Sonbhadra Tribal Land Case: उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में दुद्धी तहसील के बघाड़ू में आदिवासी जमीन से जुड़े चर्चित मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने जमीन के ट्रांसफर से जुड़े मामलों में प्रशासन की कार्रवाई में दखल से इनकार करते हुए डिप्टी कलेक्टर दुद्धी के आदेशों को बरकरार रखा है। अब प्रशासन आगे की कार्रवाई कर सकेगा।

आदिवासी जमीन के बेनामों की प्रशासन ने की थी जांच

पूरा मामला बघाड़ू गांव में आदिवासी परिवारों की जमीन के अलगअलग बेनामों से जुड़ा है। प्रशासन की जांच में रजिया उर्फ दुलरिया और नन्हकी उर्फ नैमुन्निशा के नाम आदिवासी जमीन की खरीद के मामले सामने आए थे। इसके बाद संबंधित जमीन के हस्तांतरण की वैधता की जांच की गई। प्रशासन ने जिन बेनामों को कानून के खिलाफ माना, उन्हें निरस्त करने और जमीन को ग्राम सभा में निहित करने की कार्रवाई शुरू की। हाईकोर्ट ने भी इन प्रशासनिक आदेशों में हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया।

2012 में जारी एसटी प्रमाण पत्र भी जांच के घेरे में आया

मामले में रजिया उर्फ दुलरिया के नाम 14 दिसंबर 2012 को जारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र की भी जांच हुई। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक बघाड़ू के बहादुर अली से विवाह के बाद उनकी पहचान रजिया के रूप में सामने आई थी। इसके बावजूद उनके नाम एसटी प्रमाण पत्र जारी हुआ और इसी पहचान के आधार पर आदिवासी जमीन की खरीद का मामला सामने आया। जिला स्तरीय जाति प्रमाण पत्र सत्यापन समिति ने पुराने रिकॉर्ड, स्थानीय बयानों और जनजातीय पहचान से जुड़े तथ्यों की जांच की। इसके बाद वर्ष 2012 का एसटी प्रमाण पत्र निरस्त कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने जनजातीय पहचान से जुड़े सबूतों को भी देखा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल जन्म के आधार पर अनुसूचित जनजाति की पहचान का सवाल तय नहीं होता। मामले में जनजातीय रीतिरिवाज, परंपराओं, सामाजिक जीवन और संबंधित समुदाय से लगातार जुड़े रहने जैसे तथ्यों को भी देखा गया। अदालत के सामने रजिया की ओर से ऐसे पर्याप्त साक्ष्य नहीं रखे जा सके, जिनसे निकाह के बाद भी उनके पनिका जनजातीय जीवन से निरंतर जुड़े होने की बात साबित हो। इसी आधार पर कोर्ट ने प्रशासनिक आदेश में दखल देने से इनकार किया।

दूसरे मामलों की भी जांच की मांग

बीजेपी जिला अध्यक्ष नंदलाल गुप्ता ने इस पूरे मामले को ‘लैंड जिहाद’ से जोड़ते हुए जिले में आदिवासी जमीन के ऐसे दूसरे मामलों की भी जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि आदिवासी महिलाओं के जरिए जमीन की खरीद और बाद में वहां बाहरी लोगों को बसाने के मामलों की व्यापक पड़ताल होनी चाहिए। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हालांकि, ‘लैंड जिहाद’ शब्द और इससे जुड़े आरोप उनकी राजनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा हैं। हाईकोर्ट का फैसला भूमि हस्तांतरण की कानूनी वैधता और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के आधार पर है।

जमीन के इस्तेमाल पर प्रशासन की आगे की नजर

बघाड़ू मामले में अब प्रशासन के सामने अगला कदम जमीन के उपयोग और रिकॉर्ड से जुड़ी कार्रवाई का है। जिला प्रशासन के मुताबिक संबंधित जमीन को जनहित के काम में इस्तेमाल करने की योजना पर आगे बढ़ा जा सकता है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रशासनिक आदेशों को लागू करने की स्थिति मजबूत हुई है। ऐसे में करीब 48 बीघा जमीन से जुड़े इस मामले में आगे जमीन के इस्तेमाल और दूसरे संबंधित मामलों पर प्रशासन एक्शन लेगा।