भारत में पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार लगातार वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा दे रही है. अब ऐसा फ्यूल सामने आया है, जो डीजल से कई गुना सस्ता है और प्रदूषण भी कम फैलाता है. केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक, मेथेनॉल भविष्य में ट्रक, बस, ट्रैक्टर, जहाज और भारी मशीनों के लिए बड़ा विकल्प बन सकता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसकी कीमत करीब 2022 रुपये प्रति लीटर है, जबकि डीजल की कीमत कई राज्यों में 100 रुपये प्रति लीटर से अधिक है.

हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में नितिन गडकरी ने बताया कि असम पेट्रोकेमिकल्स रोजाना करीब 700 टन मेथेनॉल का उत्पादन कर रही है. अगर आने वाले समय में इस फ्यूल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल शुरू होता है, तो ट्रांसपोर्ट सेक्टर का फ्यूल खर्च काफी कम हो सकता है. खासकर ट्रक और बस ऑपरेटर्स को इसका सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा.
पहले ही सफल हो चुका ट्रायल
मेथेनॉल को लेकर सिर्फ दावे ही नहीं किए जा रहे हैं, बल्कि इसका सफल परीक्षण भी हो चुका है. कर्नाटक में 15% मेथनॉलडीजल ब्लेंड के साथ बसों को करीब तीन महीने तक चलाया गया. इस दौरान इंजन में कोई तकनीकी समस्या नहीं आई और वाहन की परफॉर्मेंस भी संतोषजनक रही. इसके बाद देश की पॉपुलर कंपनी Ashok Leyland ने 100% मेथेनॉल पर चलने वाले डेडिकेटेड इंजन भी तैयार कर लिए हैं.
मेथेनॉल का उपयोग सिर्फ कमर्शियल ट्रकों और बसों तक सीमित नहीं रहेगा. सरकार का मानना है कि भविष्य में इसका इस्तेमाल इन क्षेत्रों में भी किया जा सकता है,जिससे डीजल की खपत कम होगी और ऑपरेटिंग कॉस्ट में भी बड़ी कमी आएगी. देखिए लिस्ट
गडकरी ने बताया कि मेथेनॉल के अलावा इथेनॉल से बनने वाला आइसोब्यूटानॉल भी डीजल का मजबूत विकल्प बनकर उभर रहा है. किर्लोस्कर ग्रुप 100% आइसोब्यूटानॉल और इथेनॉल पर चलने वाले जनरेटर सेट डेवलप कर चुका है. भविष्य में इनका इस्तेमाल कृषि उपकरणों, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और कंस्ट्रक्शन मशीनरी में किया जा सकेगा.
किसानों और देश की अर्थव्यवस्था को कैसे होगा फायदा?
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मेथेनॉल का उत्पादन देश में ही किया जा सकता है. सरकार पूर्वोत्तर राज्यों में बांस रिफाइनरी के जरिए इसका उत्पादन बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है. इससे तीन बड़े फायदे होंगे.
मेथेनॉल, इथेनॉल और आइसोब्यूटानॉल जैसे वैकल्पिक ईंधन डीजल की तुलना में कम प्रदूषण पैदा करते हैं. यही वजह है कि सरकार इन्हें सड़क परिवहन के साथसाथ जल परिवहन में भी बढ़ावा देना चाहती है. अगर इनका बड़े स्तर पर इस्तेमाल शुरू होता है, तो इससे भारत को क्लीनर एनर्जी, कम ईंधन खर्च और ऊर्जा सुरक्षा जैसे कई बड़े फायदे मिल सकते हैं.



