उत्तर प्रदेश के रामपुर में स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी एक बार फिर चर्चा बटोर रहा है. कभी इसे समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान का ड्रीम प्रोजेक्ट कहा जाता था, लेकिन अब यही यूनिवर्सिटी कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई के केंद्र में आ गई है. रामपुर विकास प्राधिकरण ने यूनिवर्सिटी परिसर की 38 इमारतों को अवैध निर्माण मानते हुए उन्हें गिराने करने का आदेश जारी किया है. इन इमारतों में कई एकेडमिट डिपार्टमेंट, लेबोरेटरी और अन्य सुविधाएं हैं. इससे हजारों छात्रों और कर्मचारियों के भविष्य को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं.

इस बीच इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की जांच ने भी विवाद को और गहरा कर दिया है. विभाग ने यूनिवर्सिटी के निर्माण की लागत लगभग 496 करोड़ रुपये आंकी है, जबकि ट्रस्ट का दावा है कि निर्माण पर केवल 46 करोड़ रुपये खर्च हुए. इससे पहले इनकम टैक्स डिपार्टमेंट निर्माण लागत और फंडिंग को लेकर ट्रस्ट को करोड़ों रुपये का नोटिस भी जारी कर चुका है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर जौहर यूनिवर्सिटी पर एक साथ इतनी कार्रवाई क्यों हो रही है और इसके पीछे कानूनी आधार क्या है?
2006 में रखी गई थी यूनिवर्सिटी की नींव
मामले को शुरू से जानें, तो जौहर यूनिवर्सिटी की नींव साल 2006 में रखी गई थी. इसे मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट ने स्थापित किया और धीरेधीरे यहां मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग, शिक्षा, कृषि, लाइब्रेरी, हॉस्टल और अन्य एकेडमिक बिल्डिंग्स तैयार किए गए. करीब 98 एकड़ में फैला यह परिसर उत्तर प्रदेश के बड़े प्राइवेट यूनिवर्सिटी परिसरों में गिना जाता है. साल 2012 में इसका उद्घाटन हुआ और बाद में इसे यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला. हालांकि, समय के साथ इस प्रोजेक्ट पर जमीन विवाद, निर्माण की मंजूरी, पैसों में गड़बड़ी और सरकारी नियमों के उल्लंघन जैसे कई आरोप लगते रहे.
- क्या 38 इमारतें अवैध हैं प्रशासन का दावा है कि इन भवनों के नक्शे स्वीकृत नहीं कराए गए, इसलिए इन्हें अवैध माना गया है.
- क्या तुरंत बुलडोजर चलेगा नहीं. पहले ट्रस्ट को 15 दिन का समय दिया जाएगा. इसके बाद आगे की कार्रवाई होगी.
- क्या ट्रस्ट के पास बचाव का मौका है हां. ट्रस्ट इस आदेश को अदालत में चुनौती दे सकता है.
- निर्माण लागत पर विवाद क्या है इनकम टैक्स का दावा है कि निर्माण पर 496 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि ट्रस्ट 46 करोड़ रुपये खर्च होने की बात कह रहा है.
- क्या इससे पढ़ाई प्रभावित होगी अगर कार्रवाई होती है, तो कुछ विभाग और सुविधाएं प्रभावित हो सकती हैं. अंतिम स्थिति अदालत के फैसले पर निर्भर करेगी.
अब सबसे बड़ा विवाद 38 भवनों के नक्शे को लेकर है. प्रशासन का कहना है कि इन भवनों का नक्शा कभी पास नहीं कराया गया, इसलिए इन्हें अवैध निर्माण माना गया है. दूसरी ओर ट्रस्ट का कहना है कि वह कानूनी विकल्प अपनाएगा और आदेश को अदालत में चुनौती देगा. ऐसे में यह मामला केवल एक यूनिवर्सिटी का नहीं, बल्कि निर्माण नियमों, प्रशासनिक प्रक्रिया और कानून के पालन का भी बन गया है.
जौहर यूनिवर्सिटी का पूरा मामला क्या है?
जौहर यूनिवर्सिटी विवाद में क्यों है?
रामपुर विकास प्राधिकरण का कहना है कि यूनिवर्सिटी परिसर में बने 38 भवनों के नक्शे संबंधित प्राधिकरण से कभी स्वीकृत नहीं कराए गए. जांच के दौरान यह पाया गया कि मेडिकल कॉलेज और कुछ एकेडमिक बिल्डिंग्स को छोड़कर ज्यादातर निर्माण के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई है. इसी आधार कार्रवाई करते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया.
क्या हर निर्माण के लिए मंजूरी जरूरी है?
किसी भी बड़े निर्माण के लिए सक्षम प्राधिकारी से भवन का नक्शा पास कराना जरूरी होता है. जब जौहर यूनिवर्सिटी का निर्माण शुरू हुआ था, तब यह क्षेत्र जिला पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आता था. उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम, 1961 की धारा 239 के अनुसार, निर्माण से पहले अनुमति लेना जरूरी था. प्रशासन का आरोप है कि यूनिवर्सिटी ने सभी भवनों के लिए यह प्रक्रिया पूरी नहीं की.
निर्माण की मंजूरी किससे लेनी थी?
साल 2015 में रामपुर विकास प्राधिकरण का गठन हुआ, लेकिन जौहर यूनिवर्सिटी वाला क्षेत्र सितंबर 2024 में उसके अधिकार क्षेत्र में शामिल किया गया. उससे पहले जौहर यूनिवर्सिटी जिस सिंगनखेड़ा गांव में स्थित था, वह जिला पंचायत के अधीन आता था. इसलिए शुरुआती निर्माण के समय जिला पंचायत से मंजूरी आवश्यक थी. बाद में 38 भवनों के नक्शा न पास होने की शिकायत की गई थी. इसके बाद उत्तर प्रदेश शहरी योजना एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा 27 के तहत विस्तृत सुनवाई और अभिलेखों की जांच के बाद विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया गया.
निर्माण में कितना खर्च आया?
निर्माण में कितना पैसा लगा, यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा है. जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण पर कितना खर्च हुआ, इसे लेकर अलगअलग दावे किए गए हैं. कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है. समाजवादी पार्टी सरकार के समय श्रम विभाग ने इसकी अनुमानित लागत करीब 2,000 करोड़ रुपये बताई थी. वहीं, बाद में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने CPWD से निर्माण लागत का आकलन कराया, जिसमें खर्च करीब 494 करोड़ रुपये बताया गया.
पूरे मामले की टाइम लाइन
इसके आधार पर अप्रैल 2025 में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने जौहर ट्रस्ट को करोड़ों रुपये का नोटिस भेजा. विभाग का आरोप था कि ट्रस्ट के खातों में सिर्फ 100 करोड़ रुपये का खर्च दर्ज है, जबकि असल निर्माण लागत करीब 450 करोड़ रुपये है. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने दोनों के बीच 350 करोड़ रुपये के अंतर को कथित बेनामी निवेश मानते हुए ब्याज सहित वसूली का नोटिस जारी किया. अलगअलग आंकड़ों की वजह से ये विवाद और बढ़ गया है.
38 इमारतें कब गिराई जाएंगी?
रामपुर के जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी के अनुसार, नियमानुसार ट्रस्ट को पहले 15 दिन का समय दिया जाएगा, ताकि वह स्वयं अवैध निर्माण हटा सके. अगर निर्धारित समय में ऐसा नहीं किया जाता, तो रामपुर विकास प्राधिकरण अपने स्तर पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करेगा.
जौहर ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन क्यों रद्द हुआ?
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट का पंजीकरण रद्द कर दिया है. डिपार्टमेंट का कहना है कि ट्रस्ट की गतिविधियां जनहित के अनुरूप नहीं थीं और कई वित्तीय व प्रशासनिक अनियमितताएं सामने आई हैं. जांच में आरोप लगा कि ट्रस्ट ने चंदा जुटाने में गड़बड़ी की, कुछ डमी ट्रस्टी बनाए और निर्माण लागत कम दिखाकर टैक्स से जुड़े नियमों का उल्लंघन किया. ट्रस्ट से जुड़े सदस्यों पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें 9 लोग शामिल हैं. इन लोगों में 5 आजम खान के परिवार के ही सदस्य हैं.
अब ट्रस्ट के पास क्या है विकल्प?
ट्रस्ट इस आदेश के खिलाफ अदालत जा सकता है. वह निचली अदालत या इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है. अगर कोर्ट से राहत मिलती है, तो फिलहाल इमारतें गिराने की कार्रवाई रुक सकती है. आगे क्या होगा, इसका फैसला अदालत के आदेश के बाद ही तय होगा.



