क्या कोई व्यक्ति 17 अपार्टमेंट बेचकर 11.8 करोड़ रुपए का मोटा मुनाफा कमाए और उस पर 1 रुपए का भी टैक्स न दे? पहली बार में यह बात पूरी तरह असंभव या गैरकानूनी लग सकती है. लेकिन बेंगलुरु के एक जमीन मालिक ने इनकम टैक्स कानून के नियमों का सही इस्तेमाल कर इसे पूरी तरह कानूनी साबित कर दिखाया है. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने इस भारीभरकम लॉन्गटर्म कैपिटल गेन पर शून्य टैक्स देने को लेकर टैक्सपेयर को डिमांड नोटिस भेजा था. हालांकि, जमीन मालिक ने इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी और इनकम टैक अपीलेंट ट्रिब्यूनल, बेंगलुरु में विभाग के खिलाफ एक बड़ी और ऐतिहासिक जीत हासिल की है. आइए समझते हैं कि यह पूरा दिलचस्प मामला क्या था और टैक्सपेयर ने किस कानूनी पेच के जरिए करोड़ों रुपए का टैक्स बचा लिया.

जमीन के बदले मिले 17 फ्लैट्स

यह मामला एक ज्वाइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट से जुड़ा हुआ है. बेंगलुरु के कोरमंगला में रहने वाले मिस्टर अग्रवाल ने एक बिल्डर के साथ जेडीए साइन किया था, जिसके तहत उसने अपनी जमीन पर अपार्टमेंट बनाने की अनुमति दी. इसके बदले में, जमीन मालिक को उस नवनिर्मित हाउसिंग प्रोजेक्ट में उसका हिस्सा यानी 17 तैयार अपार्टमेंट मिले. 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020 के बीच 17 अपार्टमेंट बेचे और 11.8 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया. टैक्सपेयर ने आयकर कानून की धारा 54 या 54F के प्रावधानों के तहत इस पूरे मुनाफे पर टैक्स छूट का दावा किया और टैक्स देनदारी को ‘शून्य’ घोषित कर दिया.

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की आपत्ति

जब इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के असेसिंग ऑफिसर ने इस टैक्स रिटर्न की जांच की, तो उन्होंने इस पर गंभीर आपत्ति जताई. डिपार्टमेंट ने तर्क दिया कि कैपिटल गेन टैक्स से छूट केवल “एक रेजिडेंशियल हाउस” खरीदने या बनाने के लिए मिलती है. विभाग का कहना था कि टैक्सपेयर ने एक नहीं बल्कि 17 अलगअलग अपार्टमेंट बेचे और खरीदे हैं, इसलिए वह इन सभी पर एक साथ टैक्स छूट का दावा नहीं कर सकता. विभाग ने इसे टैक्स चोरी का मामला मानते हुए टैक्सपेयर को भारी पेनल्टी और टैक्स चुकाने का नोटिस थमा दिया.

टैक्सपेयर ने कैसे पलटा पासा?

जमीन मालिक मिस्टर अग्रवाल ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के इस नोटिस को स्वीकार करने के बजाए इसे ITAT बेंगलुरु के सामने चुनौती दी. टैक्सपेयर के वकील ने अदालत में कई पुराने ऐतिहासिक फैसलों और हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया. आईटीएटी ने अपने फैसले में टैक्सपेयर के पक्ष में कई अहम महत्वपूर्ण बातें कहीं.

ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि यदि किसी जेडीए के तहत एक ही लैंड पार्सल या एक ही रेजिडेंशियल कॉम्लेक्स में जमीन मालिक को कई फ्लैट आवंटित किए जाते हैं, तो कानूनी व्याख्या के अनुसार उन्हें छूट के उद्देश्य से ‘एक ही रेजिडेंशियल यूनिट’ का हिस्सा माना जा सकता है.

चूंकि यह पूरी ट्रांजेक्शन एक ही समझौते के तहत अपनी पुश्तैनी या मूल जमीन के बदले में हुई थी, इसलिए इसे कमर्शियल रियल एस्टेट ट्रेडिंग नहीं माना जा सकता. अदालत ने माना कि टैक्सपेयर ने कानून के दायरे में रहकर ही छूट का दावा किया था, जिसके बाद आईटीएटी ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के नोटिस को पूरी तरह खारिज कर दिया और जमीन मालिक के 0 रुपए टैक्स के क्लेम को सही ठहराया.

मकान मालिकों और निवेशकों के लिए बड़ा सबक

बेंगलुरु का यह केस देश भर के उन संपत्ति मालिकों के लिए एक नजीर है जो अपनी जमीन बिल्डर्स को डेवलपमेंट के लिए देते हैं. इस फैसले से तीन बड़ी बातें साफ होती हैं. जब भी आप बिल्डर के साथ कोई ज्वाइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट करें, तो उसकी कानूनी शर्तों को बहुत स्पष्ट रखें ताकि भविष्य में कैपिटल गेन का आकलन सही तरीके से हो सके. यदि आयकर विभाग से कोई नोटिस आता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप गलत हैं. टैक्स कानूनों में कई ऐसी धाराएं और न्यायिक मिसालें हैं जो ईमानदार टैक्सपेयर की रक्षा करती हैं. रियल एस्टेट में करोड़ों के ट्रांजेक्शन पर टैक्स बचाने या कानूनी दांवपेंच से निपटने के लिए हमेशा एक अच्छे चार्टर्ड अकाउंटेंट या टैक्स वकील की मदद लें.