दुनिया में तेल की सप्लाई को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल को सुरक्षित रखने के लिए नई रणनीति अपनाई है. इसके तहत सऊदी अरब अब अपना तेल सिंगापुर में स्टोर करेगा. खास बात यह है कि तेल को रखने के लिए किसी सामान्य टैंक या खुले गोदाम के बजाय जमीन के नीचे बनी गुफाओं का इस्तेमाल किया जाएगा. यह व्यवस्था अगले साल की दूसरी छमाही से शुरू होने की उम्मीद है.

इस फैसले के पीछे अमेरिकाईरान युद्ध, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर में तेल की सप्लाई पर मंडराता खतरा अहम वजह हैं. इन समुद्री रास्तों से दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल की सप्लाई होती है. ऐसे में अगर इन रास्तों पर किसी तरह की रुकावट आती है, तो तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है. सऊदी अरब का मकसद अपने तेल को एशियाई बाजारों के करीब रखना है, ताकि जरूरत पड़ने पर उसकी सप्लाई जारी रखी जा सके.

सिंगापुर की गुफाओं में क्यों रखा जाएगा सऊदी अरब का तेल?

सिंगापुर के ऊर्जा, व्यापार और उद्योग मंत्री टैन सी लेंग ने सोमवार को ‘सिंगापुर इंटरनेशनल एनर्जी वीक’ सम्मेलन में इस योजना की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सऊदी अरब का कच्चा तेल सिंगापुर के दक्षिणी हिस्से में स्थित जुरोंग रॉक कैवर्न्स में स्टोर किया जाएगा. यह जगह पेट्रोकेमिकल और तेल रिफाइनिंग से जुड़े औद्योगिक परिसर का हिस्सा है. सिंगापुर की सरकारी एजेंसी JTC कॉर्प के मुताबिक, इन भूमिगत गुफाओं में 14.7 लाख क्यूबिक मीटर तक लिक्विड हाइड्रोकार्बन स्टोर किया जा सकता है. इसमें कच्चे तेल के साथ कंडेनसेट भी शामिल है. इसकी कुल क्षमता करीब 90 लाख बैरल तेल के बराबर है.

जमीन के नीचे तेल स्टोर करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए बड़े स्तर पर जमीन के ऊपर टैंक बनाने की जरूरत नहीं पड़ती. साथ ही, ऐसी सुविधाएं बड़े इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स के पास तेल के भंडारण और उसकी सप्लाई को मैनेज करने में मदद कर सकती हैं. सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको के सीईओ अमीन नासिर ने भी इस महीने की शुरुआत में बताया था कि कंपनी तेल स्टोर करने के लिए विदेशी सरकारों के साथ बातचीत कर रही है. सिंगापुर के साथ होने वाला समझौता इसी रणनीति का हिस्सा है.

सऊदी अरब को विदेश में तेल स्टोर करने की जरूरत क्यों पड़ी?

सऊदी अरब दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है, लेकिन तेल का उत्पादन करना ही काफी नहीं है. उसे सुरक्षित तरीके से दूसरे देशों तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है. अगर समुद्री रास्तों या पाइपलाइन पर कोई संकट आता है, तो तेल का उत्पादन जारी रहने के बावजूद उसकी सप्लाई प्रभावित हो सकती है.

सऊदी अरब के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर के रास्ते बेहद अहम हैं. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है. इस रास्ते से दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों का कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है. वहीं, लाल सागर के रास्ते भी सऊदी अरब तेल का निर्यात करता है. अमेरिकाईरान युद्ध के कारण इन रास्तों पर पैदा हुई रुकावटों और सऊदी अरब की एक प्रमुख पाइपलाइन समेत ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों ने सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं.

ऐसी स्थिति में सिंगापुर में तेल स्टोर करने से सऊदी अरब को एशियाई ग्राहकों के करीब अपना भंडार रखने का विकल्प मिलेगा. जरूरत पड़ने पर इस तेल को बाजार तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इससे किसी एक समुद्री रास्ते या सप्लाई नेटवर्क पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलेगी. सिंगापुर के ऊर्जा मंत्री टैन सी लेंग के मुताबिक, इस व्यवस्था से दक्षिणपूर्व एशिया में सऊदी कच्चे तेल की सप्लाई चेन मजबूत होगी. साथ ही, सिंगापुर की ऊर्जा सुरक्षा और सप्लाई में रुकावटों से निपटने की क्षमता भी बेहतर होगी.

तेल की कीमतों पर क्या होगा असर?

सऊदी अरब के इस फैसले का तेल की कीमतों पर असर समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम सिर्फ उत्पादन पर निर्भर नहीं करते. सप्लाई की उपलब्धता, परिवहन की लागत, युद्ध और भविष्य में तेल की कमी की आशंका भी कीमतों को प्रभावित करती है.

पहला असर सप्लाई की निरंतरता पर पड़ सकता है. अगर समुद्री रास्तों पर रुकावट आती है, तो सिंगापुर में रखा तेल एशियाई बाजारों तक सप्लाई बनाए रखने में मदद कर सकता है. इससे अचानक पैदा होने वाली कमी का असर कुछ हद तक कम किया जा सकता है.

दूसरा फायदा यह होगा कि तेल को बाजारों के करीब रखने से जरूरत के समय उसकी उपलब्धता बेहतर हो सकती है. इससे खरीदारों को सप्लाई में देरी और उससे जुड़ी अनिश्चितता से राहत मिल सकती है.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि तेल की कीमतें तुरंत गिर जाएंगी. अगर अमेरिकाईरान युद्ध तेज होता है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर रुकावटें बढ़ती हैं या तेल के उत्पादन और निर्यात पर बड़े हमले होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं. सिंगापुर में तेल का भंडारण इन जोखिमों को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता.

क्या इससे भारत को भी फायदा होगा?

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और सप्लाई में होने वाले बदलावों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है.

भारत को कितना फायदा होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वहां स्टोर किया गया तेल किन बाजारों को, कितनी मात्रा में और किन शर्तों पर उपलब्ध कराया जाता है. केवल भंडारण की सुविधा बनने से भारत में पेट्रोलडीजल की कीमतें कम होने की गारंटी नहीं है.

कुल मिलाकर, सिंगापुर में सऊदी अरब का तेल स्टोर करने की योजना सप्लाई को सुरक्षित रखने और संकट के समय तेल की उपलब्धता बनाए रखने की रणनीति है. इससे सऊदी अरब को अपने प्रमुख एशियाई ग्राहकों के करीब तेल रखने का विकल्प मिलेगा. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों की दिशा काफी हद तक युद्ध की स्थिति, समुद्री रास्तों की सुरक्षा और वैश्विक मांगसप्लाई पर निर्भर करेगी.