करीब छह महीने तक लगातार बिकवाली करने के बाद एफआईआई ने एक बार फिर भारतीय शेयर बाजार में खरीदारी शुरू कर दी है. जुलाई में अब तक विदेशी निवेशकों ने करीब 1.8 बिलियन डॉलर के भारतीय शेयर खरीदे हैं. सवाल यह है कि अचानक उनका रुख क्यों बदल गया? जेफरीज के ग्लोबल हेड ऑफ इक्विटी स्ट्रैटजी क्रिस्टोफर वुड का मानना है कि इसकी वजह भारत की इकोनॉमी में कोई बड़ा बदलाव नहीं, बल्कि ग्लोबल एआई ट्रेड की रफ्तार में आई नरमी है. यानी जो पैसा एआई स्टॉक्स की तरफ जा रहा था, उसका एक हिस्सा अब दोबारा भारत जैसे बाजारों में लौटने लगा है.

विदेशी निवेशकों की भारतीय शेयर बाजार में वापसी ने निवेशकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. जेफरीज के ग्लोबल हेड ऑफ इक्विटी स्ट्रैटजी क्रिस्टोफर वुड का कहना है कि पिछले महीनों में भारत से हुई रिकॉर्ड बिकवाली का सबसे बड़ा कारण भारतीय बाजार की कमजोरी नहीं थी. असली वजह ग्लोबल एआई ट्रेड थी, जिसने विदेशी निवेशकों को साउथ कोरिया और ताइवान जैसे देशों के एआई और टेक्नोलॉजी हार्डवेयर स्टॉक्स की ओर आकर्षित कर दिया था.

वुड के मुताबिक, साल की पहली छमाही में इमर्जिंग मार्केट फंड्स ने भारतीय शेयर बेचकर कैश जुटाया और उसे एआई थीम वाले बाजारों में लगाया. यही कारण रहा कि भारत से लगभग 29 बिलियन डॉलर की रिकॉर्ड बिकवाली देखने को मिली. लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है. 15 जुलाई तक विदेशी निवेशकों ने करीब 1.8 बिलियन डॉलर के भारतीय शेयर खरीदे हैं, जो फरवरी के बाद पहली मासिक खरीदारी मानी जा रही है.

एआई ट्रेड की रफ्तार हुई धीमी

क्रिस्टोफर वुड का मानना है कि जुलाई में आई खरीदारी इस बात का संकेत है कि ग्लोबल निवेशक अब एआई स्टॉक्स से कुछ पैसा निकालकर दूसरे बाजारों में निवेश कर रहे हैं. उनका कहना है कि भारत एआई ट्रेड का ठीक उल्टा बाजार रहा है. जब एआई शेयरों में तेजी थी, तब भारत से पैसा बाहर गया और अब एआई थीम की रफ्तार कम होने पर भारत में पैसा लौटना शुरू हुआ है. हालांकि, उनका मानना है कि एफआईआई की बड़ी और लगातार वापसी तभी होगी, जब या तो एआई ट्रेड अपने पीक पर पहुंच जाए या फिर भारतीय बाजार के वैल्यूएशन में बड़ी गिरावट देखने को मिले.

घरेलू निवेशकों ने दिया मजबूत सहारा

विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार मजबूत बना रहा. इसकी सबसे बड़ी वजह डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स और एसआईपी निवेशक रहे. जून में एसआईपी के जरिए 31,800 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश हुआ, जो इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में आए कुल निवेश का लगभग 87% था. क्रिस्टोफर वुड का कहना है कि लगातार डोमेस्टिक फ्लो ने विदेशी बिकवाली के असर को काफी हद तक कम किया और भारतीय बाजार के वैल्यूएशन को मजबूत बनाए रखा.

लार्ज कैप शेयरों में दिख रहा मौका

जेफरीज का मानना है कि आने वाले समय में लार्ज कैप शेयर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं. पिछले दो वर्षों में मिडकैप स्टॉक्स ने शानदार रिटर्न दिया है. 2023 की शुरुआत से निफ्टी मिडकैप 100 करीब 99% चढ़ा, जबकि निफ्टी 50 में सिर्फ 33% की तेजी आई. अब वैल्यूएशन के लिहाज से लार्ज कैप अपेक्षाकृत सस्ते नजर आ रहे हैं. जेफरीज का अनुमान है कि अगले दो वित्तीय वर्षों में लार्ज कैप कंपनियों की अर्निंग्स ग्रोथ 1415% रह सकती है. वहीं मिडकैप कंपनियों की ग्रोथ करीब 20% रहने का अनुमान है. ऐसे में वैल्यूएशन गैप कम होने के साथ लार्ज कैप में निवेश का मौका बन सकता है.

अभी भी बने हुए हैं कुछ बड़े जोखिम

हालांकि विदेशी निवेशकों की वापसी के बावजूद कुछ जोखिम बने हुए हैं. मिडिल ईस्ट में होर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ता तनाव और क्रूड ऑयल की कीमतें भारतीय बाजार के लिए चिंता का विषय हैं. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है. इसके अलावा रुपये की कमजोरी भी विदेशी निवेशकों के रिटर्न को प्रभावित करती है. इसके साथ ही इक्विटी इश्यूअंस और प्रमोटर एग्जिट भी बाजार में सप्लाई बढ़ा रहे हैं. ऐसे में आने वाले महीनों में एफआईआई की रणनीति काफी हद तक ग्लोबल एआई ट्रेड और क्रूड ऑयल की चाल पर निर्भर करेगी. अगर एआई थीम की रफ्तार और धीमी पड़ती है तो भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की वापसी और मजबूत हो सकती है.