वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चीन के साथ व्यापार में भारत को हो रहे नुकसान पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि चीन भारतीय उत्पादों को अपने बाजार में पर्याप्त पहुंच नहीं दे रहा है. चीन की ओर से लगाई जाने वाली गैरटैरिफ पाबंदियां दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने में सबसे बड़ी रुकावट हैं. सीतारमण के मुताबिक, चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है और इस साल अब तक यह 100 अरब डॉलर से ज्यादा हो चुका है.

निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को बैंकॉक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की बैठक के दौरान अटलांटिक काउंसिल के साथ बातचीत में यह बात कही. उन्होंने बताया कि चीन कई ऐसी शर्तें लागू करता है, जिनके कारण भारतीय कंपनियों को वहां अपने उत्पाद बेचने में मुश्किल होती है. उन्होंने पौधों और फसलों को बीमारियों और कीटों से बचाने के लिए बनाए गए नियमों का उदाहरण दिया. सीतारमण के मुताबिक, इन नियमों के कारण भारतीय उत्पादों के निर्यात पर असर पड़ता है. जेनेरिक दवाओं, मांस और सब्जियों जैसे उत्पादों के लिए चीन में अच्छी संभावनाएं हैं, लेकिन भारतीय निर्यातकों को वहां पर्याप्त अवसर नहीं मिल पा रहे हैं. उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने चीन के सामान पर जवाबी गैरटैरिफ पाबंदियां या एक्स्ट्रा टैरिफ लगाने का रास्ता नहीं अपनाया है.
रिश्ते सुधर रहे हैं, लेकिन व्यापार नहीं
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी इसी सप्ताह कहा था कि चीन में भारत को कारोबार के लिए समान मौके नहीं मिल रहे हैं. दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर चिंता ऐसे समय सामने आई है, जब साल 2020 में सीमा पर हुई हिंसक झड़प के बाद बिगड़े रिश्तों को सुधारने की कोशिश जारी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी दोनों देशों के संबंधों को स्थिर बनाने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं. हालांकि, कूटनीतिक बातचीत में सुधार के बावजूद व्यापार से जुड़ी समस्याएं बनी हुई हैं.
ASEAN के साथ व्यापार समझौते में बदलाव चाहती है भारत
सीतारमण ने दक्षिणपूर्व एशियाई देशों के संगठन ASEAN के साथ भारत के व्यापार समझौतों पर भी चिंता जताई. उनके मुताबिक, मौजूदा समझौतों की शर्तें भारत के पक्ष में संतुलित नहीं हैं. भारत इस समझौते को जारी रखना चाहता है, लेकिन व्यापार में असंतुलन दूर करने के लिए इसकी शर्तों में बदलाव जरूरी है.
कच्चे तेल और खाद पर निर्भरता भी चिंता
वित्त मंत्री ने कहा कि भारत की कच्चे तेल और उर्वरकों के आयात पर निर्भरता अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है. इन जरूरी वस्तुओं के आयात पर लगातार बड़ी रकम खर्च होती है, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित होता है. महंगे कच्चे तेल, विदेशी निवेशकों की ओर से पूंजी निकालने और अमेरिका में बॉन्ड पर बढ़ते रिटर्न के कारण रुपये पर भी दबाव बना हुआ है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक डॉलर बेचकर और अन्य कदम उठाकर रुपये को संभालने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, आयात की जरूरत और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों के कारण रुपये पर दबाव अब भी बना हुआ है.



