Bhopal News: सन् 1985 का भोपाल… भारत भवन का एक कोना और कागज का एक टुकड़ा. कीमत तय हुई महज 1,500 रुपए. खरीदार को लगा कि ‘कागज के इस टुकड़े’ के लिए यह रकम कुछ ज्यादा है. लेकिन तब कलाविद् जे. स्वामीनाथन ने डांटते हुए कहा था कि ये सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, कलाकार की साधना और कल्पना की कीमत है. लेकिन आज वही कागज का टुकड़ा जिसे 41 साल पहले सिर्फ पंद्रह सौ रुपए में खरीदा गया था, जब मुंबई की नीलामी टेबल पर आया तो इतिहास रच गया. गोंड समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मध्य प्रदेश के दिवंगत दिग्गज चित्रकार जनगढ़ सिंह श्याम की इस ऐतिहासिक कलाकृति को मुंबई की एक नीलामी में पूरे 18 करोड़ रुपए में खरीदा गया.

ये सिर्फ एक पेंटिंग का बिकना भर नहीं है, ये उस जनगढ़ सिंह श्याम की साधना की जीत है जिनकी मृत्यु के 25 साल बाद आज पूरी दुनिया उनकी कला के आगे नतमस्तक है. 1985 में इस पेंटिंग को महज 1500 रुपए में खरीदा गया था, 41 साल बाद उसी परिवार के ऑक्शन हाउस में जब यह कलाकृति नीलामी के लिए आई तो इसने उम्मीदों के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए. वर्ष 2026 में यह पेंटिंग 18 करोड़ रुपए में नीलाम हुई यानी 1985 की मूल कीमत से करीब 12 लाख गुना अधिक.

खास बात ये रही कि इसकी नीलामी कीमत अनुमानित कीमत से भी करीब चार गुना ज्यादा रही. इसी नीलामी में जनगढ़ सिंह श्याम की एक और मशहूर बैल वाली कलाकृति भी 4.55 करोड़ रुपए में नीलाम हुई. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हालांकि, जनगढ़ सिंह श्याम के बेटे और जानेमाने कलाकार मयंक सिंह श्याम के मुताबिक, इस ऐतिहासिक नीलामी से उनके परिवार को कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा लेकिन उनके लिए ये कीमत से कहीं बढ़कर उनके पिता के संघर्ष, उनकी कला और उनकी विरासत को मिली सबसे बड़ी पहचान है.

प्रकृति और जीवन का गहरा दर्शन

मयंक के मुताबिक, यह पेंटिंग महज कैनवास पर उकेरे गए रंगों का मेल नहीं है, बल्कि प्रकृति और जीवन के गहरे दर्शन को अपने भीतर समेटे हुए है. इसमें नाग को धरती मां के प्रतीक के रूप में उकेरा गया है, जबकि नाग के ऊपर खड़ा विशाल वृक्ष प्रकृति और जीवन के बीच गहरे जुड़ाव को दर्शाता है. पेंटिंग का सीधा संदेश है कि धरती ही समूचे जीवन का आधार है और इसी की गोद में सृष्टि का विस्तार और विकास होता है.

संघर्ष से उपजी जनगढ़ कलम

मध्य प्रदेश के मंडला जिले के छोटे से गांव पाटनगढ़ में जन्मे जनगढ़ सिंह श्याम समकालीन भारतीय कला और गोंड आदिवासी कला के अग्रणी चित्रकारों में शुमार किए जाते हैं. जंगलों और आदिवासी परिवेश में पलेबढ़े जनगढ़ सिंह श्याम का बचपन बेहद संघर्षपूर्ण रहा. आर्थिक तंगी के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी और उन्होंने आजीविका के लिए खेतीबाड़ी से जुड़े काम किए. बचपन से ही प्रकृति, लोक परंपराओं, संगीत और अनुष्ठानिक कला से उनका गहरा जुड़ाव था. वे बकरियां चराते समय बांसुरी बजाते थे और उनकी कलात्मक प्रतिभा की चर्चा गांव में होने लगी थी.

जनगढ़ सिंह श्याम ने पारंपरिक गोंड और प्रधान चित्रकला को घरों की दीवारों से निकालकर कागज और कैनवास तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. 1982 में प्रसिद्ध कलाकार जे. स्वामीनाथन ने पाटनगढ़ में उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें भोपाल के भारत भवन लेकर आए. इसके बाद जनगढ़ की कला को व्यापक पहचान मिली और उन्होंने देवीदेवताओं, जीवजंतुओं और प्रकृति को बारीक बिंदुओं और रेखाओं के जरिए अभिव्यक्त करने वाली अपनी विशिष्ट शैली विकसित की, जिसे आगे चलकर जनगढ़ कलम के नाम से जाना गया. उन्होंने भारत भवन के मुख्य गुंबद पर गोंड देवता बरदेव का चित्र भी बनाया.

अंतरराष्ट्रीय पटल पर पहचान और दुखद अंत

जनगढ़ सिंह श्याम की कला ने जल्द ही मध्य प्रदेश और देश की सीमाओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की. उनकी कलाकृतियों की प्रदर्शनियां पेरिस के पोम्पीडौ सेंटर, टोक्यो और न्यूयॉर्क सहित दुनिया के प्रमुख कला केंद्रों और भारत के कई बड़े संग्रहालयों में लगीं. उन्हें 1985 में मध्य प्रदेश सरकार के सर्वोच्च शिखर सम्मान से नवाजा गया. वर्ष 2001 में 39 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी कला और जनगढ़ कलम आज भी गोंड कला की पहचान और उनकी कलात्मक विरासत को आगे बढ़ा रही है.

माटी से अंतरराष्ट्रीय कला बाजार तक की प्रेरणा

जनगढ़ सिंह श्याम के बेटे मयंक सिंह श्याम आज अपने पिता की विरासत को लेकर एक बड़ी मुहिम चला रहे हैं. उनका मानना है कि उनके पिता के काम को सिर्फ गोंड आर्ट या पारंपरिक आदिवासी कला की संकीर्ण सीमा में बांधकर देखना सही नहीं है. मयंक सिंह श्याम कहते है कि गोंड और प्रधान हमारी सामाजिक पहचान जरूर हैं, लेकिन पिता ने किसी पुरानी पारंपरिक शैली की नकल नहीं की. उन्होंने ऐक्रेलिक रंगों और कैनवास पर अपनी एक बिल्कुल अलग दृश्यभाषा रची. जिस तरह एमएफ हुसैन, एसएच रजा और तैयब मेहता की अपनी एक स्वतंत्र कला भाषा थी उसी तरह पिता की शैली जनगढ़ कलम है.

पाटनगढ़ डिंडौरी की छोटी सी माटी से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े आर्ट गैलरीज तक पहुंचने वाली यह कला आज नई पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है. 2001 में जनगढ़ के असामयिक और दर्दनाक निधन के 25 साल बाद आज जब अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में उनकी ‘जनगढ़ कलम’ की तूती बोल रही है तो यह हर भारतीय के लिए गर्व का क्षण है.