कर्नाटक हाई कोर्ट ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान 778 फॉर्म 7 आवेदन जमा करने के आरोपी दो व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर अंतरिम रोक लगा दी है. इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य अभियोजन पक्ष से सवाल किया कि 50 से अधिक ऐसे आवेदन जमा करने को अपराध मानने का कानूनी आधार क्या है.

शुक्रवार को जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े की सिंगल बेंच ने गुट्टाहल्ली निवासी जी एस वसंतलक्ष्मी और आर दीपक सिंह द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई की. याचिकाकर्ताओं ने कथित तौर पर गलत जानकारी वाले आवेदन जमा करने के लिए अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की है.
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील एम अरुण श्याम ने हाई कोर्ट में दलील दी कि उनके मुवक्किल बूथ स्तर के एजेंट थे, जिन्होंने मतदाता सूची से अयोग्य नामों को हटाने का अनुरोध किया था.
सरकारी वकील ने किया विरोध
वहीं याचिकाओं का विरोध करते हुए अतिरिक्त सरकारी वकील अनूप कुमार ने कहा कि एक व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा 50 आवेदन ही जमा कर सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर मतदाता सूची से मतदाताओं के नाम हटवाने का प्रयास किया था.
बीजेपी के एजेंटों के खिलाफ FIR
दरअसल जयनागर विधानसभा क्षेत्र में मतदाता सूची से 5,698 मतदाताओं को हटाने के लिए फर्जी फॉर्म 7 आवेदन जमा करने के आरोप में दो बीजेपी के बूथ स्तरीय एजेंटों और अन्य के खिलाफ बेंगलुरु में FIR दर्ज की गई थी. कांग्रेस नेता द्वारा FIR दर्ज कराई गई थी. कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया था कि बीएलए ने मल्लेश्वरम विधानसभा क्षेत्र में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से पात्र मतदाताओं को हटाने के लिए कई फर्जी आवेदन जमा किए.
क्या है आरोप
जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े ने बीएलए के जी.एस. वसंतलक्ष्मी और दीपक सिंह आर. द्वारा दायर याचिकाओं पर अंतरिम आदेश पारित किया. व्यालिकवल और यशवंतपुर पुलिस ने इन दोनों के खिलाफ 2023 के विधानसभा चुनावों में मल्लेश्वरम से कांग्रेस के उम्मीदवार अनूप अयंगर द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर अलगअलग FIR दर्ज की थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वसंतलक्ष्मी और दीपक सिंह ने क्रमशः 778 और 136 फॉर्म 7 आपत्तियां दर्ज कराई थीं, जिनमें मतदाताओं के बारे में झूठे दावे किए गए थे कि वे या तो स्थानांतरित हो गए थे या अनुपस्थित थे.
इन पर आरोप था कि उन्होंने मल्लेश्वरम विधानसभा क्षेत्र के वार्ड नंबर 64 के 778 और वार्ड नंबर 45 के 136 वोटरों के संबंध में ‘फॉर्म 7’ के तहत आपत्तियां दर्ज कराई थीं. यह सब SIR प्रक्रिया के दौरान हुआ था.
जस्टिस अनंत रामनाथ हेगड़े ने वसंत लक्ष्मी और दीपक सिंह की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह अंतरिम आदेश दिया. इन याचिकाओं में 2 और 5 अक्टूबर को यशवंतपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए गए थे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ये FIR अनूप अयंगर ने दर्ज कराई थीं, जिन्होंने 2023 के चुनावों में मल्लेश्वरम से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था.
आरोप था कि बीजेपी और RSS के कार्यकर्ताओं ने एक खास समुदाय को निशाना बनाते हुए ‘फॉर्म 7’ जमा किए थे. इनमें कहा गया था कि वे वोटर वहां मौजूद नहीं हैं या स्थायी रूप से कहीं और चले गए हैं, जबकि असल में वे उसी विधानसभा क्षेत्र में रह रहे थे.
‘वे केवल अपनी ड्यूटी निभा रहे थे’
कोर्ट में दायर याचिकाओं में कहा गया कि याचिकाकर्ता BLA हैं और वे केवल अपनी ड्यूटी निभा रहे थे. यह ड्यूटी कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा 23 जून, 2026 को जारी नोटिफिकेशन के तहत तय की गई थी, जिसमें SIR में BLA की भूमिका बताई गई है. इस नोटिफिकेशन के अनुसार, BLO को मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के BLA के साथ मिलकर ड्राफ्ट वोटर लिस्ट की जांच करनी होती है और जरूरी सुधारों की पहचान करनी होती है.
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि दावों और आपत्तियों को दर्ज करने और उन पर फ़ैसला लेने की प्रक्रिया ‘रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट’ के भाग III और ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स’ के तहत आती है. उनका कहना है कि RP एक्ट की धारा 31 के तहत अपराध, जिसमें एक साल तक की सज़ा हो सकती है, BNSS के तहत ‘नॉनकॉग्निज़ेबल’ और ‘बेलेबल’ अपराध है.
मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जांच नहीं
पुलिस BNSS की धारा 174 के तहत मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना ऐसे अपराध की जांच नहीं कर सकती. हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जिन FIRs पर सवाल उठाए गए हैं, उन्हें दर्ज करके जरूरी कानूनी पाबंदियों को दरकिनार करने की कोशिश की गई है. इस तरह, एक ‘नॉनकॉग्निज़ेबल’ अपराध को ‘कॉग्निज़ेबल’ अपराध बना दिया गया है, जिसमें 7 साल तक की सज़ा हो सकती है.
याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि RP एक्ट की धारा 22 और नियम 13 के तहत, जिस व्यक्ति का नाम पहले से ही वोटर लिस्ट में शामिल है, वह फ़ॉर्म 7 में किसी दूसरे व्यक्ति का नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति जता सकता है. साथ ही किसी वोटर के एक साथ कई आपत्तियां दाखिल करने पर कोई रोक नहीं है.
RP एक्ट की धारा 13CC के तहत, वोटर लिस्ट में सुधार के काम में लगे ERO, AERO, BLA और BLOs को भारत के चुनाव आयोग में डेपुटेशन पर माना जाता है. फ़ॉर्म 7 के तहत आपत्तियों को लेना, उनकी जांचपड़ताल करना, उनका निपटारा करना और उन पर फ़ैसला लेना पूरी तरह से ECI और उसके अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आता है.
हालांकि, याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस मामले में एक निजी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के कहने पर उन आपत्तियों की सच्चाई की पुलिस जांच शुरू करना जो अभी भी चुनावी मशीनरी के पास लंबित हैं एक संवैधानिक प्रक्रिया के बीच में दखल देने जैसा होगा.



