एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक की भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू होने का इंतजार लंबा होता जा रहा है. कंपनी के जून 2025 में प्राथमिक लाइसेंस मिला था, मगर अभी 15 महीने पूरे हो गए हैं और सर्विस लॉन्च नहीं हुई. अब इस मुद्दे पर बहस सियासी रंग भी ले चुकी है. मस्क ने रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके समर्थकों के तर्क विरोधाभासी हैं. इसके जवाब में सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि स्टारलिंक से देश की सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौतियां पैदा हो सकती हैं. ऐसे में सवाल है कि स्टारलिंक को अब तक किन मंजूरियों के लिए इंतजार करना पड़ रहा है और भारत में इसकी सर्विस शुरू होने का रास्ता कहां अटका है.

बीजेपी सांसद और संसदीय समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने स्टारलिंक को लेकर सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं जताई हैं. उन्होंने कहा कि स्टारलिंक की वजह से देश की सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौतियां पैदा हो रही हैं. उनके मुताबिक, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय और जांच एजेंसियां भी इन खतरों से प्रभावित हो रही हैं. दुबे ने यह भी कहा कि 201314 में मनमोहन सिंह सरकार ने इन खतरों को लेकर टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया को जानकारी दी थी.
निशिकांत दुबे ने एलन मस्क को सलाह दी कि भारत पर सवाल उठाने से पहले वह अमेरिका में गरीब लोगों को सस्ती दरों पर इंटरनेट उपलब्ध कराएं. उन्होंने कहा कि भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश है और सोशल मीडिया या किसी दूसरे दबाव में अपनी सुरक्षा नीति नहीं बदलता. अगर भारत में सिर्फ पैसे को प्राथमिकता दी जाती, तो सुरक्षा एजेंसियों की चिंताओं के बावजूद स्टारलिंक को मंजूरी दे दी गई होती.
किन मुद्दों पर बन चुकी है बात?
- लाइसेंस और शुरुआती मंजूरियां दूरसंचार विभाग ने जून 2025 में स्टारलिंक को ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट लाइसेंस दिया था. इसके बाद जुलाई 2025 में INSPACe ने कंपनी के Gen1 सैटेलाइट समूह को मंजूरी दी. सितंबर 2025 में ट्रायल के लिए अस्थायी स्पेक्ट्रम भी दिया गया. यानी कंपनी को भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने की दिशा में कुछ जरूरी मंजूरियां मिल चुकी हैं, लेकिन सभी प्रक्रियाएं अभी पूरी नहीं हुई हैं.
- सुरक्षा से जुड़ी शर्तों पर सहमति केंद्रीय मंत्री पेम्मासानी चंद्रशेखर के मुताबिक, स्टारलिंक उन सुरक्षा शर्तों पर सहमत हुई है, जो सैटेलाइट इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियों पर लागू होती हैं. इनमें भारत में अर्थ स्टेशन गेटवे बनाना, भारतीय यूजर के डेटा की कॉपी या उसे डिक्रिप्ट करने की प्रक्रिया विदेश में नहीं रखना और यूजर ट्रैफिक की कॉपी विदेशी सर्वर पर नहीं बनाना जैसी शर्तें शामिल हैं.
- गेटवे और डेटा की व्यवस्था कंपनी का कहना है कि उसने भारत में 20 गेटवे साइट तैयार कर ली हैं. साथ ही, भारतीय यूजर के डेटा को देश के भीतर रखने के लिए अलग व्यवस्था भी बनाई गई है. हालांकि, केवल गेटवे तैयार होने से सुरक्षा मंजूरी की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना है कि नेटवर्क का इस्तेमाल करते समय भारतीय नियमों और सुरक्षा शर्तों का पालन हो.
- स्पेक्ट्रम आवंटन का रास्ता सरकार ने सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों को स्पेक्ट्रम देने के लिए नीलामी के बजाय प्रशासनिक आवंटन का रास्ता चुना है. यह तरीका स्टारलिंक की मांग के अनुरूप है. हालांकि, इस व्यवस्था पर टेलीकॉम कंपनियों ने सवाल उठाए थे. रिलायंस जियो का तर्क रहा है कि सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों को ऐसी शर्तों पर स्पेक्ट्रम नहीं मिलना चाहिए, जिससे उन्हें पारंपरिक टेलीकॉम कंपनियों के मुकाबले अनुचित फायदा मिले.
- आधार KYC और भारतीय कंपनियों से समझौते अगस्त 2025 में UIDAI ने स्टारलिंक को आधार ऑथेंटिकेशन की सुविधा के लिए अपने सिस्टम से जुड़ने की मंजूरी दी. वहीं, मार्च 2025 में स्टारलिंक ने रिलायंस जियो और भारती एयरटेल के साथ वितरण समझौते किए थे. इन समझौतों से भारत में कंपनी की सेवाओं को बाजार तक पहुंचाने का रास्ता तैयार हुआ, लेकिन इससे सर्विस लॉन्च की बाकी मंजूरियां अपने आप नहीं मिल जातीं.
किन मुद्दों पर अब भी फंसा है पेंच?
- सुरक्षा मंजूरी सबसे बड़ी चुनौती स्टारलिंक की सर्विस शुरू होने में सुरक्षा से जुड़ी जांच अहम मुद्दा है. अधिकारियों की चिंता है कि कंपनी का सैटेलाइट नेटवर्क देशों की सीमाओं के हिसाब से काम नहीं करता. इसके सैटेलाइट आपस में लेजर लिंक के जरिए डेटा भेज सकते हैं. ऐसे में सरकार यह जांच रही है कि भारत के यूजर का डेटा कहीं भारतीय गेटवे से गुजरे बिना दूसरे देश के नेटवर्क तक तो नहीं पहुंच सकता. सरकार यह भी सुनिश्चित करना चाहती है कि जरूरत पड़ने पर सुरक्षा एजेंसियां नेटवर्क की निगरानी कर सकें और आपात स्थिति या संघर्ष के दौरान सेवा पर जरूरी नियंत्रण रखा जा सके. जब तक इन पहलुओं पर संतोषजनक व्यवस्था सुनिश्चित नहीं होती, तब तक सुरक्षा मंजूरी का मामला अहम बना रहेगा.
- स्पेक्ट्रम की कीमत पर अंतिम फैसला स्टारलिंक को सर्विस शुरू करने के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन भी जरूरी है. सितंबर में आई रिपोर्टों के मुताबिक, डिजिटल कम्युनिकेशंस कमीशन ने TRAI की ज्यादातर सिफारिशों को मंजूरी दे दी थी. हालांकि, एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू के 5 फीसदी के बराबर शुल्क के प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार था. संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 9 अक्टूबर को कहा था कि कीमत को लेकर फैसला करीब है. स्पेक्ट्रम की कीमत और उससे जुड़ी शर्तें तय होने के बाद ही आवंटन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी. इसलिए यह मामला भी सर्विस लॉन्च की समयसीमा को प्रभावित कर रहा है.
- FDI मंजूरी का इंतजार स्टारलिंक की भारतीय इकाई स्पेसएक्स की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है. कंपनी के निवेश और मालिकाना ढांचे को लेकर अधिकारियों ने सवाल उठाए थे. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश से जुड़ी मंजूरी भी लंबित है. इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद ही कंपनी के लिए भारत में कारोबार से जुड़ी बाकी औपचारिकताएं पूरी करने का रास्ता साफ होगा.
स्टारलिंक पर दूसरे देशों में भी उठे सुरक्षा के सवाल
यूक्रेन की सैन्य खुफिया एजेंसी ने आरोप लगाया था कि रूसी सेना कब्जे वाले इलाकों में स्टारलिंक टर्मिनल का इस्तेमाल कर रही है. एलन मस्क ने इन आरोपों को पूरी तरह गलत बताया था. अमेरिकी एजेंसी USAID के इंस्पेक्टर जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक, USAID की ओर से दिए गए सक्रिय टर्मिनलों में से लगभग आधे रूस के पूर्ण या आंशिक कब्जे वाले इलाकों में थे.
रिपोर्ट में टर्मिनलों के गलत इस्तेमाल का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होने की बात कही गई थी. हालांकि, इससे यह साबित नहीं होता कि कंपनी ने जानबूझकर रूसी सेना की मदद की. भारत में भी अधिकारी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जरूरत पड़ने पर कंपनी को किसी इलाके में सेवा बंद करने या नेटवर्क पर पाबंदी लगाने का निर्देश दिया जा सके.
मंजूरी मिली तो सुरक्षा में क्या दिक्कतें आ सकती हैं?
1. ट्रैफिक का रास्ता
स्टारलिंक के सैटेलाइट लेजर लिंक से डेटा भेज सकते हैं. इसलिए सरकार चाहती है कि भारतीय यूजर का ट्रैफिक तय सुरक्षा नियमों के मुताबिक घरेलू गेटवे से गुजरे. DoT के मई 2025 के निर्देशों में घरेलू गेटवे, कानूनी निगरानी, टर्मिनल की पहचान, लोकेशन की निगरानी और जियोफेंसिंग जैसी शर्तें शामिल थीं.
2. दूसरे देशों से लाए गए टर्मिनल
म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों से टर्मिनल लाकर भारतीय सीमावर्ती इलाकों में इस्तेमाल किए जाने की आशंका भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है. मणिपुर के मामले में भी ऐसे इस्तेमाल की आशंका जताई गई थी. इसलिए टर्मिनल की पहचान और उनके इस्तेमाल पर निगरानी जरूरी है.
3. नेटवर्क बंद करने का अधिकार
कांग्रेस ने सवाल उठाया था कि जरूरत पड़ने पर स्टारलिंक की सेवा चालू या बंद करने का अधिकार किसके पास होगा. सुरक्षा के लिहाज से सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि आपात स्थिति में उसके निर्देशों के मुताबिक नेटवर्क पर रोक लगाई जा सके.



