कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे हम कभी नहीं मिलते, फिर भी वे हमारे भीतर ऐसे सवाल छोड़ जाते हैं जो जिंदगी भर साथ रहते हैं. आज नाना पाटेकर का मराठी में एक छोटासा वीडियो देखते हुए मुझे कुछ ऐसा ही महसूस हुआ. पत्रकारिता के अपने लंबे सफर में मुझे अनेक लोगों से मिलने, उनकी कहानियां सुनने और उन्हें समझने का अवसर मिला. लेकिन नाना पाटेकर से कभी मिल नहीं पाया. इसका अफसोस हमेशा रहेगा. इसलिए नहीं कि मैं एक बड़े अभिनेता से नहीं मिल सका, बल्कि इसलिए कि एक ऐसे इंसान के सामने बैठकर जिंदगी को समझने का मौका नहीं मिला, जिसके विचार मुझे भीतर तक छूते हैं. उन्हें सुनते हुए मन में एक पुराना सवाल फिर जाग उठा. क्या केवल जिंदा रहना ही जिंदगी है, या यह भी जरूरी है कि हम कैसे जी रहे हैं?

उस मराठी वीडियो में नाना जिंदगी की बात बड़ी गहराई से करते हैं. उनके शब्दों का भाव, जैसा मैं समझ पाया, कुछ ऐसा है. क्या इंसान इस दुनिया में फटीपुरानी, फेंकी हुई पत्तल के टुकड़े की तरह जिए? अपमान सहता रहे, मजबूरी में सिर झुकाता रहे और अपनी इज्जत खोकर दूसरों के सामने जीता रहे? फिर वे मृत्यु की तुलना एक विशाल सर्प से करते हैं, जिसके डसने के बाद ऐसी नींद आए जिसका फिर कोई सवेरा न हो. लेकिन अगर उस अनंत नींद में भी सपने आने लगें, तब क्या होगा? यह विचार बेचैन करता है.
इसका कोई आसान जवाब नहीं है. शायद इसका असली अर्थ मृत्यु को चुनना नहीं, बल्कि जीते हुए अपनी गरिमा को पहचानना है. सवाल यह है कि हम जिंदा रहते हुए कितना कुछ सहने और स्वीकार करने को तैयार हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसे सुनकर मुझे भगवद्गीता की एक सीख याद आई, श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्. अर्थात अपना रास्ता कठिन या अधूरा हो, तब भी दूसरे के रास्ते पर पूरी तरह चलने से बेहतर है. यहां स्वधर्म का अर्थ केवल किसी धर्म या मजहब से नहीं है. मेरे लिए इसका अर्थ है अपना स्वभाव, अपना कर्तव्य और अपने भीतर की सच्चाई पहचानना.
जब खुद अपने लिए अजनबी बन सकता है इंसान
यह समझना कि जिंदगी हमसे क्या चाहती है, न कि पूरी उम्र वही बनते रहना जो दूसरे चाहते हैं. इसका मतलब यह भी नहीं कि हमारी हर इच्छा हमारा धर्म बन जाती है. अपने रास्ते पर चलते हुए भी हमें अपनी अंतरात्मा और जिम्मेदारियों का ध्यान रखना होता है. लेकिन दूसरों की उम्मीदों के अनुसार पूरी जिंदगी जीने वाला इंसान एक दिन खुद अपने लिए अजनबी बन सकता है.
यहीं से नाना की बात केवल उनकी नहीं रह जाती. वह हमारी अपनी कहानी बनने लगती है. हममें से कितने लोग वह जिंदगी जी रहे हैं जिसे हमने सचमुच खुद चुना था? बचपन से बताया जाता है कि क्या बनना चाहिए. बड़े होकर समझाया जाता है कि कौनसे सपने अच्छे हैं. फिर नौकरी, परिवार और समाज के बीच हम सीख जाते हैं कि ना कहने से आसान है हां कहना. धीरेधीरे हम अपनी बातें, विचार, इच्छाएं और खुशियां भी दूसरों की सुविधा के अनुसार बदलने लगते हैं. कोई हमें बांधता नहीं. कोई जंजीर नहीं पहनाता. फिर भी एक दिन महसूस होता है कि पूरी जिंदगी हमने दूसरों से पूछा कि वे हमसे क्या चाहते हैं, लेकिन खुद से कभी नहीं पूछा कि हम अपनी जिंदगी से क्या चाहते हैं.
दूसरों की सेवा करने और खुद को पूरी तरह समर्पित कर देने में भी एक बड़ा अंतर है. मां बच्चे की देखभाल करती है. नर्स मरीज की सेवा करती है. दोस्त मुश्किल समय में दोस्त का साथ देता है. इन कामों से किसी की गरिमा कम नहीं होती, बल्कि बढ़ती है. लेकिन जब सेवा डर, अपमान या आत्मसम्मान खोकर की जाती है, तब उसका अर्थ बदल जाता है. प्रेम अपनी इच्छा से देता है. डर इसलिए झुकता है क्योंकि उसे कोई दूसरा रास्ता दिखाई नहीं देता. बाहर से दोनों काम एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन भीतर उनका कारण अलग होता है. शायद सवाल यह नहीं कि हम किसी के सामने झुकते हैं या नहीं. सवाल यह है कि झुकते क्यों हैं? प्रेम और सम्मान से, या इसलिए कि हमने मान लिया है कि हमारी अपनी कोई कीमत नहीं?
क्या है कर्मयोगी का मतलब?
यहीं कर्मयोग का अर्थ समझ आता है. कर्मयोगी केवल मेहनत करने वाला इंसान नहीं होता. बहुतसे लोग पैसा, पद या प्रशंसा खोने के डर से भी मेहनत करते हैं. कर्मयोग का गहरा अर्थ है अपने काम को पूरी ईमानदारी से करना, लेकिन अपनी कीमत को तालियों या असफलता से न जोड़ना. नाना में मुझे एक ऐसा कलाकार दिखाई देता था जो अपने काम और सिद्धांतों के प्रति समर्पित था. मैं उनके मन की हर बात जानने का दावा नहीं कर सकता. लेकिन उनकी यह बात मुझे प्रभावित करती थी कि वे हर किसी को खुश करने के लिए खुद को बदलते हुए नहीं दिखाई देते थे. अपने प्रति सच्चा रहने में भी एक बड़ी ताकत होती है.
अपनी शर्तों पर जीने की सबसे कठिन परीक्षा शायद यह स्वीकार करना है कि हर कोई हमें समझेगा नहीं. हम आज़ादी चाहते हैं, लेकिन चाहते हैं कि सब हमारी आज़ादी को पसंद भी करें. हम सच बोलना चाहते हैं, लेकिन किसी को बुरा भी न लगे. हम अपने जैसे रहना चाहते हैं, लेकिन अकेले पड़ने से भी डरते हैं. जिंदगी हमेशा ये सारी सुविधाएं एक साथ नहीं देती. कभी हमें तय करना पड़ता है कि सबकी नजर में अच्छा बनना ज्यादा जरूरी है या अपनी नजरों में सच्चा रहना.
इसके भीतर एक और सवाल छिपा है. क्या सबसे बड़ा खतरा दूसरों का हमें ठुकराना है, या यह कि उन्हें खुश करतेकरते हम खुद को ही भूल जाएं? हम सफल हो सकते हैं, सम्मान पा सकते हैं, लोगों से घिरे रह सकते हैं. फिर भी जब कोई हमसे कुछ नहीं चाहता, तब भीतर एक खालीपन महसूस हो सकता है. शायद वह खालीपन हमारी हार नहीं है. शायद वह हमारे भीतर का वही हिस्सा है जो वर्षों से अपनी बात कहने का इंतजार कर रहा था.
नाना से नहीं मिल पाने का रहेगा अफसोस
नाना पाटेकर से कभी मिल नहीं पाया. अब यह अफसोस जिंदगी भर मेरे साथ रहेगा. काश, कभी उनके सामने बैठकर जिंदगी के इन सवालों पर बात करने का अवसर मिला होता. लेकिन आज महसूस होता है कि किसी इंसान से मिलने के लिए हमेशा उसके सामने बैठना जरूरी नहीं होता. कभी उसके कुछ शब्द ही हमारे भीतर इतनी गहराई तक उतर जाते हैं कि वह हमेशा के लिए हमारी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है. नाना के एक छोटेसे वीडियो ने मुझे अपनी ही जिंदगी के भीतर झांकने पर मजबूर कर दिया. मेरे लिए एक सच्चे कलाकार की यही सबसे बड़ी पहचान है. वह दुनिया से चला जाता है, लेकिन उसके विचार लोगों के भीतर जिंदा रहते हैं. अपनी शर्तों पर जिया और अपनी ही शर्तों पर चला गया. मेरे लिए इसका अर्थ मृत्यु की इच्छा नहीं, बल्कि आखिरी सांस तक अपने प्रति सच्चे रहने की इच्छा है.
नाना, आपको मेरा शतशत नमन…
जब एक दिन हम अपनी जिंदगी को पीछे मुड़कर देखेंगे, तो क्या कह पाएंगे कि हमने सचमुच अपनी जिंदगी जी, या पूरी उम्र वही बनते रहे जो दूसरे हमसे चाहते थे?



