने उसे मौका पड़ने पर फायदे के लिए पाला बदलने में देर न करने की सीख भी.
रेनहार्ड ने पहले कई देसी राजाओं के लिए काम किया. बंगाल के नवाब मीर कासिम के साथ उसका नाम जुड़ा. पटना में अंग्रेजों के खिलाफ हुई हिंसा में उसकी फौज की भूमिका के कारण उसे ‘बुचर ऑफ पटना’ तक कहा गया. बाद में उसने मुगल दरबार की भी सेवा की. मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के दौर में रेनहार्ड और फरजाना की हैसियत बढ़ती गई.
बादशाह ने रेनहार्ड को मेरठ के निकट सरधना की जागीर अता की. यह कोई छोटी रियासत नहीं थी. तब उसकी सालाना आमदनी करीब छह लाख रुपये थी. उस दौर में यह रकम और उसका इलाका दोनों खासे अहम थे. 1778 में रेनहार्ड की मौत हो गई. फरजाना उस वक्त 2526 साल की थी. सामने बड़ा सवाल था, अब आगे क्या?
रेनहार्ड ने पहले कई देसी राजाओं के लिए काम किया. फोटो: AI Generated
रेनहार्ड की मौत बाद संभाली कमान
रेनहार्ड की मौत के बाद जागीर और फौज उसके बेटे जफरयाब खान के हिस्से में जानी चाहिए थी. लेकिन अमीरों सरदारों को फरजाना की काबिलियत पर भरोसा था. उसकी ताकत का भी अहसास था. फौज ने भी फरजाना का साथ दिया. फरजाना आगे बढ़ी. मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय से सनद हासिल की.
सरधना की जागीर के साथ फौज की कमान भी अपने हाथ में ली. कोठे से निकली एक लड़की करीब चार हजार सैनिकों की सरदार बन गई. उसकी फौज में यूरोपीय अफसर, पैदल सैनिक, घुड़सवार और तोपखाना शामिल था. सिर्फ नाम के लिए फौज की कमान उसके हाथ में नहीं थी. जरूरत पर खुद सैनिकों के साथ मैदान में उतरती थी. दरबार सरधना में लगता था. सिर पर पगड़ी, हाथ में हुक्का और सामने फौजी अफसरों की कतार. रहनसहन में उस दौर की आम बेगमों से उसका जुदा अंदाज था. पर्दे की बंदिशों को उसने धता बता दी थी.
मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय.
जब बादशाह शाह आलम को पड़ी बेगम की जरूरत !
उस वक्त तक दिल्ली में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय का रुतबा नाम भर का रह गया था. इलाका सिमट चुका था. दरबार में साजिशें आम थीं. बाहर से लगातार हमले हो रहे थे. ऐसे में बेगम समरू बादशाह के लिए एक भरोसेमंद सहयोगी बनकर उभरी. 1783 में सिख सेनानायक बघेल सिंह की फौज दिल्ली पहुंची. उसके साथ करीब 30 हजार सैनिक थे. दिल्ली पर दबाव बढ़ा तो शाह आलम को समझ नहीं आया कि इस चुनौती से कैसे निपटें?
बेगम समरू को मशवरे के लिए बुलाया गया. बेगम ने बघेल सिंह से बातचीत की. सुलहसमझौते के तहत सिखों को दिल्ली में गुरुद्वारे बनाने की इजाजत मिली. समरू की मदद से जंग टल गई. दिल्ली के तीस हजारी इलाके के नाम को भी इसी 30 हजार सैनिकों की मौजूदगी से जोड़कर देखा जाता है. 1789 में शाह आलम की फौज का गोकलगढ़ के इलाके में टकराव हुआ. उसके सामने नजफ कुली खान की चुनौती थी. एक रात मुगल खेमे पर अचानक हमला हुआ. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। बादशाह की जान खतरे में थी. बेगम समरू ने अपने फौजी अफसरों को बादशाह की मदद के लिए भेजा. इस अभियान में जॉर्ज थॉमस नाम के फौजी अफसर का अहम रोल था. बेगम खुद भी मोर्चे पर पहुंची. हमलावर पीछे हटे. शाह आलम बच निकले. इस अहसान के लिए शाह आलम ने बेगम को अपनी ‘सबसे प्यारी बेटी’ जैसा संबोधन दिया.
मुगल सल्तनत पर आक्रमण बढ़ गए थे. फोटो: AI Generated
ग़ुलाम कादिर के हमले की मुखालफत
1788 में दिल्ली पर एक और मुसीबत टूट पड़ी. रोहिल्ला सरदार ग़ुलाम कादिर ने राजधानी पर कब्जा कर लिया. उसके सैनिकों ने शाही महल में लूटपाट की. मुगल शाही परिवार को बंधक बना लिया. ग़ुलाम कादिर को शाही खजाने की तलाश थी. उसने बादशाह और शाही परिवार के साथ काफी बुरा सलूक किया. शाह आलम की आंखें तक फोड़ दीं. कभी जिस बादशाह के नाम से फरमान जारी होते थे, वह अब बेबस और अंधा था.
इस संकट में बेगम समरू की भूमिका का जिक्र मिलता है. उसने ग़ुलाम कादिर के सामने घुटने नहीं टेके. मुखालफत की. समरू के सैनिक और तोपखाना दिल्ली की राजनीति में फिर असरदार हो गए. ग़ुलाम कादिर को आखिरकार महादजी सिंधिया की सेना ने पकड़ लिया. उसे अपनी करतूतों की सजा भुगतनी पड़ी. शाह आलम के साथ बेगम के राजनीतिक और सैन्य रिश्ते हमेशा कायम रहे.
इस्लाम छोड़ ईसाई बनी
बेगम समरू की जिंदगी का एक और दिलचस्प पहलू उसका मजहब परिवर्तन था. 1781 में उसने रोमन कैथोलिक धर्म अपना लिया. बपतिस्मा के बाद नया नाम जोआना नोबिलिस समरू मिला. इसके बावजूद उसने मुगल दरबार की परंपराएं और भारतीय पहनावा नहीं छोड़ा. अपनी अलग पहचान कायम की लेकिन मुगल बादशाह से नजदीकी बनी रही . उसके दरबार में यूरोपीय अफसर थे. हिंदुस्तानी सैनिक भी. फौज में अनुशासन और आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण पर खास ध्यान दिया जाता था. बेगम ने बदलते वक्त को हमेशा पहचाना और उसमें खुद को ढाला.
मुगलों की मदद की. मराठों के साथ भी संबंध रखे. अंग्रेजों से भी समझौते किए. उसे मालूम था कि उत्तर भारत की सियासत में किसी एक ताकत के भरोसे अपनी रियासत बचाए रखना आसान नहीं होगा.अंग्रेजों के साथ उसके रिश्ते कभी दोस्ताना तो कभी खिंचे रहे. लेकिन उसने सरधना पर अपना कब्जा हमेशा बरकरार रखा. अंग्रेज अफसर भी उसके दरबार में पहुंचते थे. 1836 में जब बेगम की मौत हुई, तब तक वह करीब 55 वर्षों तक सरधना पर शासन कर चुकी थी. उसकी कोई औलाद नहीं थी. विरासत को लेकर बाद में लंबे झगड़े चले.



