भारतीय मुद्रा रुपये की गिरावट की खूब चर्चा होती है. यह गिरा भी है. खूब गिरा है. डालर के मुकाबले तो बहुत ज्यादा गिरा है. इससे इनकार करना या मुंह मोड़ना नाइंसाफी होगी. इसके कारणों पर भी चर्चा अलग से हो सकती है. पर, क्या आप जानते हैं कि खुद को दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी का दम भरने वाला डॉलर भी गिरा है. बारबार गिरा है. समयसमय पर ऐतिहासिक रूप से गिरावट दर्ज की गई है. अमेरिका की आजादी की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर जानिए डॉलर के गिरने के सबसे बड़े ऐतिहासिक दौर कौनकौन से रहे हैं और उनके पीछे क्या कारण थे.

अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे प्रभावशाली मुद्राओं में गिना जाता है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी निवेश और केंद्रीय बैंकों के भंडार में डॉलर की बड़ी भूमिका है. यही कारण है कि डॉलर में होने वाला उतारचढ़ाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है. अक्सर खबरों में डॉलर की मजबूती की चर्चा होती है, लेकिन इतिहास में कई ऐसे दौर भी आए हैं जब डॉलर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई. इन गिरावटों ने वैश्विक बाजारों, निवेशकों और सरकारों को प्रभावित किया.

डॉलर की कीमत क्यों गिरती है?

किसी भी मुद्रा की तरह डॉलर का मूल्य भी मांग और आपूर्ति पर निर्भर करता है. जब निवेशकों का भरोसा कम होता है या अमेरिकी अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है, तब डॉलर पर दबाव बढ़ता है. डॉलर में गिरावट के प्रमुख कारणों में आर्थिक मंदी, ब्याज दरों में कटौती, बढ़ता सरकारी कर्ज, व्यापार घाटा, वैश्विक निवेशकों का दूसरी मुद्राओं की ओर रुख और भूराजनीतिक घटनाएं आदि हैं.

अमेरिकी डॉलर.

1970 का दशक: निक्सन शॉक

डॉलर की सबसे चर्चित गिरावटों में 1970 का दशक शामिल है. साल 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को सोने से जोड़ने वाली व्यवस्था समाप्त कर दी. इसे निक्सन शॉक कहा जाता है. इस फैसले के बाद ब्रेटन वुड्स प्रणाली कमजोर पड़ गई. डॉलर 15 फीसदी तक गिर गया. दुनिया की प्रमुख मुद्राएं स्वतंत्र रूप से तैरने लगीं. डॉलर पर दबाव बढ़ा और इसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति को चुनौती मिली. इसके बाद तेल संकट और बढ़ती महंगाई ने भी डॉलर को कमजोर किया. पूरे दशक में डॉलर को कई बार गिरावट का सामना करना पड़ा.

1985 का प्लाजा अकॉर्ड

डॉलर की गिरावट का एक बड़ा ऐतिहासिक मोड़ 1985 में आया. उस समय डॉलर बहुत मजबूत हो चुका था. इससे अमेरिकी निर्यात महंगा हो रहा था और व्यापार घाटा बढ़ रहा था. स्थिति को संभालने के लिए अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने न्यूयॉर्क के प्लाजा होटल में एक समझौता किया. इसे प्लाजा अकॉर्ड कहा गया. इस समझौते का उद्देश्य डॉलर को कमजोर करना था. समझौते के बाद डॉलर में करीब 40 फीसदी की तेज गिरावट आई. अगले दो वर्षों में डॉलर का मूल्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले काफी नीचे चला गया. यह डॉलर के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण गिरावटों में गिनी जाती है.

अमेरिका आजादी की 250वीं वर्षगांठ मना रहा है.

अमेरिका डॉलर को कमजोर क्यों करना चाहता था?

सामान्य तौर पर कोई भी देश अपनी मुद्रा को मजबूत देखना चाहता है. लेकिन, 1980 के दशक के मध्य में स्थिति उलटी थी. अमेरिकी डॉलर बहुत तेजी से मजबूत हो गया था. डॉलर का मूल्य जापानी येन, जर्मन मार्क और अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले लगभग 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ गया था. इसका सीधा असर अमेरिकी उद्योगों पर पड़ा. अमेरिकी सामान विदेशों में महंगे हो गए. अमेरिकी कंपनियों का निर्यात घटने लगा. विदेशी उत्पाद अमेरिका में सस्ते हो गए. अमेरिका का व्यापार घाटा तेजी से बढ़ गया. जापान के साथ व्यापार असंतुलन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया था. अमेरिकी उद्योगपति और सांसद सरकार पर दबाव डाल रहे थे कि डॉलर की कीमत कम की जाए ताकि अमेरिकी उत्पाद फिर से प्रतिस्पर्धी बन सकें.

1987 का ब्लैक मंडे

प्लाजा अकॉर्ड के बाद डॉलर लगातार दबाव में रहा. हालांकि, 1987 में शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आई, जिसे ब्लैक मंडे कहा जाता है. इसके बावजूद मुद्रा बाजार में डॉलर की कमजोरी चर्चा का विषय बनी रही. इस दौरान अमेरिका को व्यापार संतुलन सुधारने में कुछ मदद मिली, लेकिन डॉलर की गिरावट निवेशकों के लिए चिंता का कारण भी बनी.

20022008: सबसे लंबी गिरावट

डॉलर की सबसे लंबी गिरावटों में से एक 2002 से 2008 के बीच देखी गई. इस समय अमेरिका को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था. इराक युद्ध, बढ़ता बजट घाटा, चालू खाते का घाटा, आर्थिक अनिश्चितता की वजह से निवेशकों ने यूरो और अन्य मुद्राओं में अधिक रुचि दिखाई. यूरो के मुकाबले डॉलर लगातार कमजोर होता गया. कई विश्लेषकों ने इसे आधुनिक इतिहास में डॉलर की सबसे महत्वपूर्ण गिरावटों में शामिल किया. इराक युद्ध के समय डॉलर में करीब 14 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

डोनाल्ड ट्रंप

2008 का वित्तीय संकट

साल 2008 में पूरी दुनिया ने बड़ा वित्तीय संकट देखा. शुरुआत में अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली पर संकट गहराया. इससे डॉलर पर दबाव बढ़ा. लेकिन बाद में वैश्विक निवेशकों ने सुरक्षित निवेश की तलाश में फिर डॉलर की ओर रुख किया. इस वजह से संकट के शुरुआती चरण में कमजोरी दिखाने वाला डॉलर बाद में मजबूत होने लगा. फिर भी 2008 का दौर यह दिखाता है कि आर्थिक संकट डॉलर को कितनी तेजी से प्रभावित कर सकता है.

कोरोना काल में डॉलर की गिरावट

कोरोना महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया. महामारी के दौरान अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को बेहद कम कर दिया. साथ ही बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता कार्यक्रम शुरू किए गए. शुरुआती महीनों में निवेशकों ने डॉलर खरीदा, लेकिन बाद में बाजार में बड़ी मात्रा में नकदी आने से डॉलर पर दबाव बना. साल 2020 के दूसरे हिस्से में डॉलर इंडेक्स में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई. कई विशेषज्ञों ने इसे महामारी काल की बड़ी मुद्रा घटनाओं में शामिल किया.

2022 के बाद बदलती की तस्वीर

साल 2022 में अमेरिका में महंगाई तेजी से बढ़ी. इसे नियंत्रित करने के लिए फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी की. इस कदम से डॉलर मजबूत हुआ. लेकिन बाद के वर्षों में जब दरों में कटौती की उम्मीदें बढ़ीं, तब डॉलर पर फिर दबाव देखने को मिला. वैश्विक निवेशक लगातार अमेरिकी अर्थव्यवस्था, महंगाई और ब्याज दरों पर नजर बनाए हुए हैं. इसी आधार पर डॉलर की दिशा तय होती रहती है.

डॉलर इंडेक्स क्या बताता है?

डॉलर की ताकत या कमजोरी मापने के लिए डॉलर इंडेक्स का उपयोग किया जाता है. यह इंडेक्स डॉलर की तुलना प्रमुख वैश्विक मुद्राओं से करता है. इनमें यूरो, जापानी येन, ब्रिटिश पाउंड, कनाडाई डॉलर, स्वीडिश क्रोना और स्विस फ्रैंक शामिल हैं. जब इंडेक्स गिरता है तो इसका मतलब होता है कि डॉलर अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले कमजोर हो रहा है.

डॉलर की गिरावट का दुनिया पर असर

  1. डॉलर में गिरावट का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहता. इसके कई वैश्विक प्रभाव होते हैं.
  2. कमोडिटी बाजार पर असर: तेल, सोना और कई अन्य वस्तुओं की कीमत डॉलर में तय होती है. डॉलर कमजोर होने पर इनकी कीमतों में बदलाव देखा जा सकता है.
  3. उभरती अर्थव्यवस्थाओं को राहत: कमजोर डॉलर कई विकासशील देशों के लिए फायदेमंद हो सकता है. इससे विदेशी कर्ज का दबाव कुछ कम हो सकता है.
  4. निवेश का रुख बदलता है: डॉलर कमजोर होने पर निवेशक दूसरी मुद्राओं और बाजारों की ओर रुख कर सकते हैं.
  5. वैश्विक व्यापार प्रभावित होता है: मुद्रा विनिमय दरों में बदलाव से आयात और निर्यात की लागत प्रभावित होती है.

क्या डॉलर का दबदबा खत्म हो सकता है?

यह सवाल अक्सर पूछा जाता है. हालांकि, डॉलर में समयसमय पर गिरावट आती रही है, लेकिन अभी भी यह दुनिया की प्रमुख रिजर्व मुद्रा है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन में इसकी हिस्सेदारी बहुत बड़ी है. विशेषज्ञ मानते हैं कि डॉलर की स्थिति को चुनौती देने वाली मुद्राएं मौजूद हैं, लेकिन निकट भविष्य में डॉलर का महत्व पूरी तरह समाप्त होने की संभावना कम दिखाई देती है.

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