Gandhi Jayanti 2026: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने विश्व युद्ध रोकने के लिए हिटलर को दो पत्र लिखे थे. गांधी ने हिटलर की निंदा भी की थी और मित्र भी कहा था. आइए, गांधी जयंती के बहाने जानते हैं की महात्मा गांधी ने हिटलर को लिखे पत्र में क्या लिखा था? हिटलर ने उनके पत्र के जवाब में क्या लिखा?

असल में 2 अक्टूबर केवल गांधी जयंती नहीं है. यह दिन महात्मा गांधी के विचारों और सार्वजनिक जीवन को याद करने का अवसर है. गांधी की विरासत का एक कम चर्चित प्रसंग है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उन्होंने यूरोप में युद्ध का खतरा बढ़ने पर जर्मन नेता एडोल्फ हिटलर को दो पत्र लिखे. इन पत्रों में उन्होंने युद्ध रोकने और हिंसा छोड़ने की अपील की. गांधी ने हिटलर को पत्र लिखकर कोई राजनीतिक गठबंधन बनाने की कोशिश नहीं की. उनका उद्देश्य अपनी अहिंसा की राह से युद्ध के विरुद्ध अपील करना था.
पहला पत्र: युद्ध शुरू होने से पहले
गांधी ने पहला पत्र 23 जुलाई 1939 को लिखा. उस समय यूरोप में तनाव बढ़ रहा था. गांधी ने पत्र की शुरुआत प्रिय मित्र लिखकर की. यह संबोधन हिटलर के विचारों या कामों का समर्थन नहीं था. गांधी ने लिखा कि उनके मित्र उनसे मानवता के हित में हिटलर को लिखने का आग्रह कर रहे थे. वे पहले झिझकते रहे, क्योंकि उन्हें लगा कि उनका पत्र लिखना धृष्टता माना जा सकता है. फिर भी उन्होंने अपील करना उचित समझा.
महात्मा गांधी ने पहला पत्र 23 जुलाई 1939 को लिखा. फोटो: Getty Images
गांधी ने हिटलर से कहा कि उस समय दुनिया में वही ऐसा व्यक्ति था जो युद्ध रोक सकता था. उन्होंने सवाल उठाया कि कोई लक्ष्य कितना भी मूल्यवान क्यों न लगे, क्या उसके लिए मानवता को बर्बरता की ओर धकेलने वाली कीमत चुकानी चाहिए? उन्होंने अपनी अहिंसक नीति का उल्लेख किया और अंत में लिखा कि यदि पत्र लिखना भूल थी, तो वे क्षमा की अपेक्षा करते हैं. इस पत्र का मूल संदेश सीधा एवं स्पष्ट थायुद्ध को रोका जा सकता है, इसलिए उसे रोकने की जिम्मेदारी ताकतवर नेताओं पर है.
दूसरा पत्र: अहिंसा और जवाबदेही
गांधी ने दूसरा पत्र 24 दिसंबर 1940 को लिखा. यह पहला पत्र लिखे जाने के बाद भी युद्ध जारी रहने के कारण लिखा था. इसमें उनका स्वर अधिक विस्तारपूर्ण और स्पष्ट था. उन्होंने फिर प्रिय मित्र लिखकर संबोधित किया. गांधी ने लिखा कि यह संबोधन केवल शिष्टाचार नहीं है. उनके अनुसार, उनका कोई निजी शत्रु नहीं था और वे सभी मनुष्यों के साथ मैत्री का रिश्ता बनाने में विश्वास रखते थे. लेकिन इस मैत्री का अर्थ चुप्पी या सहमति नहीं था. गांधी ने हिटलर के कामों की कठोर आलोचना की. उन्होंने अपने पत्र में चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड और डेनमार्क के प्रति जर्मनी की कार्रवाई का उल्लेख किया.
पहले लेटर में उन्होंने जंग रोकने की बात कही थी.
उन्होंने कहा कि ऐसे काम क्रूर और अमानवीय हैं और मानवीय गरिमा के विरुद्ध हैं. उन्होंने यह भी लिखा कि वे हिटलर की सफलता की कामना नहीं कर सकते. पत्र में गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की भी आलोचना की. उन्होंने साफ किया कि भारत का ब्रिटिश शासन का विरोध नाजीवाद के विरोध से अलग नहीं था. फिर भी, उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन का विरोध ब्रिटिश लोगों को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं था. उनका रास्ता अहिंसक असहयोग था. वे विरोधी को मारकर नहीं, उसके सहयोग को वापस लेकर शासन को असंभव बनाना चाहते थे. गांधी ने हिटलर को अहिंसा की शक्ति समझाने की कोशिश की. उनके अनुसार, शासक जनता के सहयोग के बिना सत्ता बनाए नहीं रख सकता. वे मानते थे कि अहिंसक प्रतिरोध का उद्देश्य विरोधी को चोट पहुंचाना नहीं, बल्कि उसे बदलना है. पत्र के अंत में उन्होंने मानवता के नाम पर युद्ध समाप्त करने की अपील दोहराई.
क्या हिटलर ने गांधी को जवाब दिया?
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, हिटलर की ओर से गांधी को कोई जवाब मिला या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है. यह भी निश्चित रूप से कहना कठिन है कि दोनों पत्र हिटलर तक पहुंचे थे या नहीं. कुछ तथ्य बताते हैं कि संभव है की गांधी के पत्रों को ब्रिटिश अधिकारियों ने रोक दिया हो. कई जगह ऐसा भी दूसरे विवरणों में यह संभावना भी दी गई है कि पत्र हिटलर तक पहुंचे हों, लेकिन उसने उन्हें महत्व न दिया हो. इसलिए सबसे सावधान निष्कर्ष यही हैहिटलर के जवाब का कोई प्रमाण नहीं मिलता, और पत्रों के उसके हाथ तक पहुंचने की बात भी पक्के तौर पर स्थापित नहीं है.
एडोल्फ हिटलर.
पहले पत्र के कुछ ही समय बाद जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया. इस घटना के बाद यूरोप का संकट विश्वयुद्ध में बदल गया. यह क्रम दिखाता है कि गांधी की अपील का युद्धनीति पर कोई दिखाई देने वाला असर नहीं पड़ा. हालांकि, इससे पत्रों का ऐतिहासिक महत्व खत्म नहीं होता. वे यह दर्ज करते हैं कि गांधी ने युद्ध के समय भी हिंसा के विरुद्ध सीधे संवाद का रास्ता चुना.
गांधी जयंती पर इन पत्रों का क्या है अर्थ?
इन चिट्ठियों को पढ़ते समय गांधी को हिटलर के बराबर या उसके विचारों के समर्थक के रूप में दिखाना गलत होगा. गांधी ने हिटलर को मित्र कहा, लेकिन उसके शासन और सैन्य कार्रवाइयों की आलोचना भी की. उनके लिए मित्रता का अर्थ यह था कि विरोधी से भी बात की जाए और उसे उसके कर्मों के लिए जवाबदेह ठहराया जाए. गांधी का तरीका आज भी एक कठिन सवाल उठाता है. क्या हिंसा के सामने अहिंसा प्रभावी हो सकती है? इन पत्रों का जवाब आसान नहीं है. वे युद्ध नहीं रोक सके. फिर भी वे गांधी के विश्वास को सामने रखते हैं कि ताकत का जवाब केवल ताकत से देना जरूरी नहीं. असहमति को स्पष्ट शब्दों में रखा जा सकता है, बिना नफरत को अपना आधार बनाए.
गांधी जयंती पर इन पत्रों को याद करना केवल एक ऐतिहासिक घटना को दोहराना नहीं है. यह युद्ध, सत्ता और नैतिक जिम्मेदारी पर सोचने का अवसर भी है. गांधी ने उस समय के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक से कहा कि युद्ध की कीमत मानवता चुकाती है. उनका आग्रह था कि उस कीमत को चुकाने से पहले रुककर सोचा जाए. पहले पत्र का अनूदित पाठ और उसका संदर्भ यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा की हिन्दीउर्दू पाठ्यपुस्तक में उपलब्ध बताई जाती है. पत्रों और जवाब न मिलने की अनिश्चितता का विवरण अलगअलग मीडिया रिपोर्ट्स में दिया गया है.



