साल 1901 में भारत की आबादी 24.9 करोड़ थी. तब विवाहितों की संख्या प्रति 10 हज़ार में 3640 थी. शेष आबादी बच्चों की थी या उनकी जिनकी पत्नियां अथवा पति की मृत्यु हो चुकी थी. कुछ लोग ऐसे भी थे, जिनकी किसी शारीरिक विकलांगता की वजह से शादी नहीं हुई थी, जैसे किन्नर आदि. कुछ शरीर का धंधा करने वाली स्त्रियां भी थीं. इसके अलावा वे लोग भी जो साधु या संन्यासी हो चुके थे. शेष सभी लोग तब विवाह के बंधन में बंधना जीवन की अनिवार्यता समझते थे. कोई भी स्त्री या पुरुष बिना किसी ठोस कारण के विवाह न करना ग़लत समझते थे. उस समय भारत में बाल विवाह खूब होते थे और संतान वृद्धि को लोग अच्छा समझते थे. आम तौर पर हर युगल के सातआठ बच्चे होते थे.

कन्या शिशु की हत्या
आज़ादी के बाद हुई पहली जनगणना में प्रति हज़ार पुरुषों में से 465 पुरुष विवाहित थे और 484 स्त्रियां. उस समय तक पाकिस्तान और आज का बंगला देश, जो तब पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था, भारत से अलग हो चुका था. शेष देश की आबादी 36.1 करोड़ थी. उस समय महिलाओं का अनुपात पुरुषों की तुलना में बहुत कम था. एक हज़ार पुरुषों के मुक़ाबले 946 स्त्रियां थीं. यानी 1000 पुरुषों में से 54 को अविवाहित रह जाना पड़ता था. ये वो दौर था, जब परिवार में कन्या का जन्म लेना हेठी समझा जाता था. इसलिए कुछ सामंती सोच वाले नवजात कन्या शिशु को चारपायी की पाटी के नीचे दबा कर मार देते थे. देश में तब न तो जागृति थी न सामाजिक चेतना. पढ़ेलिखे लोगों की संख्या 18 प्रतिशत ही थी. इनमें से भी लड़कियों की शिक्षा पर जोर न के बराबर था.
फैमिली प्लानिंग की शुरुआत
तब तक भी परिवारों में बच्चों की जन्म दर बहुत ज्यादा थी. किंतु कमज़ोर चिकित्सा व्यवस्था तथा जच्चाबच्चा के समुचित देख भाल के अभाव में हर परिवार में कईकई बच्चे असमय काल कवलित हो जाते. कोई चेचक, मलेरिया, डायरिया आदि संचारी रोगों के कारण मारे जाते तो कुछ टिटिनस, हाइड्रो फोबिया अथवा सांप या बिच्छू द्वारा काट लिए जाने की वज़ह से. फिर भी देश की आबादी तेजी से बढ़ रही थी. इसीलिए 1952 में तत्कालीन पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत की. परिवारों का आकार छोटा करने की दिशा में पूरी दुनिया में उठाया गया यह पहला कदम था. पहली पंचवर्षीय योजना में इसे सरकारी योजना के तौर पर शामिल कर लिया गया.
स्त्रियों की संख्या और घटी
लेकिन इतने सारे उपायों के बावजूद भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ी. राष्ट्रीय स्तर पर आख़िरी बार जनगणना 2011 में हुई थी. तब देश की कुल आबादी लगभग 1.21 अरब बताई गई थी. इसमें से पुरुषों की संख्या 62,32,70,258 थी और स्त्रियों की कुल संख्या 58,75,84,719 आंकी गई थी. इतनी जागरूकता और शिक्षा के बावजूद स्त्रियों की संख्या का अनुपात प्रति 1000 पुरुष में से 943 रह गया. यह चिंताजनक स्थिति थी. सबसे कम स्त्री जनसंख्या वाले राज्यों में हरियाणा, पंजाब की स्थिति तो दयनीय थी. हरियाणा में यह अनुपात 879 और पंजाब में 890 का था. जबकि सिक्किम में भी महिलाएं प्रति हज़ार पुरुषों में सिर्फ़ 885 थीं. उत्तर प्रदेश में 912 और बिहार में 919 स्त्रियां 1000 पुरुषों में थीं. जबकि केरल में पुरुष कम थे और महिलाएं अधिक. वहां 1000 पुरुषों के मुक़ाबले 1084 स्त्रियां थीं.
जहां शिक्षा वहां स्त्री का सम्मान
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि में भी स्त्री जनसंख्या की स्थिति बेहतर थी. इससे एक निष्कर्ष यह निकाला गया कि जिन प्रदेशों में महिला शिक्षा दर बेहतर है, उनकी रोज़गार की स्थिति अच्छी है, वहां महिलाओं की गिनती कम नहीं है. यह बड़ी चुनौती थी यूपी, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों केर लिए. हरियाणा, जहां की लड़कियां देश को हर खेल में स्वर्ण दिलाती रही हैं, वहां महिलाओं की संख्या कम क्यों! शायद इसीलिए हरियाणा वालों पर असर पड़ा और 2016 से 2021 के बीच देश में महिलाओं की गणना का अनुपात 1020 हो गया. प्रति 1000 पुरुषों में से 1016 स्त्रियां. हालांकि 2021 में कोविड के कारण जनगणना नहीं हुई. अब पुनः शुरू की गई है. उम्मीद है कि इस बार यह औसत सुधरेगा. किंतु फ़ैमिली प्लानिंग के मोर्चे पर देश को कोई सफलता नहीं मिली. मोटामोटी अनुमान है कि भारत की आबादी आज कोई 144 करोड़ है.
भारत युवाओं का देश
आबादी का यह आंकड़ा चौकाने वाला है. अब हम दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश चीन से आगे निकल गए हैं. अभी तक संतोष की बात ये है कि युवाओं की संख्या देश में आज सबसे अधिक है. कहा जाता है कि भारत युवाओं का देश है. एक अनुमान के अनुसार आज भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की आबादी 37.1 करोड़ है. यह संख्या देश की कुल आबादी का 27.3 प्रतिशत है. जबकि चीन में यह आबादी महज 17 करोड़ है, जो वहां की कुल आबादी का 20 प्रतिशत भी नहीं होता. आशंका है कि चीन की एक युगल एक बच्चा पालिसी के चलते चीन में युवा आबादी लगातार कम हो रही है और इसी के बरक्स प्रौढ़ों और बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है. एक बच्चा पालिसी के कारण एक युगल पर औसत 16 बुजुर्गों की परवरिश का भार पड़ता है.
चीन की चिंता
जब एक ही बच्चा होगा तो एक युगल के परिवार में पतिपत्नी दोनों के मांबाप और कई बार तो दोनों तरफ़ के सासससुर के मांबाप का भी बोझ पड़ता है. क्योंकि बेहतर चिकित्सा व्यवस्था के चलते वहां औसत आयु भी 75 से 80 के बीच है. जो चीन कभी अपनी युवा आबादी पर गर्व करता था, वह अब युवाओं की घटती संख्या, बच्चों के विवाह न करने की प्रवृत्ति और बच्चा पैदा करने के प्रति अनिच्छुक युगलों को लेकर चिंतित है, जापान, दक्षिण कोरिया, नॉर्वे, स्वीडन, पुर्तगाल, इटली आदि देशों में युवा आबादी तेज़ी से घटी है. इसलिए वहां काम करने वाले लोग नहीं बचे हैं. इन देशों में काम करने वाले विदेशों से आए कुशल मजदूर, आईटी प्रोफेशनल्स, डॉक्टर हैं. जाहिर है, लंबे समय तक इन देशों में रहने के बाद जब वे इन देशों के नागरिकों जैसे व्यवहार की अपेक्षा करते हैं, तब इन्हें दुत्कार मिलती है.
प्रवासियों के भरोसे देश
अमेरिका में वर्षों काम करने के बाद जब भारतीयों, पाकिस्तानियों, बांग्लादेशियों, अफ़्रीकन्स, दक्षिण अमेरिकी देशों और मैक्सिकन्स तथा चीनियों ने अपने अधिकार मांगे तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उनके अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगा दिए. फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, स्पेन ने ग़ैर मुल्की प्रवासियों के लिए फ्री चिकित्सा और फ्री एजुकेशन रोक दिए. नतीजा आंदोलन हुए. फ्रांस आज बुरी तरह जल रहा है. किसी भी देश के लिए युवा कोई बोझ नहीं बल्कि उसकी संपदा होते हैं. युवा आबादी ही देश को आगे बढ़ाती है. किसी भी देश के प्रोडक्शन की नींव होते हैं युवा. इसलिए फ़ैमिली प्लानिंग ठीक तो है पर उस पर इतना जोर नहीं डाला जाए कि वह देश के विकास में रोड़ा बन जाए. जब तक कोई देश अविकसित रहता है, उसके लिए आबादी पर अंकुश लगाना जरूरी होता है.
युवा आबादी में भारत का भविष्य भी बेहतर नहीं
मगर देश में जब पैसा आने लगे तब फ़ैमिली प्लानिंग की योजनाएं रोक देनी चाहिए. जैसे चीन भी अब एक नहीं दो बच्चे पैदा करने की सलाह दे रहा है. भारत में भी मध्य वर्ग अब बच्चे पैदा करने को ले कर निरुत्साहित है. हालांकि, अपने देश में 35 वर्ष तक की उम्र के लोगों की आबादी करीब 90 करोड़ है, जो देश की कुल जनसंख्या का 65 प्रतिशत बनता है. सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने अनुमान लगाया है कि भारतीय युगलों में जिस तरह से बच्चे पैदा करने को ले कर अनिच्छा है उसके चलते 2036 तक भारत में 15 से 29 वर्ष के लोगों की आबादी का प्रतिशत घटेगा. इनकी आबादी 22.7 प्रतिशत ही रह जाएगी. बेरोजगारी के भयावह दृश्य और बढ़ती हुई महंगाई युवाओं को बच्चे पैदा करने के प्रति निरुत्साहित करती है.
शिक्षा चिकित्सा बहुत महंगी
इसके अलावा बच्चे के लालनपालन पर खर्च, स्कूलिंग की चिंता और अच्छी परवरिश देना भारत में बहुत मुश्किल है. चिकित्सा और शिक्षा दोनों बहुत महंगे हैं. सरकारी स्कूल में पढ़ाई के अलावा और सब कुछ होता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। स्कूल टीचर को कभी जनगणना के काम पर तो कभी वोटर लिस्ट बनाने में तो कभी पोलियो के ड्राप पिलवाने जैसे अनुत्पादक कामों में लगा दिया जाता है. बच्चे बस मिड डे मील ले कर घर लौट आते हैं. पांचवीं का बच्चा ढंग से मातृभाषा का व्याकरण तक नहीं जान पाता. गणित और अंग्रेजी जैसे विषयों पर वह मुंह फाड़ देता है. जाहिर है, बच्चों को निजी और बेहद महंगे स्कूलों में भेजना पड़ेगा. जहां फ़ीस तो अनापशनाप है ही छात्रों की अपार भीड़ के कारण वाहन भी टीचर बस रट्टू टोटे की तरह बोलता जाएगा और भारीभरकम होम वर्क दे देगा. उसे करवाने के लिए घर पर ट्यूटर रखना अनिवार्य होता है.
इसीलिए भारत में भी बच्चों को लेकर दंपति में उत्साह नहीं
यही हाल चिकित्सा व्यवस्था का है. सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं न किसी तरह के परीक्षण के लिए अच्छी लैब हैं और प्राइवेट अस्पताल इतने महंगे तथा वाहन इतनी धोखाधड़ी है कि हॉस्पिटल का बिल देख कर मरीज़ की सांसें अटक जाती हैं. ऐसे में कोई भी मिडिल क्लास युवा क्यों चाहेगा कि वह शादी करें और बच्चे पैदा करे. 1901 में जहां सिर्फ़ वे लोग अविवाहित थे जो शारीरिक रूप से कमजोर थे किंतु 2026 में लाखों रुपये महीने का वेतन पाने वाले भी अविवाहित रहना पसंद करते हैं. ताकि वे तमाम तरह के झंझटों से बचें. वे लिविंग रिलेशन में रह लेंगे और बच्चों को पैदा करने से बचेंगे. अगर औसत देखा जाए तो 1960 के पहले contraceptive का प्रयोग शायद ही कोई जोड़ा करता था. मगर आज लोग मेडिकल स्टोर वाले से ये दवाएं धड़ल्ले से मांग लेते हैं.
बच्चों को पैदा करने से बचने के लिए अप्राकृतिक गर्भपात भी अब कॉमन है. ऐसे बहुत सारे उपाय अपना कर युगल अब बच्चे नहीं पैदा करना चाहते. सरकारें यदि इन्हें नहीं रोकती हैं तो निकट भविष्य में भारत की स्थिति भी युवाओं के मामले में गंभीर हो जाएगी. और हम भी एक तेजी से बुढ़ाते देश बन जाएंगे.


