उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी तारीखों की घोषणा नहीं हुई है. लेकिन संभावना जताई जा रही है कि इसमें अब 6 महीने से भी कम का वक्त बचा हुआ है. इसी को देखते हुए सभी पार्टियां अब अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण साधने शुरू कर दिए हैं.

बीजेपी ने भी अपने पुराने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को फिर से साधना शुरू कर दिया है. इसी कड़ी में बीजेपी, पूर्व मुख्यमंत्री और अपने दिग्गज नेता रहे कल्याण सिंह की पांचवीं पुण्यतिथि पर लखनऊ के इकाना स्टेडियम में हिंदू गौरव दिवस मनाया जा रहै
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो शामिल ही होंगे. उनके साथ कल्याण सिंह के पौत्र और यूपी सरकार में राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार संदीप सिंह तथा उनके बेटे और पूर्व सांसद राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया की मौजूदगी भी मौजूदगी रहेगी. इसके जरिए भाजपा लोध समाज में राजनीतिकसामाजिक संदेश देना चाहती है.
बीजेपी इससे पहले भी कल्याण सिंह की पुण्यतिथि को बड़े राजनीतिकसामाजिक संदेश के तौर पर इस्तेमाल करती रही है. 2023 में अलीगढ़ में आयोजित हिंदू गौरव दिवस में अमित शाह, योगी आदित्यनाथ और राजवीर सिंह समेत बीजेपी के कई बड़े नेता शामिल हुए थे.
कल्याण सिंह की विरासत का क्यों और कैसे इस्तेमाल करना चाहती है बीजेपी?
कल्याण सिर्फ बीजेपी के दिग्गज नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हीं नहीं थे, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछड़े वर्गों, खासकर लोधी समाज के बीच उनकी मजबूत पैठ थी.राम मंदिर आंदोलन के दौर में उनकी राजनीतिक पहचान हिंदुत्व के बड़े चेहरे के तौर पर बनी.
साथ ही कल्याण सिंह अपने ओबीसी पृष्ठभूमि और लोध समाज से आने के चलते उन्होंने पिछड़े वर्ग की बड़ी जनसंख्या को बीजेपी और राम मंदिर आंदोलन के साथ जोड़ने में भी मदद की. ऐसे में कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत आज भी बीजेपी के लिए सिर्फ भावनात्मक मुद्दा नहीं है, बल्कि, इसमें हिंदुत्व और गैरयादव ओबीसी, दोनों ही समीकरणों कॉकटेल भी है. कल्याण सिंह की विरासत बीजेपी को तीन स्तरों पर फायदा दे सकती है.
- पहला, हिंदुत्व के पुराने नैरेटिव को मजबूत करना.
- दूसरा, लोधी समाज और गैरयादव ओबीसी को पार्टी से जोड़ना
- तीसरा, बीजेपी के पुराने कार्यकर्ताओं और समर्थकों में भावनात्मक जुड़ाव पैदा करना।
लोध समाज कितना बड़ा फैक्टर है?
भारत में अंतिम जातिगत जनगणना साल 1931 में हुई थी. आजादी के बाद से ही भारत में इस तरह की कोई जनगणना नहीं हुई थी. फिर भी कई सर्वे के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है. उत्तर प्रदेश में लोधी समाज की कुल आबादी राज्य की जनसंख्या का लगभग 7% के बीच मानी जाती है.
किन इलाकों में लोध समाज प्रभावशाली वोट बैंक माना जाता है?
लोध समाज पश्चिमी और मध्य यूपी में प्रभावशाली वोट बैंक माना जाता है. लोधी समाज की राजनीतिक मौजूदगी खास तौर पर अलीगढ़, एटा, कासगंज, फर्रुखाबाद, बदायूं, मैनपुरी, इटावा, औरैया, जालौन, झांसी, हमीरपुर, महोबा और बुंदेलखंड के कुछ हिस्सों तक दिखाई देती है. इन करीब दो दर्जन से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में यह समुदाय चुनावी समीकरण को प्रभावित करने की स्थिति में माना जाता है.
2022 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि लोधी पहचान वाले बीजेपी उम्मीदवारों ने कई सीटों पर मजबूत प्रदर्शन किया. इसमें स्याना में देवेंद्र सिंह लोधी ने 58.90% वोट लेकर बड़ी जीत दर्ज की. एटा जिले की मारहरा सीट पर वीरेंद्र सिंह लोधी भी बीजेपी के टिकट पर जीते. अतरौली सीट से खुद कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह ने 39,324 वोट के अंतर से जीत हासिल की.
क्या सिर्फ लोधी वोट से बीजेपी को फायदा होगा?
2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी का PDA यानी पिछड़ादलितअल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है. लोकसभा 2024 के चुनाव में समाजवादी पार्टी ने इसी समीकरण के जरिए बीजेपी को बड़ा झटका दिया था.यही वजह है कि बीजेपी गैरयादव ओबीसी में अपनी पकड़ मजबूत करने पर लगातार जोर दे रही है.
पार्टी का लक्ष्य लोधी वोट के साथसाथ गैरयादव ओबीसी के व्यापक सामाजिक गठजोड़ को बनाए रखना है. दरअसल, लोध समाज के वोटों के साथ कुर्मी, सैनी, मौर्यशाक्यसैनी, निषाद, गुर्जर और दूसरे पिछड़े समूहों का वोट जुड़ जाते हैं तो समीकरण उस पार्टी के पक्ष में बन सकता है, और उसके उम्मीदवार को जीत भी मिल सकती है.
बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले के इलेक्शन में अलगअलग स्तर पर राजनीतिक आधार बनाकर भी सफलता भी पाई, जिसे वह फिर से दोहराना चाहती है और सत्ता में तीसरी बार लगातार आना चाहती है. कल्याण सिंह की पांचवीं पुण्यतिथि पर लखनऊ के इकाना स्टेडियम में हिंदू गौरव दिवस मनाने की तैयारी इसी सफलता को दोहराने की एक कोशिश है.
राजू भैया की भूमिका कितनी अहम?
राजवीर सिंह यानी राजू भैया के जरिए बीजेपी कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत को सीधे उनके परिवार से जोड़ सकती है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। वहीं संदीप सिंह सरकार में मंत्री हैं और अतरौली जैसी कल्याण सिंह की पारंपरिक राजनीतिक जमीन से आते हैं.अतरौली सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है. यह कल्याण सिंह की राजनीतिक पहचान का प्रतीक है. 2022 में संदीप सिंह ने यहां बीजेपी के टिकट पर जीत दर्ज की थी. इसलिए परिवार की सक्रियता का संदेश लोधी समाज के साथसाथ कल्याण सिंह के पुराने समर्थकों तक पहुंचाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है.
बाबूजी की विरासत से तीसरी जीत की तैयारी?
पश्चिमी यूपी से लेकर बुंदेलखंड और मध्य यूपी तक करीब 2030 विधानसभा सीटों पर लोधी समाज का वोट महत्वपूर्ण माना जाता है. राज्य की कुल आबादी में करीब 7 फीसदी हिस्सेदारी के अनुमान के चलते लोधी समाज अकेले दम पर किसी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने की स्थिति में नहीं है, लेकिन कई सीटों पर यह जीतहार का अंतर तय करने वाला महत्वपूर्ण वोट बैंक जरूर बन सकता है.
2024 लोकसभा चुनाव में मिले झटके के बाद बीजेपी के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव में पुराने सामाजिक गठजोड़ को फिर मजबूत करना जरूरी है. मौजूदा सरकार के कामकाज, स्थानीय मुद्दों और सामाजिक समीकरणों के साथसाथ कल्याण सिंह की विरासत, हिंदुत्व और गैरयादव ओबीसी वोटों की राजनीति को एक साथ जोड़ते हुए बीजेपी एक बार फिर से लगातार तीसरी बार सत्ता में आने का रास्ता तलाश रही है.



