Mata Maurvi Shaktipeeth: राजस्थान के सीकर में स्थित खाटू श्याम बाबा का मंदिर विश्व प्रसिद्ध है. उनको ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है. रोजाना बाबा के दरबार में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. अब जिले के पिपराली स्थित लखीपुरा में आस्था का एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है. यहां दो हेक्टेयर जमीन पर खाटू श्याम बाबा की माता मौरवी का शक्तिपीठ बनाया जाएगा.

इस मंदिर की सबसे विशेष बात ये होगी कि माता मौरवी के साथ उनके 14 साल के पुत्र बर्बरीक का पूरा देह स्वरूप होगा. यहां उनके शीश दान से पहले के मातापुत्र संबधों, संस्कारों और शौर्य की गाथा केंद्र में होगी. ब्रह्मलीन संत श्रीचंद महाराज की दान दी गई जमीन पर ये मंदिर सिर्फ केंद्र में नहीं, बल्कि आधुनिक डिजिटल गैलरी, वैदिक संस्कार शाला, औषधीय उद्यान और चैरीटेबल ट्रस्ट का हब बनेगा.

मंदिर को बनाने में 500 करोड़ रुपये की लागत आएगी

मंदिर को बनाने में 500 करोड़ रुपये की लागत आएगी. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। मंदिर का मुख्य शिखर 120 फीट ऊंचा होगा. नवंबर में मंदिर का भूमि पूजन होगा. सनातन धर्म रक्षा अखाड़ा परिषद के आचार्य महामंडलेश्वर और माता मौरव शक्तिपीठ के पीठाधीश्वर डॉक्टर दीनदयाल परियोजना का नेतृत्व करेंगे. परियोजना के लिए जयपुर के सिविल लाइंस में माता मौरवी की अखंड ज्योति जला दी गई है.

जानकारी के अनुसार, ये ज्योति खास रूप से माता मौरवी मंदिर और माता मौरवी शक्तिपीठ के लिए जलाई गई है. जब मंदिर बन जाएगा और प्रतिमा की प्रतिष्ठा हो जाएगी तो इस पावन अखंड ज्योति को लखीपुरा शक्तिपीठ में स्थापित किया जाएगा. इस प्रजोक्ट से सूएई, यूके, यूएस, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर समेत 10 देशों और 18 राज्यों के 111 शहरों के प्रतिनिधि जुड़ रहे हैं.

पहला पूर्व देह स्वरूप होगा

खाटूधामसालासरजीणमाता त्रिकोण में शक्तिपीठ के जुड़ जाने से शेखावटी में धार्मिक पर्यटन 40 फीसदी बढ़ेगा. इससे स्थानीय होटल, हैंडीक्राफ्ट, ट्रांसपोर्ट व कुटिर उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा. गौरतलब है कि खाटूधाम में सिर्फ बाबा के शीश को पूजा जाता है. जबकि लखीपुरा के शक्तिपीठ में माता मौरवी के साथ 14 साल के बर्बकीक की पूरी देह की प्रतिमा विराजमान की जाएगी.

महाभारत युद्ध के समय जब माता मौरवी अपने पुत्र बर्बरीक को युद्ध के लिए भेज रही थीं तो उन्होंने उनसे वचन लिया था ‘जो पक्ष हार रहा हो, उसी का साथ देना.’ मां को दिए इसी वचन की वजह से वो ‘हारे का सहारा’ कहलाए और भगवान कृष्ण अपना शीश दान किया.