एक शाम, एक बाइक सवार सड़क के गड्ढे से टकराता है, संभलतेसंभलते बच जाता है. वह मन ही मन ‘सरकार’ को कोसता है और आगे बढ़ जाता है. पर कौन सी सरकार? सच्चा जवाब यह है कि यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि यह सड़क कौन सी है, और ज़्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं होता कि कैसे पहचानें. भारत की सड़कें कई परतों में बंटी हैं, कुछ वैसे ही जैसे सरकार खुद कई परतों में बंटी है. राष्ट्रीय राजमार्ग, यानी राज्यों और शहरों को जोड़ने वाली लंबी सड़कें, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण बनाता और संभालता है, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अधीन.

राज्य राजमार्ग, यानी किसी राज्य के भीतर शहरों को जोड़ने वाली सड़कें, आमतौर पर उस राज्य के लोक निर्माण विभाग की ज़िम्मेदारी होती हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ज़िला और ग्रामीण सड़कें अक्सर उसी लोक निर्माण विभाग के पास होती हैं, या गांवों में पंचायत के पास. और शहर के ज़्यादातर घरों के ठीक बाहर की सड़क, जिस पर लोग हर दिन चलते और गाड़ी चलाते हैं, वह नगर निगम की होती है.

भारत में गड्ढों की वजह से मौतें

चार अलगअलग तरह की सड़कें. चार अलगअलग मालिक. एक ड्राइवर, जिसे लगभग कभी पता नहीं होता कि कौन सी सड़क किसकी है. यह सिर्फ एक असुविधाजनक बात नहीं है. इसकी एक असल, मापी जा सकने वाली कीमत है. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने खुद संसद में जो आंकड़े रखे, उनके मुताबिक भारत में गड्ढों की वजह से होने वाली मौतें 2020 में 1,555 से बढ़कर 2024 में 2,385 हो गईं, यानी सिर्फ पांच सालों में 53 प्रतिशत की बढ़ोतरी.

इस दौरान गड्ढों से जुड़ी दुर्घटनाओं में 9,400 से ज़्यादा लोगों की जान गई. अकेले उत्तर प्रदेश में 5,100 से ज़्यादा मौतें हुईं, यानी देश भर की मौतों का आधे से भी ज़्यादा हिस्सा. ये दुर्घटनाएं उस मायने में “दुर्घटना” नहीं हैं, जिसमें कुछ अनजाने में, बिना चेतावनी के हो जाए. कोई गड्ढा रातोंरात नहीं बन जाता. यह महीनों में, धीरेधीरे बड़ा होता है, आमतौर पर मानसून की बारिश से सड़क की सतह कमज़ोर होने के बाद. हर दिन कोई न कोई उस गड्ढे के पास से गुज़रता है, यह जानते हुए कि यह और बिगड़ता जा रहा है.

सड़क का मालिकाना हक किसका?

असल सवाल यह नहीं है कि किसी ने देखा या नहीं. असल सवाल यह है कि जिसका काम था इसे ठीक करना, क्या उसे यह पता भी था कि यह ज़िम्मेदारी उसी की है? यहीं नागरिकों को सच में अटकना पड़ता है. अगर आपको यह पता ही नहीं कि सड़क का यह टुकड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग है, राज्य राजमार्ग है, या नगर निगम की सड़क है, तो आप यह भी नहीं जान सकते कि किसे फोन करें. और स्ट्रीटलाइट के उलट, जो लगभग हमेशा नगर निगम की ही होती है, सड़क का मालिकाना हक हर जगह बदल जाता है, कभीकभी एक ही सफर के बीच में भी.

इसे पहचानने का एक आसान तरीका है, बस पता होना चाहिए कि कहां देखना है. राष्ट्रीय राजमार्गों के नंबर से पहले “एनएच” लिखा होता है. राज्य राजमार्गों के आगे “एसएच” होता है. इन दोनों को आम तौर पर नगर निगम की मरम्मत सूची में नहीं आना चाहिए, भले ही वे किसी शहर के बीचोंबीच से क्यों न गुज़रें. बाकी सब, यानी घरों, दुकानों और स्कूलों के बीच की आम सड़कें, आमतौर पर नगर निगम का काम होती हैं.

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण एक टोलफ्री हेल्पलाइन नंबर, 1033, भी चलाता है, खास तौर पर राष्ट्रीय राजमार्गों की समस्याओं के लिए, जिसमें गड्ढे, दुर्घटनाएं और गाड़ी खराब होना शामिल है. ज़्यादातर राज्यों के लोक निर्माण विभाग और नगर निगम भी अब फोन लाइन या मोबाइल ऐप के ज़रिए शिकायतें लेते हैं, हालांकि हर शहर में इसकी जानकारी अलगअलग होती है.

अधिकारियों को अदालतों ने कई बार फटकारा

इससे यह मतलब नहीं निकलता कि शिकायत मिलने के बाद देर से मरम्मत होना सही है. अलगअलग स्तर के अधिकारियों को अदालतों ने कई बार फटकार लगाई है, जब उन्होंने खतरनाक सड़कों को बेवजह लंबे समय तक ठीक नहीं कराया. पर जो शिकायत गलत दफ्तर तक जाती है, वह शायद ही कभी सही मेज़ तक पहुंचती है. वह बस उस व्यवस्था में कहीं खो जाती है, जो अधिकारक्षेत्र के हिसाब से, काफी तर्कसंगत ढंग से बनी है, पर एक आम नागरिक के लिए बस “कोई जवाब ही नहीं देता” जैसी महसूस होती है.

अगली बार जब कोई बाइक संभलतेसंभलते बचे, किसी गाड़ी का एलाइनमेंट बिगड़ जाए, या, सबसे बुरी स्थिति में, कोई इंसान घर वापस न पहुंचे, तो यह बात याद रखने लायक है. गुस्सा पूरी तरह जायज है. पर उसे सही जगह पहुंचाने के लिए एक और सवाल पहले पूछना ज़रूरी है: यह असल में कौन सी सड़क है, और इसे ठीक कराने की ज़िम्मेदारी शुरू से किसकी थी? गड्ढे को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस विभाग की सड़क पर है. जो इंसान उससे टकराता है, उसे अफसोस के साथ फर्क पड़ता है.