भारत लंबे समय तक गांवों का देश कहलाता रहा है. आज भी देश की बड़ी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है, लेकिन अर्थव्यवस्था की धड़कन अब तेजी से शहरों की ओर शिफ्ट होती दिखाई दे रही है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने PRICE और टाटा संस के हवाले से बताया है कि देश के टॉप 100 शहर, जिनमें देश की कुल आबादी का 20 फीसदी से भी कम हिस्सा रहता है, वे अकेले भारत की कुल खपत का 31 फीसदी हिस्सा पैदा कर रहे हैं. इतना ही नहीं, ये शहर देश की कुल आय का एकतिहाई से ज्यादा हिस्सा भी उत्पन्न कर रहे हैं. यह आंकड़ा सिर्फ शहरों की बढ़ती आर्थिक ताकत नहीं दिखाता, बल्कि यह भी बताता है कि भारत की अर्थव्यवस्था का केंद्र धीरेधीरे गांवों से शहरों की तरफ खिसक रहा है.

इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह रोजगार है. आईटी, फाइनेंस, मैन्युफैक्चरिंग, ईकॉमर्स, स्टार्टअप और सर्विस सेक्टर जैसी नौकरियां बड़े और मध्यम शहरों में तेजी से बढ़ी हैं. बेहतर रोजगार और ज्यादा आय की तलाश में लाखों लोग हर साल गांवों और छोटे कस्बों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. इसका असर सीधे तौर पर शहरों की आय और खर्च करने की क्षमता पर दिखाई दे रहा है.
ये 6 शहर संभालते हैं कंजम्पशन
देश की कुल खपत में सबसे बड़ा योगदान भारत के छह बड़े शहरों दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, चेन्नई और हैदराबाद का है. ये छह शहर मिलकर देश की कुल खपत का करीब 46% हिस्सा और शहरी खपत का लगभग दोतिहाई हिस्सा संभालते हैं. इनमें भी दिल्लीएनसीआर सबसे बड़ा कंजम्प्शन हब बनकर उभरा है. यहां सालाना खपत करीब 12,03,552 करोड़ रुपये की है. यह लगभग मुंबई और बेंगलुरु की संयुक्त खपत के बराबर है, जो मिलाकर करीब 12,79,968 करोड़ रुपये बैठती है. दिल्लीएनसीआर की बड़ी खपत की एक बड़ी वजह इसकी आबादी है. यहां करीब 75 लाख परिवार रहते हैं, जबकि मुंबई में यह संख्या करीब 46 लाख परिवारों की है. दिल्लीएनसीआर के परिवार सिर्फ ट्रांसपोर्टेशन पर ही हर साल करीब 3,15,216 करोड़ रुपये खर्च कर देते हैं. यह रकम पुणे या अहमदाबाद जैसे शहरों के पूरे कंजम्प्शन मार्केट से भी बड़ी है.
मिडिल क्लास की बढ़ती हिस्सेदारी
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के टॉप 100 शहरों में देश की 20% से भी कम आबादी रहती है, लेकिन यही शहर देश की एकतिहाई से ज्यादा आय पैदा करते हैं और कुल खपत का 31% हिस्सा इन्हीं के खाते में जाता है. रिपोर्ट में इनमक और खपत को चार कैटेगरी में बांटा है.
- बिग सिक्स 1 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले शहर, जहां औसत सालाना आय 23 लाख रुपये है.
- बूमटाउन अहमदाबाद, जयपुर, सूरत और पुणे जैसे शहर, जहां आबादी 25 लाख से 1 करोड़ के बीच है और औसत सालाना आय 17 लाख रुपये है.
- ब्रेकआउट सिटीज 15 लाख से 25 लाख आबादी वाले शहर, जहां औसत सालाना आय 14 लाख रुपये है.
- फ्रंटियर सिटीज 5 लाख से 15 लाख आबादी वाले शहर, जहां औसत सालाना आय 12 लाख रुपये है.
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में मिडिलइनकम परिवारों की हिस्सेदारी 29% से बढ़कर 53% हो गई है. अनुमान है कि 2030 तक टॉप 100 शहरों में इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 60% तक पहुंच जाएगी. फिलहाल इस मामले में हैदराबाद सबसे आगे है.
वहीं, 36 लाख रुपये से ज्यादा सालाना आय वाले हाईइनकम परिवारों की हिस्सेदारी भी पिछले 10 वर्षों में 3% से बढ़कर 12% हो गई है और 2030 तक इसके करीब 20% तक पहुंचने का अनुमान है. इस कैटेगरी में दिल्ली, मुंबई और पुणे सबसे आगे हैं, वहीं रायपुर, तूतीकोरिन और कन्नूर जैसे शहर मिडिलइनकम और हाईइनकम परिवारों की संख्या बढ़ने के मामले में सबसे तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. 2030 तक टॉप 100 शहरों में लोइनकम परिवार लगभग खत्म हो जाएंगे, 1.5 लाख रुपये से कम सालाना आय वाले परिवारों की हिस्सेदारी घटकर सिर्फ 0.3% रह जाने का अनुमान है.
क्या गांव पीछे छूट जाएंगे
सवाल यह भी है कि क्या गांव और छोटे शहर इस दौड़ में पीछे छूट जाएंगे? डिजिटल कनेक्टिविटी, बेहतर सड़कें, ऑनलाइन शिक्षा और ईकॉमर्स ने छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों को भी नई संभावनाएं दी हैं. कई कंपनियां अब टियर2 और टियर3 शहरों में निवेश बढ़ा रही हैं. इससे भविष्य में आर्थिक गतिविधियां कुछ हद तक विकेंद्रीकृत हो सकती हैं. फिर भी फिलहाल तस्वीर साफ है. भारत की आर्थिक कहानी अब सिर्फ खेतों और गांवों की नहीं, बल्कि मॉल, मेट्रो, स्टार्टअप, ऑफिस और शहरी उपभोक्ताओं की भी है. देश की आबादी भले अभी ग्रामीण बहुल हो, लेकिन खपत, आय और निवेश के आंकड़े बता रहे हैं कि आर्थिक ताकत का केंद्र तेजी से शहरों की ओर बढ़ रहा है.
भारत की खपत, आय और निवेश का बड़ा हिस्सा तेजी से शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हो रहा है, जबकि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अभी भी करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार बनी हुई है. भारत की लगभग 64% आबादी अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है. कृषि का GDP में योगदान लगभग 1516% है लेकिन रोजगार में इसका हिस्सा अभी भी काफी बड़ा है. ग्रामीण खपत अभी भी FMCG और दोपहिया वाहनों जैसे क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है.


