एक लाख महीना कमाने वाले 25 साल के युवक के पास महीने के अंत में सिर्फ 20,000 रुपए बचने का मामला वायरल. जानिए कैसे महंगे किराए, कार लोन और खर्चों ने बढ़ाई चिंता.

1 लाख सैलरी फिर भी बचत सिर्फ 20 हजार! 25 साल के युवक का बजट देख इंटरनेट पर छिड़ी बहस

आज के समय में 1 लाख रुपए महीने की सैलरी बहुत अच्छी मानी जाती है, खासकर जब उम्र सिर्फ 25 साल हो. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतनी सैलरी पाने वाला शख्स भी महीने के आखिर में सिर्फ 20 हजार रुपए बचाने के लिए जूझ रहा हो? हाल ही में रेडिट पर एक युवा ने अपनी परेशानी शेयर की, जिसके बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई है कि क्या बड़े शहरों की महंगाई हमारी पूरी सैलरी खा रही है. आइए इस वायरल मामले की पूरी कहानी जानते हैं.

3-4 दिनों में ही उड़ जाते हैं 56,000 रुपए

25 साल के एक युवक ने अपनी रेडिट पोस्ट में बताया कि महीने की शुरुआत में ही उसकी आधी से ज्यादा सैलरी खत्म हो जाती है. उसने अपना पूरा हिसाब शेयर किया, जिसमें कार लोन की EMI के 25 हजार रुपए, घर के किराए के 25 हजार रुपए और इंश्योरेंस प्रीमियम के 6 हजार रुपए शामिल हैं.यानी सैलरी आते ही 3-4 दिन में 56,000 रुपए खर्च हो जाते हैं. इसके बाद खाने-पीने पर 10,000 रुपए, पेट्रोल पर 5,000 रुपए और दूसरे बिलों पर 3,000 रुपए लग जाते हैं. सब खर्च निकालने के बाद महीने के आखिर में उसके पास सिर्फ 20,000 रुपए ही बचते हैं.

परिवार का कर्ज और नौकरी जाने का डर

परिवार की जिम्मेदारियों की वजह से हालत और खराब है. उस पर अपने पिता का 8 लाख रुपए का कर्ज चुकाने का दबाव है, लेकिन कम बचत के कारण वह चुका नहीं पा रहा है. उसने लिखा, मैं अपनी जवानी में दिन-रात, वीकेंड पर भी काम कर रहा हूं, ताकि साल भर में 2 लाख रुपए बचा सकूं. उसने बताया कि अगर नौकरी चली गई तो उसकी कार और किराए का घर दोनों चले जाएंगे, क्योंकि उसके पास कोई इमरजेंसी फंड भी नहीं है.

इंटरनेट पर बहस छिड़ी, गलती किसकी है?

इस वायरल पोस्ट पर सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग राय सामने आई. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कई यूजर्स ने उसकी फाइनेंशियल प्लानिंग पर सवाल उठाए. एक यूजर ने लिखा, आपने 25 हजार रुपए EMI वाली कार क्यों ली, जो आपकी सैलरी का एक चौथाई हिस्सा खा रही है?कुछ लोगों ने सलाह दी कि अगर वह PG में रहता और छोटी या सेकंड-हैंड कार लेता तो हजारों रुपए बच सकते थे. वहीं कई लोगों ने माना कि आज के बड़े शहरों में खर्च बहुत ज्यादा है और नौकरी का प्रेशर भी बहुत है.