दुनिया में बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि लोगों की जान के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है. गर्मियों में तापमान बढ़ने से लू चलना, शरीर में पानी की कमी होना और बीमार पड़ना आम बात लग सकती है, लेकिन अब इसका असर मौतों के आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है.

हाल ही में सामने आई रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के लिए तेज गर्मी एक चिंता का विषय बनी रही, जो मौत के बढ़ते आंकड़ें का भी कारण बन रही है. लैंसेट काउंटडाउन की नई रिपोर्ट के मुताबिक, पेरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट के लागू होने के बाद के दशक में गर्मी से जुड़ी मौतों की सालाना औसत संख्या करीब 36% बढ़ गई है.
गर्मी का शरीर पर खतरनाक असर
इस रिपोर्ट में भारत को लेकर भी चिंता जताई गई है. यहां लोगों को हर साल हजारों घंटे ऐसी गर्मी का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें बाहर काम करने या सामान्य फिजिकल एक्टिविटी करने पर भी शरीर पर खतरनाक असर पड़ सकता है. रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि क्लाइमेट चेंज का असर अब लोगों की सेहत, नींद और रोजमर्रा की जिंदगी तक पहुंच गया है.
2016 में लागू हुआ था पेरिस समझौते
इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्लाइमेट चेंज को रोकने के लिए दुनिया ने जो कदम उठाए हैं, वो बढ़ते खतरे के मुकाबले काफी नहीं हैं. साल 2015 में हुए पेरिस समझौते का लक्ष्य दुनिया के तापमान में बढ़ोतरी को सीमित करना था. ये समझौता 2016 में लागू हुआ, लेकिन इसके बाद भी गर्मी और मौसम से जुड़ी दूसरी घटनाओं का खतरा बढ़ता गया.
2023 में गर्मी से 7.10 लाख मौतें हुईं
रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 में गर्मी से दुनिया भर में अनुमानित 7.10 लाख मौतें हुईं और इनमें 71.5% मौतों के लिए इंसानों के कारण हो रहा क्लाइमेट चेंज जिम्मेदार था. भारत में भी बढ़ती रात की गर्मी लोगों की नींद कम कर रही है, जबकि दिन में बाहर काम करने वालों के लिए लू का खतरा बढ़ रहा है. ऐसे में सवाल सिर्फ तापमान घटाने का नहीं, बल्कि लोगों की जान बचाने और स्वास्थ्य सेवाओं को इस बदलते मौसम के लिए तैयार करने का भी है.
- गर्मी से मौतें 36% बढ़ीं: पेरिस समझौते के बाद गर्मी से जुड़ी मौतों का सालाना औसत बढ़ा.
- 2023 में 7.10 लाख मौतें: इनमें करीब 71.5% मौतों के लिए इंसानों के कारण होने वाला क्लाइमेट चेंज जिम्मेदार था.
- भारत में 2,600 घंटे से ज्यादा गर्मी का खतरा: 2016 से 2025 के दौरान हर साल इतनी अवधि में गर्मी से शरीर पर मध्यम या उससे ज्यादा खतरा रहा.
- रात की गर्मी से नींद पर असर: भारत में 2021 से 2025 के बीच लोगों की नींद सालाना औसतन 64 घंटे कम हुई.
- दुनिया की 52% जमीन सूखे की चपेट में: 2025 में दुनिया के करीब 52% भूभाग ने कम से कम एक महीने तक सूखे का सामना किया.
हर साल लाखों मौतें क्लाइमेट चेंज कितना जिम्मेदार?
रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2023 के बीच दुनिया में गर्मी से हर साल औसतन करीब 5.40 लाख मौतें हुईं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इनमें लगभग 3.69 लाख मौतें यानी 68% मौतें क्लाइमेट चेंज के कारण हुई गर्मी से जुड़ी थीं. इससे पहले 2006 से 2015 के दौरान गर्मी से होने वाली मौतों में क्लाइमेट चेंज की हिस्सेदारी करीब 55% थी. साल 2023 इस मामले में सबसे खराब रहा. उस साल गर्मी से अनुमानित 7.10 लाख मौतें हुईं. रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या उस साल मलेरिया या HIV से होने वाली मौतों से भी ज्यादा थी.
भारत में गर्मी का खतरा क्यों बढ़ रहा है?
भारत में गर्मी का असर केवल दोपहर के बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2025 के बीच देश के लोगों को हर साल 2,600 घंटे से ज्यादा ऐसी गर्मी का सामना करना पड़ा, जिसमें नॉर्मल फिजिकल एक्टिविटी के दौरान भी शरीर पर गर्मी का मध्यम या उससे अधिक खतरा था. यह 1990 के दशक के सालाना औसत से 200 घंटे से भी ज्यादा है.
रात का तापमान भी लोगों की सेहत पर असर डाल रहा है. साल 2021 से 2025 के दौरान भारत में लोगों की नींद हर साल औसतन 64 घंटे कम हुई. यह 1986 से 2005 के औसत के मुकाबले करीब तीन घंटे ज्यादा नींद का नुकसान है.
लगातार गर्मी की वजह से शरीर में पानी की कमी, थकावट और लू लगने का खतरा बढ़ता है. बहुत ज्यादा गर्मी से जानलेवा हीटस्ट्रोक भी हो सकता है. इसके अलावा दिल और सांस से जुड़ी बीमारियों से परेशान लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. बच्चों, बुजुर्गों और खुले में काम करने वाले मजदूरों पर इसका असर ज्यादा पड़ सकता है.
सूखा और भारी बारिश भी बढ़ा रहे मुश्किलें
रिपोर्ट में बताया गया है कि क्लाइमेट चेंज का असर केवल गर्मी तक सीमित नहीं है. दुनिया के कई हिस्सों में लंबे सूखे और बहुत ज्यादा बारिश जैसी घटनाएं भी बढ़ रही हैं.
- सूखे का बढ़ता दायरा: 2025 में दुनिया की करीब 52% जमीन पर कम से कम एक महीने तक सूखे जैसी स्थिति रही. यह अब तक दर्ज सबसे ऊंचे स्तरों में दूसरा स्थान था.
- सूखे की रफ्तार में तेजी: 2016 के बाद सूखे से प्रभावित क्षेत्र का विस्तार, 2006 से 2015 के मुकाबले सात गुने से भी ज्यादा तेजी से हुआ.
- भारी बारिश का बढ़ता खतरा: 2016 से 2025 के दौरान हर साल दुनिया की करीब 17.2% जमीन पर अत्यधिक बारिश हुई. इससे पहले के दशक में यह आंकड़ा 14.8% था.
इन बदलावों से बाढ़, भूस्खलन और दूषित पानी से फैलने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि 2003 के बाद से दुनिया के करीब 80 फीसदी क्षेत्र में जमीन के नीचे जमा पानी के स्तर में सूखे और नमी से जुड़े बड़े बदलाव देखे गए हैं. इसका असर खेती, भोजन की उपलब्धता और साफ पानी पर पड़ सकता है.
लैंसेट की रिपोर्ट में क्या बोले विशेषज्ञ?
लैंसेट काउंटडाउन की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर प्रोफेसर मरीना रोमानेलो ने कहा, ‘पेरिस एग्रीमेंट के एक दशक बाद, हमारे नतीजे साफ हैं क्लाइमेट चेंज से सेहत को होने वाले नुकसान, दुनिया के रिस्पॉन्स से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं, और कई मामलों में तो और भी तेजी से बढ़ रहे हैं.’ रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्वच्छ ऊर्जा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और लोगों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों से कुछ फायदे जरूर हुए हैं, लेकिन ये कदम बढ़ते खतरे को रोकने के लिए अभी पर्याप्त नहीं हैं.


