नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने जरूरी दवाओं के लिए संशोधित रिटेल कीमतें तय की हैं. इनमें कैल्शियम और विटामिन D3 टैबलेट की कीमत तय करना और एंटीरेबीज इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शन की कीमत में बदलाव शामिल है. रेगुलेटर ने हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, दिल की बीमारी और दूसरे इलाज में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली 39 दवाओं की रिटेल कीमतों पर भी सीमा तय की है. एक अलग नोटिफिकेशन में अथॉरिटी ने इंजेक्शन की कीमत बदलकर 119.48 रुपये कर दी है. आइए इसी खबर के जरिए समझते हैं कि आखिर एंटीरेबीज इम्युनोग्लोबुलिन क्या है, यह कैसे तैयार होती है, किसे और कब दी जाती है और सबसे जरूरी बात कि यह रेबीज वैक्सीन से कितनी अलग होती है.

एंटीरेबीज इम्युनोग्लोबुलिन क्या है?

एंटीरेबीज इम्युनोग्लोबुलिन एक तैयार एंटीबॉडी है, जिसे ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है जिसे रेबीज होने का ज्यादा खतरा हो. यह रेबीज वैक्सीन से अलग होती है. जहां वैक्सीन शरीर को खुद एंटीबॉडी बनाने के लिए तैयार करती है, वहीं RIG तुरंत सुरक्षा देने के लिए पहले से बनी एंटीबॉडी देती है.

यह कैसे बनती है?

1. Human Rabies Immunoglobulin

इसे हेल्दी इंसानों के प्लाज्मा से बनाया जाता है. जिन लोगों को पहले रेबीज वैक्सीन लग चुकी होती है और उनके शरीर में पर्याप्त एंटीबॉडी बन चुकी होती हैं, उनके प्लाज्मा से इन एंटीबॉडी को अलग किया जाता है. इसके बाद कई स्टेप की प्यूरीफिकेशन और वायरस को निष्क्रिय करने की प्रोसेस के बाद सुरक्षित HRIG तैयार की जाती है.

2. Equine Rabies Immunoglobulin

इसे घोड़ों से बनाया जाता है. पहले घोड़ों को कंट्रोल मात्रा में रेबीज एंटीजन देकर इम्यून किया जाता है. फिर उनके खून से एंटीबॉडी निकाली जाती हैं और मॉडर्न टेक्नोलॉजी से शुद्ध किया जाता है, ताकि एलर्जी का खतरा कम हो. भारत में HRIG की तुलना में ERIG का इस्तेमाल ज्यादा होता है क्योंकि यह अपेक्षाकृत सस्ती होती है.

यह कैसे काम करती है?

रेबीज वायरस काटने वाली जगह से नसों के जरिए धीरेधीरे दिमाग की ओर बढ़ता है. RIG घाव वाली जगह पर मौजूद वायरस को तुरंत निष्क्रिय करने का काम करती है और वायरस को नसों में जाने से पहले रोकने की कोशिश करती है. यह तब तक शरीर को सुरक्षा देती है, जब तक रेबीज वैक्सीन असर दिखाकर शरीर में प्राकृतिक एंटीबॉडी बनाना शुरू नहीं कर देती. आसान शब्दों में कहें तो RIG तुरंत सुरक्षा देती है, जबकि वैक्सीन लंबे समय की सुरक्षा देती है.

कब दी जाती है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार RIG Category III Exposure में दी जाती है. इसमें ऐसे मामले शामिल हैं जिनमें जानवर के काटने से त्वचा फटकर खून निकल आया हो, गहरे घाव हों, शरीर पर कई जगह काटा गया हो या सिर, गर्दन, चेहरा, हाथ और उंगलियों जैसे संवेदनशील हिस्सों पर काटा गया हो. चमगादड़ के संपर्क से जुड़े हाई रिस्क मामलों में भी RIG देने की सलाह दी जाती है.

किन जानवरों के काटने पर रेबीज का खतरा होता है?

रेबीज वायरस सभी स्तनधारी जानवरों में हो सकता है. सबसे ज्यादा खतरा संक्रमित कुत्तों और बिल्लियों के काटने से माना जाता है. इसके अलावा बंदर, लोमड़ी, भेड़िया, सियार, चमगादड़, रैकून, स्कंक और नेवला भी रेबीज फैला सकते हैं. अगर संक्रमित हों तो गाय, भैंस, घोड़ा, बकरी और ऊंट जैसे पालतू जानवरों के काटने से भी संक्रमण का खतरा हो सकता है. भारत में करीब 95% मानव रेबीज के मामले संक्रमित कुत्तों के काटने से जुड़े होते हैं. सामान्य तौर पर सांप, छिपकली, मगरमच्छ, कछुआ, मेंढक, मछली, पक्षियों और कीड़ेमकोड़ों के काटने या संपर्क से रेबीज नहीं फैलता, क्योंकि ये स्तनधारी नहीं हैं. इसलिए इनके मामलों में आमतौर पर RIG की जरूरत नहीं होती.

इसे कैसे लगाया जाता है?

RIG की जितनी संभव हो उतनी मात्रा घाव के आसपास और घाव के अंदर इंजेक्ट की जाती है, ताकि वायरस को उसी जगह खत्म किया जा सके. अगर दवा बच जाती है तो उसे शरीर की किसी दूसरी मांसपेशी में लगाया जाता है. इसे कभी भी रेबीज वैक्सीन वाली जगह पर नहीं लगाया जाता.

कब तक लगाई जा सकती है?

आदर्श रूप से RIG जानवर के काटने वाले दिन यानी Day 0 पर ही दी जानी चाहिए. अगर उसी दिन यह संभव न हो, तो रेबीज वैक्सीन शुरू होने के बाद अधिकतम 7 दिनों के भीतर इसे लगाया जा सकता है. इसके बाद आमतौर पर RIG नहीं दी जाती, क्योंकि तब तक शरीर वैक्सीन के जवाब में अपनी एंटीबॉडी बनाना शुरू कर देता है.

क्या हर मरीज को RIG लगती है?

नहीं. जिन लोगों को पहले पूरी रेबीज वैक्सीनेशन मिल चुकी हो या जिन्होंने पहले प्रीएक्सपोजर या पोस्ट एक्सपोजर वैक्सीनेशन का पूरा कोर्स कराया हो, उन्हें आमतौर पर RIG की जरूरत नहीं होती. ऐसे मामलों में सिर्फ बूस्टर वैक्सीन ही काफी मानी जाती है.

क्या इसके साइड इफेक्ट होते हैं?

RIG लगाने के बाद इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द, सूजन और लालपन हो सकता है. कुछ लोगों को हल्का बुखार भी आ सकता है. एलर्जी की संभावना बहुत कम होती है, हालांकि ERIG में यह खतरा HRIG की तुलना में थोड़ा ज्यादा माना जाता है. फिर भी मॉडर्न टेक्नोलॉजी से तैयार की जाने वाली ERIG पहले के मुकाबले काफी सुरक्षित मानी जाती है.

भारत में हर साल लाखों लोग कुत्तों और दूसरे जानवरों के काटने के बाद एंटीरेबीज इलाज लेते हैं. रेबीज के लक्षण एक बार शुरू हो जाएं तो यह लगभग हमेशा जानलेवा होता है. इसलिए किसी भी संदिग्ध जानवर के काटने पर सबसे पहले घाव को कम से कम 15 मिनट तक साबुन और बहते पानी से अच्छी तरह धोना, इसके बाद जितनी जल्दी हो सके रेबीज वैक्सीन लगवाना और जहां जरूरत हो वहां एंटीरेबीज इम्युनोग्लोबुलिन लगवाना रेबीज से बचाव का सबसे असरदार तरीका माना जाता है.