भारत में पानी का संकट काफी गहरा होता जा रहा है, लेकिन इस संकट में भी लाख करोड़ रुपए का बड़ा कारोबार छिपा है. जो आने वाले दिनों में देश की इकोनॉमी को बूस्ट करने में काफी बड़ा योगदान दे सकता है. प्रभुदास लीलाधर की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पानी की बढ़ती कमी और अगले दशक में लगभग 20 लाख करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत से वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए लंबे समय तक बढ़ने के मौके बन रहे हैं. इस सेक्टर को अच्छे ऑर्डर बुक, मजबूत कमाई की संभावना और सरकार के लगातार खर्च से मदद मिलने की उम्मीद है. ब्रोकरेज ने कहा कि भारत में दुनिया की लगभग 18 फीसदी आबादी रहती है, लेकिन यहां दुनिया के मीठे पानी के संसाधनों का केवल 4 फीसदी हिस्सा ही है. इसलिए, आर्थिक या राजनीतिक उतारचढ़ाव के बावजूद पानी की सुरक्षा एक जरूरी प्राथमिकता है.

डिमांग सप्लाई से दोगुनी
रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक पानी की मांग उपलब्ध सप्लाई से लगभग दोगुनी हो सकती है. इसके लिए अगले दशक में पीने के पानी की सप्लाई, सीवेज ट्रीटमेंट, वेस्टवॉटर रीसाइक्लिंग, खारे पानी को मीठा बनाने , स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर में 20 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के निवेश की जरूरत होगी. उम्मीद है कि भारत का पानी और वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट टेक्नोलॉजी मार्केट वित्त वर्ष 2025 में लगभग 3 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2031 तक 5.2 अरब डॉलर का हो जाएगा, जिसका मतलब है कि इसकी सालाना ग्रोथ रेट लगभग 10 फीसदी होगी. 2030 तक इंडस्ट्रियल पानी और वेस्टवॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च भी सालाना लगभग 8 फीसदी बढ़ने का अनुमान है. इसकी वजह कड़े डिस्चार्ज नियम, जीरो लिक्विड डिस्चार्ज के नियम और उद्योगों में पानी की बढ़ती खपत है.
पानी के लिए बजट में प्रावधान
सरकारी प्रोग्राम मांग बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं. जल जीवन मिशन के लिए सालाना लगभग 67,000 करोड़ रुपए का बजट है, जबकि जल शक्ति मंत्रालय को वित्त वर्ष 2026 के लिए लगभग 99,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. AMRUT 2.0 शहरी जल योजना का बजट लगभग 2.99 लाख करोड़ रुपए है, जबकि नमामि गंगे फेज II के तहत सीवेज ट्रीटमेंट और नदी के कायाकल्प के लिए 22,500 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं. ब्रोकरेज ने सीवेज ट्रीटमेंट को इस सेक्टर में सबसे बड़े मौकों में से एक माना है. भारत में हर दिन लगभग 72,000 मिलियन लीटर सीवेज पैदा होता है, लेकिन ट्रीटमेंट की क्षमता केवल 27,000 MLD के आसपास है. इसका मतलब है कि लगभग 70 फीसदी सीवेज बिना ट्रीटमेंट के रह जाता है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ी कमी को दिखाता है.
कई कंपनियां लाइन में
- रिपोर्ट में कहा गया है कि लिस्टेड कंपनियां इस निवेश साइकिल से फायदा उठाने की अच्छी स्थिति में हैं, हालांकि हर कंपनी की ग्रोथ और वैल्यूएशन प्रोफाइल अलगअलग है. भारत की सबसे बड़ी प्योरप्ले वॉटर टेक्नोलॉजी कंपनी, VA Tech Wabag, वित्त वर्ष 2026 की कमाई के 25.8 गुना और EV/EBITDA के 15.4 गुना पर ट्रेड कर रही है. इसके पास 17,200 करोड़ रुपए का ऑर्डर बुक है, जो इसके वित्त वर्ष 2026 के 3,944 करोड़ रुपए के रेवेन्यू का लगभग 4.4 गुना है, और इसके पास 950 करोड़ रुपए की नेट कैश पोजीशन है. मैनेजमेंट ने सालाना रेवेन्यू में 1520 फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया है, और उम्मीद है कि मुनाफे में बढ़ोतरी रेवेन्यू की बढ़ोतरी से ज्यादा होगी.
- Enviro Infra Engineers, जिसकी वैल्यूएशन कमाई का 16.8 गुना और EV/EBITDA का 10.2 गुना है, ने वित्त वर्ष 2023 से 2026 के दौरान रेवेन्यू और मुनाफे में क्रमशः लगभग 50 फीसदी और 55 फीसदी की सीएजीआर दर्ज की है. इसका 6,814 करोड़ रुपए का ऑर्डर बुक वित्त वर्ष 2026 के रेवेन्यू का लगभग छह गुना है, जिससे अगले दो सालों के लिए रेवेन्यू की विज़िबिलिटी मिलती है. कंपनी ने Suyog Urja के अधिग्रहण के जरिए रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में भी अपना कारोबार फैलाया है.
- Denta Water and Infra Solutions कमाई का 11 गुना और EV/EBITDA का 6.8 गुना पर ट्रेड कर रही है, जो इसे कवर की गई तीनों कंपनियों में सबसे सस्ती बनाता है. इसने वित्त वर्ष 2026 में 33 फीसदी से ज्यादा का EBITDA मार्जिन दर्ज किया और इसके पास 728 करोड़ रुपये का ऑर्डर बुक है, जो सालाना रेवेन्यू का लगभग तीन गुना है. इसमें से लगभग 73 फीसदी हिस्सा सरकार समर्थित वॉटर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट्स से जुड़ा है.
कमाई का मौका
रिपोर्ट के अनुसार, लगातार पब्लिक इन्वेस्टमेंट, कड़े होते एनवायरनमेंटल नियम, तेजी से बढ़ता शहरीकरण और इंडस्ट्री में पानी की बढ़ती मांग वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर को लंबे समय के इन्वेस्टमेंट थीम के तौर पर स्थापित करती है, जिससे इस सेक्टर की कंपनियों के लिए कई सालों तक ग्रोथ के मौके मिलते हैं.



