वकील और भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने कहा, “कांग्रेस पार्टी में इतने सारे सीनियर वकील हैं. क्या उनमें से किसी ने नेताओं को यह नहीं बताया कि चीफ जस्टिस व्यक्तिगत रूप से हर मामले की सुनवाई नहीं करते हैं? हमारे देश में अजीब चीजें हो रही हैं. अखबार की एक रिपोर्ट के आधार पर भारी विवाद खड़ा कर दिया गया है.”

उन्होंने कहा, “क्या हर दिन हंगामा करना जरूरी है? क्या दिल्ली के लोगों को परेशानी में डालना जरूरी? त्योहारों का मौसम आ रहा है. दुकानदारों को चिंता है कि विरोध प्रदर्शनों से उनके कारोबार पर असर पड़ सकता है.”

‘संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बनाया जाना सही नहीं’

पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने बुधवार को भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेंद्र कुमार के खिलाफ़ विपक्षी दलों के विरोधप्रदर्शन की आलोचना की थी. यह विरोध मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ को लेकर हो रहा है. साल्वे ने कहा कि राजनीतिक आलोचना को अपनी “उचित सीमाओं” के भीतर रहना चाहिए और संवैधानिक संस्थाओं को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए.

पूर्व सॉलिसिटर साल्वे ने कहा कि राजनीतिक दलों को अपने विरोधियों की आलोचना करने की आजादी है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर हमले देश के संस्थागत ढांचे के कामकाज को कमजोर कर सकते हैं. साल्वे ने कहा, “मुझे लगता है कि राजनीति अपनी उचित सीमाओं से थोड़ी आगे बढ़ रही है. मैं राजनीतिक दलों और राजनीतिक विरोधियों की आलोचना को तो समझ सकता हूं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक हमलों का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए और आज ठीक यही होता दिख रहा है.”

तीन सदस्यीय वाले पैनल पर क्या बोले साल्वे?

तीन सदस्यों वाले पैनल के आम तौर पर काम करने के तरीके के बारे में बताते हुए, साल्वे ने कहा कि अगर कोई सदस्य किसी फैसले से सच में सहमत नहीं है, तो उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी असहमति दर्ज कराए या उठाए, न कि फैसले को सर्वसम्मति से लिया गया फैसला बताया जाए. उन्होंने कहा, “अगर पैनल में तीन लोग हैं, और मैं असहमति जता रहा हूं, मेरा साथी असहमति जता रहा है और तीसरा व्यक्ति कहता है, ‘नहीं, यह सर्वसम्मति से लिया गया फैसला है,’ तो मैं कहूंगा, ‘नहीं, माफ कीजिए, ये गलत है, कोई फैसला नहीं हुआ है, मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा.”

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