ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसी बीमारी है जिसमें गिरते ही हड्डी टूट जाती है. अधिकतर मामलों में इस बीमारी का समय पर पता नहीं लगता है. समय पर पता न चलने की एक बड़ी वजह इसके शुरुआती लक्षणों का दिखाई नहीं देना है. हड्डियां कमजोर होने पर न दर्द होता है, न सूजन और न ही महिला को कुछ ऐसा महसूस होता है, जिससे उसे बीमारी का अंदाजा लग सके. इसलिए उसे डॉक्टर के पास जाने की जरूरत महसूस नहीं होती.

कई महिलाएं अपने परिवार की सेहत को प्राथमिकता देती हैं और अपनी समस्याओं को नजरअंदाज कर देती हैं. पीठ का झुकना या लंबाई कम होना जैसे छोटे बदलावों को भी उम्र बढ़ने का सामान्य असर मान लिया जाता है. इसके अलावा, नियमित स्वास्थ्य जांच में हड्डियों की मजबूती की जांच शामिल नहीं होती.

नतीजतन, कई बार मामूली चोट या गिरने के बाद हड्डी टूटने पर ही बीमारी का पता चलता है. तब तक कई सालों से हड्डियां कमजोर हो रही होती हैं. इसलिए इस विषय पर समय रहते बात करना जरूरी है. जेएमसी अस्पताल के ऑर्थोपेडिक सर्जन प्रोफेसर राजेश भल्ला का कहना है कि हड्डियों के कमजोर होने के कुछ शुरुआती संकेतों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है.

डॉ. भल्ला कहते हैं, समय से पहले मेनोपॉज होना या मासिक धर्म का अनियमित होना जैसे बदलावों पर ध्यान नहीं दिया जाता, जबकि इनसे हड्डियों के कमजोर होने की प्रक्रिया तेज हो सकती है. बचाव के लिए बहुत जटिल उपायों की जरूरत नहीं है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। बस शुरुआत समय पर होनी चाहिए, क्योंकि ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण अक्सर दिखाई ही नहीं देते.

दो गलत धारणाएं बढ़ा रही हैं परेशानी

डॉ. चौधरी के अनुसार, ऑस्टियोपोरोसिस को लेकर दो आम गलत धारणाएं महिलाओं के लिए नुकसानदेह साबित हो रही हैं. पहली यह कि उम्र बढ़ने के साथ हड्डियों का कमजोर होना तय है और दूसरी यह कि सिर्फ कैल्शियम की गोलियां खाने से इस बीमारी को रोका जा सकता है. दोनों धारणाएं सही नहीं हैं.

वह कहते हैं, ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें हड्डियां धीरेधीरे कमजोर और नाजुक हो जाती हैं. इससे उनके टूटने का खतरा बढ़ जाता है. अक्सर इसके कोई शुरुआती लक्षण नहीं होते. उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम जरूर बढ़ता है, लेकिन हड्डियों का कमजोर होना इससे काफी पहले भी शुरू हो सकता है, खासकर मेनोपॉज के आसपास.

हड्डियों को मजबूत रखने के लिए कैल्शियम के साथ पर्याप्त विटामिन डी, प्रोटीन, नियमित रूप से वजन उठाने वाले और मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम भी जरूरी हैं. धूम्रपान से बचना और शराब का अधिक सेवन नहीं करना भी महत्वपूर्ण है.

हड्डियों की जांच क्यों नहीं कराई जाती?

महिलाओं को हड्डियों की जांच कब करानी चाहिए और ऐसा कम क्यों होता है? इस सवाल पर डॉ. नीलाभ कहते हैं कि जांच का सही समय महिला की उम्र और उसके जोखिम पर निर्भर करता है. वह बताते हैं, ज्यादातर महिलाओं को मेनोपॉज के आसपास हड्डियों की मजबूती के बारे में डॉक्टर से बात करनी चाहिए. जोखिम के अनुसार 50 वर्ष की उम्र तक जांच की जरूरत पर विचार करना चाहिए.

अगर किसी महिला को समय से पहले मेनोपॉज हुआ है, परिवार में किसी को हड्डी टूटने की समस्या रही है, विटामिन डी की कमी है, लंबे समय से स्टेरॉयड दवाएं ले रही है, थायरॉइड की समस्या है या वजन कम है, तो उसे पहले भी जांच की जरूरत पड़ सकती है. डीईएक्सए स्कैन हड्डियों की मजबूती मापने की एक आसान और बिना दर्द वाली जांच है.

रोजमर्रा की छोटी गतिविधियां भी फायदेमंद

डॉक्टरों का कहना है कि हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए घंटों जिम में बिताना जरूरी नहीं है. नियमित रूप से थोड़ी शारीरिक गतिविधि भी मददगार हो सकती है. डॉ. भल्ला कहते हैं, ज्यादातर महिलाओं के पास समय की कमी होती है. घर और परिवार के कामों के बीच उनके लिए अलग से व्यायाम का समय निकालना मुश्किल होता है.

अच्छी बात यह है कि हड्डियों को मजबूत रखने के लिए लंबे समय तक जिम में कसरत करना जरूरी नहीं है. तेज कदमों से चलना, सीढ़ियां चढ़ना, डांस करना, हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और वजन उठाने वाले व्यायाम हड्डियों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं.