राजपाल यादव इन दिनों कानूनी और आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने चेक बाउंस मामले में उनकी सजा को बरकरार रखते हुए उन्हें तीन महीने की जेल की सजा सुनाई है. यह मामला कई वर्षों से अदालत में चल रहा था और आखिरकार कोर्ट ने अभिनेता के खिलाफ फैसला सुनाया.

दरअसल, ने वर्ष 2010 में अपनी पहली निर्देशित फिल्म ‘अता पता लापता’ के निर्माण के लिए मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से ₹5 करोड़ का कर्ज लिया था, लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, जिसके बाद वह तय समय पर कर्ज नहीं चुका सके. समय के साथ ब्याज जुड़ता गया और बकाया राशि बढ़कर करीब ₹9 करोड़ पहुंच गई। इसी वित्तीय विवाद ने बाद में चेक बाउंस केस का रूप ले लिया, जो लंबे समय तक अदालत में चला. आज जानेंगे की कोशिश करेंगी चेक बाउंस केस होता है? चेक बाउंस होने पर कितने साल की सजा हो सकती है?

आखिर क्या होता है चेक बाउंस?

जब किसी व्यक्ति खाते पर्याप्त पैसा नहीं होने पर चेक जारी कर देता है तो बैंक उस चेक का भुगतान नहीं कर पाता. इसे चेक बाउंस कहा जाता है. भारत में चेक बाउंस को कानून के तहत अपराध माना जाता है. इस मामले में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत चेक बाउंस होने पर कार्रवाई की जाती है. इस कानून के अनुसार दोषी पाए जाने पर
चेक की राशि का दोगुना तक जुर्माना लगाया जा सकता है. दो साल तक की जेल हो सकती है. या फिर जुर्माना और जेल, दोनों की सजा दी जा सकती है. चेक बाउंस होने पर पहले संबंधित व्यक्ति को 15 दिनों के भीतर भुगतान करने का नोटिस भेजा जाता है. अगर तय समय में भुगतान नहीं होता, तो मामला अदालत तक पहुंच सकता है.

NCRB के आंकड़े क्या कहते हैं?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, पूरे देश में नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत केवल 18 मामले दर्ज किए गए. इनमें झारखंड में 10 मामले और उत्तर प्रदेश में 8 मामले सामने आए. सभी मामले केवल चेक बाउंस से जुड़े थे. अन्य वित्तीय दस्तावेजों जैसे प्रॉमिसरी नोट या बिल ऑफ एक्सचेंज से जुड़ा कोई मामला दर्ज नहीं हुआ. विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून भारत के सबसे पुराने व्यावसायिक कानूनों में से एक है, लेकिन अब इसका इस्तेमाल पहले की तुलना में काफी कम हो गया है.