गुजरात के सूरत में टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े प्रवासी मजदूर काम के घंटे घटाने और साप्ताहिक छुट्टी की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. गांव चलो अभियान के तहत मजदूरों ने साफ कर दिया है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे काम छोड़कर अपने गांव लौट सकते हैं. आंदोलन के केंद्र में एंब्रॉयडरी मशीनों पर काम करने वाले मजदूर हैं, जिनमें बड़ी संख्या बिहार, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों से आए लोगों की है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एंब्रॉयडरी मशीनों पर काम करने वाले मजदूरों में कुल 55 फीसदी मजदूर बिहार के हैं.

मजदूरों का कहना है कि उनसे रोजाना 12 घंटे तक काम कराया जाता है और कई बार हफ्ते में छुट्टी भी नहीं मिलती. उनकी मांग है कि रोजाना 8 घंटे की शिफ्ट हो, हफ्ते में एक दिन छुट्टी मिले, जिसका पैसा न काटा जाए और काम के घंटे कम होने पर उनकी कमाई में बड़ी कटौती न की जाए. इसके लिए बुलाई गई हड़ताल के पहले ही पुलिस ने करीब 70 से ज्यादा मजदूरों को हिरासत में ले लिया. आइए जानते हैं कि मजदूरों की मुख्य मांग क्या हैं. यूपीबिहार सहित कुल कितने मजदूर इससे प्रभावित हैं और अगर मांगें मान ली जाती हैं तो इंडस्ट्री पर इसका क्या असर होगा?
क्यों शुरू हुआ मजदूरों का विरोध?
सूरत में मजदूरों के इस आंदोलन की शुरुआत अगस्त 2026 में हुई. 16 अगस्त को एंब्रॉयडरी मशीनों पर काम करने वाले हजारों मजदूरों ने काम रोककर प्रदर्शन किया. कुछ औद्योगिक इलाकों में हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी हुईं. इसके बाद श्रम विभाग ने उद्योग प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की. सितंबर में मजदूरों ने जिला कलेक्टर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर अपनी मांगें दोहराईं. उनका कहना था कि पहले भी मांगें पूरी करने का आश्वासन दिया गया, लेकिन काम के घंटे कम नहीं हुए. अभी बीते 15 अक्टूबर 2026 को मजदूर संगठनों के हड़ताल की कॉल के पहले ही पुलिस ने कई प्रदर्शनकारी मजदूरों को हिरासत में ले लिया.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामले में 80 श्रम कार्यकर्ताओं और टेक्सटाइल मजदूरों को हिरासत में लिया गया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इससे साफ है कि विवाद अब केवल फैक्ट्री के अंदर कामकाजी शर्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासन और मजदूर संगठनों के बीच भी तनाव बढ़ा है.
8 घंटे की शिफ्ट और छुट्टी क्यों चाहते हैं मजदूर?
मजदूरों का कहना है कि लंबे समय तक काम करने से उनके आराम, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन पर असर पड़ता है. प्रवासी मजदूरों को काम के अलावा खाना बनाने, रहने की व्यवस्था करने और परिवार से संपर्क बनाए रखने के लिए भी समय चाहिए. हफ्ते में छुट्टी नहीं मिलने पर उनके लिए निजी काम निपटाना और परिवार के साथ समय बिताना मुश्किल हो जाता है.
मजदूरों की मांग केवल काम के घंटे घटाने की नहीं है. वे चाहते हैं कि उन्हें साप्ताहिक सवैतनिक छुट्टी मिले और कम समय काम करने के कारण उनकी मासिक कमाई में बहुत ज्यादा कमी न हो. यही वजह है कि वेतन का सवाल इस आंदोलन में सबसे बड़ा विवाद बन गया है.
वेतन पर क्यों फंसी है बात?
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, टेक्सटाइल एम्ब्रॉयडरी जॉब वर्क एसोसिएशन ऑफ सूरत यानी तेजस ने 8 घंटे काम करने पर 14,300 रुपये महीने और 12 घंटे काम करने पर 35,000 रुपये महीने का प्रस्ताव रखा है. इन दोनों प्रस्तावों के बीच 20,700 रुपये का अंतर है. यानी 8 घंटे की शिफ्ट के लिए प्रस्तावित वेतन करीब 59 फीसदी कम है.
मजदूरों के सामने चुनौती यह है कि कम घंटे काम करने से उन्हें आराम तो मिल सकता है, लेकिन अगर उनकी कमाई काफी घट गई तो घर चलाना मुश्किल हो सकता है. दूसरी तरफ, उद्योग प्रतिनिधियों का तर्क है कि मौजूदा कारोबारी व्यवस्था में 8 घंटे की शिफ्ट लागू करना आसान नहीं है. अगर फैक्ट्रियों को उत्पादन पहले जितना ही रखना है, तो उन्हें अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती करनी पड़ सकती है. इससे वेतन और संचालन की लागत बढ़ने की आशंका है.
सूरत में कितने प्रवासी मजदूर हैं?
सूरत देश के प्रमुख टेक्सटाइल केंद्रों में से एक है. यहां कपड़ा बनाने, रंगाईछपाई, बुनाई और एंब्रॉयडरी से जुड़े कारोबार में बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों से आए लोग काम करते हैं. डाउन टू अर्थ की 15 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, मजदूर संगठनों का अनुमान है कि सूरत जिले में 25 से 30 लाख प्रवासी मजदूर रहते और काम करते हैं. इनमें 8 से 10 लाख मजदूर एंब्रॉयडरी मशीनों पर काम करने वाले बताए गए हैं. वहीं, रिपोर्ट्स के मुताबिक, सूरत में करीब 1517 लाख लोग टेक्सटाइल सेक्टर में काम करते हैं और उसमें से करीब 55 फीसदी मजदूर बिहार के हैं और उसके बाद यूपी और बाकी राज्यों के लोग हैं.
8 घंटे की शिफ्ट लागू हुई तो क्या बदलेगा?
अगर फैक्ट्रियां 8 घंटे की शिफ्ट लागू करती हैं और उत्पादन पहले जितना बनाए रखना चाहती हैं, तो उन्हें अतिरिक्त कर्मचारी रखने या काम की व्यवस्था बदलने की जरूरत पड़ सकती है. रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एंब्रॉयडरी से इंडस्ट्री में ही करीब 5 लाख लोग अतिरिक्त लगेंगे. इससे लागत बढ़ सकती है.
मजदूरों के लिए इसका फायदा यह हो सकता है कि उन्हें आराम और परिवार के लिए अधिक समय मिले. लेकिन अगर कम घंटे की शिफ्ट के साथ वेतन में बड़ी कटौती हुई, तो उनकी आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है. वहीं, अगर अतिरिक्त भर्ती और काम के बेहतर प्रबंधन से उत्पादन बनाए रखा जाता है, तो उद्योग पर असर अलग हो सकता है.
सूरत का यह विवाद इसलिए अहम है क्योंकि इसमें मजदूरों के कामकाजी अधिकार और उद्योग की लागत, दोनों जुड़े हैं. इसका समाधान केवल शिफ्ट के घंटे तय करने से नहीं निकलेगा. इसके लिए वेतन, ओवरटाइम, साप्ताहिक छुट्टी और लागू श्रम कानूनों पर स्पष्ट सहमति जरूरी होगी.



