देश की संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर पूर्व न्यायाधीशों और संवैधानिक पदों से जुड़े सेवानिवृत्त लोगों के एक समूह ने चिंता जताई है. 7 अक्टूबर 2026 को जारी खुले पत्र An Open Letter to the People of India In Defence of Our Constitutional Institutions में कहा गया है कि संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमले किए जा रहे हैं और इस बहस के केंद्र में है. पत्र में उच्च न्यायपालिका और वैधानिक एजेंसियों को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है.

बिना प्रमाण आरोप लगाने पर सवाल
खुले पत्र में कहा गया है कि संस्थाओं की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उन्हें अविश्वसनीय, कठपुतली या समझौता किया हुआ बताना अलग बात है. पत्र के अनुसार, सार्वजनिक मंचों से संस्थाओं और चुनाव अधिकारियों पर कई आरोप लगाए गए हैं, लेकिन किसी अदालत ने इन आरोपों को प्रमाणित नहीं किया है.
पत्र में वोट चोरी जैसे आरोपों का भी उल्लेख करते हुए कहा गया कि ऐसे आरोप प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए जाते हैं, जबकि संबंधित संस्थाओं की ओर से साक्ष्य या शपथपत्र मांगे जाने पर पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आते. ईवीएम पर सवाल उठाने को लेकर भी पत्र में कहा गया कि चुनाव में हार के बाद मशीनों पर सवाल उठते हैं, जबकि जीत के समय इन्हीं मशीनों पर संदेह नहीं किया जाता.
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
पत्र में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का बचाव किया गया है. इसमें कहा गया कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 21 के तहत आयोग को मतदाता सूची में संशोधन और पुनरीक्षण का अधिकार प्राप्त है. पत्र के अनुसार, SIR का उद्देश्य मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, डुप्लीकेट प्रविष्टियों को समाप्त करना, स्थानांतरित मतदाताओं के नामों को सही करना और पात्र नागरिकों को सूची में शामिल करना है.
पत्र में दावा किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वैध और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में माना तथा इसके उद्देश्य को उचित ठहराया। पत्र में कहा गया कि इस प्रक्रिया में सुनवाई, आपत्ति और अपील जैसे पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं.
राजनीतिक दलों और मीडिया को दी सलाह
पूर्व न्यायाधीशों ने राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे चुनाव लड़ें, लेकिन चुनाव प्रक्रिया को अवैध ठहराने से बचें. किसी भी शिकायत को चुनाव आयोग और अदालतों के समक्ष साक्ष्य के साथ रखा जाए.
मीडिया से कहा गया है कि वह बिना जांचेपरखे अटकलों और आरोपों को आगे न बढ़ाए. पत्र में स्पष्ट किया गया कि हेडलाइन अपने आप में सबूत नहीं होती और किसी आरोप को बारबार दोहराने से वह सच साबित नहीं हो जाता.
संवैधानिक संस्थाओं से पारदर्शी रहने, वैध चिंताओं का स्पष्ट जवाब देने और राजनीतिक विवादों से ऊपर रहने की अपील की गई है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। वहीं नागरिकों से तथ्य जांचने और अपने मताधिकार पर भरोसा बनाए रखने को कहा गया है.
संस्थाएं किसी सरकार की नहीं, जनता की हैं
खुले पत्र में कहा गया है कि संवैधानिक संस्थाएं किसी एक सरकार या राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि भारत की जनता की हैं. इन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर हमला अंततः उन संस्थाओं पर हमला है जो नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करती हैं. पत्र के अंत में नागरिकों से लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा और उनकी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए खड़े होने की अपील की गई है.
कई पूर्व न्यायाधीशों के हस्ताक्षर
पत्र के साथ दी गई सूची में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों के नाम शामिल हैं. सूची में पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस पंकज मित्तल, तथा जम्मूकश्मीर एवं दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.सी. पटेल समेत कई सेवानिवृत्त न्यायाधीश शामिल हैं. इसके अलावा कर्नाटक, सिक्किम, गुजरात, दिल्ली, कर्नाटकओडिशा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों के नाम भी हस्ताक्षरकर्ताओं में हैं.



