महाराष्ट्र में माओवादी फ्रंटल संगठनों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है. राज्य सरकार ने ‘महाराष्ट्र स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट, 2025’ के बचाव में बॉम्बे हाई कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है, जिसमें सरकार ने बताया कि महाराष्ट्र में 64 संगठन सक्रिय हैं. वहीं, अपने हलफनामें में सरकार ने बाकी राज्यों के बारे में भी जानकारी दी है, जिसमें बताया है कि तेलंगाना में 29 और आंध्र प्रदेश में 19 माओवादी फ्रंटल संगठन हैं.

पांच राज्यों में 80 माओवादी फ्रंटल संगठन

महाराष्ट्र सरकार ने हलफनामे में गृह मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए 6 राज्यों में माओवादी फ्रंटल संगठनों की स्थिति बताई है. जिसमें बताया कि इस समय छत्तीसगढ़ में 11, ओडिशा में 7, झारखंड में 14, आंध्र प्रदेश में 19 और तेलंगाना में 29 संगठन हैं.

इन राज्यों में कुल 80 माओवादी फ्रंटल संगठन बताए गए हैं. इनमें से 46 संगठनों पर प्रतिबंध लगा हुआ है. छत्तीसगढ़ के सभी 11, ओडिशा के सभी 7 और झारखंड के सभी 14 संगठन प्रतिबंधित हैं. आंध्र प्रदेश के 19 में से 7 और तेलंगाना के 29 में से 7 संगठनों पर बैन है. हालांकि, महाराष्ट्र के 64 संगठनों में से कितने प्रतिबंधित हैं, इसकी संख्या हलफनामे में नहीं बताई गई है.

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा संगठन क्यों?

महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि राज्य में शहरी आबादी ज्यादा होने की वजह से यह माओवादी गतिविधियों के शहरी नेटवर्क का अहम केंद्र बन गया है. सरकार के मुताबिक, पड़ोसी राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र में पहले ऐसे संगठनों पर कार्रवाई के लिए कोई अलग जन सुरक्षा कानून नहीं था.

सरकार ने यह भी कहा है कि केंद्र की सुरक्षा संबंधी व्यय यानी एसआरई योजना के तहत राज्यों के लिए ऐसे कानून का होना जरूरी था. माओवाद विरोधी अभियानों के लिए इस योजना के तहत राज्यों को फंड मिलता है.

हलफनामे में 2020 के केंद्रीय ढांचे का भी जिक्र किया गया है. सरकार के मुताबिक, इसका मकसद शहरी माओवादी नेटवर्क की फंडिंग रोकना और माओवादी फ्रंटल संगठनों पर कार्रवाई करना है.

15 हजार से ज्यादा आपत्तियों की समीक्षा का दावा

महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कानून बनाने से पहले पर्याप्त सार्वजनिक राय नहीं ली गई. राज्य सरकार ने इस आरोप को खारिज किया है.

सरकार का कहना है कि संयुक्त समिति ने कानून पर मिली 15 हजार से ज्यादा लिखित आपत्तियों की समीक्षा की. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसके बाद कुछ प्रमुख शब्दों में बदलाव किए गए और कानूनी सुरक्षा के प्रावधान जोड़े गए.

राज्य सरकार ने कानून को ऐसा तंत्र बताया है, जिसका मकसद लोकतांत्रिक व्यवस्था को उन संगठनों से बचाना है जो नियमों का पालन करने का दिखावा करते हुए देश को कमजोर करने की कोशिश करते हैं. सरकार का कहना है कि कानून नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाता है.

सरकार ने याचिकाएं खारिज करने की मांग की

महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट से कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को शुरुआत में ही खारिज करने की मांग की है. सरकार का तर्क है कि याचिकाकर्ताओं को कानून से कोई प्रत्यक्ष कानूनी नुकसान नहीं हुआ है.

ऐसे में उन्हें कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने का अधिकार नहीं है. हलफनामे में कहा गया है कि किसी कानून को केवल जिज्ञासा या अकादमिक बहस के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती. इसके लिए वास्तविक शिकायत और कानूनी नुकसान होना जरूरी है.

इन याचिकाओं में कांग्रेस और भाकपा यानी सीपीआई शामिल हैं. कुछ रिपोर्टों के मुताबिक सामाजिक कार्यकर्ताओं और एआईटीयूसी की ओर से भी याचिकाएं दाखिल की गई हैं. चीफ जस्टिस एम.सी. त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की पीठ ने याचिकाकर्ताओं को सरकार के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने का समय दिया है.

2025 में विधानसभा ने पास किया था कानून

महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा विधेयक को राज्य विधानसभा ने 10 जुलाई 2025 को पास किया था. उस समय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 64 वामपंथी चरमपंथी संगठन हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि दूसरे राज्यों में प्रतिबंधित कुछ संगठन महाराष्ट्र में सक्रिय हैं.

राज्य सरकार का तर्क रहा है कि यूएपीए के तहत शहरी माओवादी फ्रंटल संगठनों से जुड़े लोगों को दोषी ठहराना कई मामलों में मुश्किल रहा है. इसी वजह से राज्य में अलग जन सुरक्षा कानून की जरूरत बताई गई.

महाराष्ट्र से पहले आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में ऐसे जन सुरक्षा कानून लागू हो चुके हैं. महाराष्ट्र के नए कानून के तहत सभी अपराध संज्ञेय और गैरजमानती हैं.

विपक्ष और नागरिक अधिकार संगठनों ने कानून की कुछ परिभाषाओं को अस्पष्ट बताते हुए इसके दुरुपयोग की आशंका जताई है. वहीं, सरकार का कहना है कि कानून विरोधप्रदर्शन के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगा और किसी संगठन पर कार्रवाई से पहले सलाहकार बोर्ड के सामने सुनवाई का प्रावधान रहेगा.

माओवादी फ्रंटल संगठन क्या होते हैं?

माओवादी फ्रंटल संगठन ऐसे ग्रुप या संगठन होते हैं, जो बाहर से सामाजिक, छात्र, मजदूर, मानवाधिकार या दूसरे मुद्दों पर काम करते दिख सकते हैं, लेकिन सरकार या सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक वे माओवादी नेटवर्क को प्रचार, फंडिंग, भर्ती, लॉजिस्टिक मदद या दूसरे तरीकों से सपोर्ट करते हैं. आसान शब्दों में, ये माओवादी आंदोलन के सपोर्ट नेटवर्क माने जाते हैं, जरूरी नहीं कि इनके सभी सदस्य सीधे हथियारबंद गतिविधियों में शामिल हों.