अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने बुधवार यानी 02 सितंबर को अपने पहले CEO समेत कई नए पदाधिकारी नियुक्त किए हैं. ट्रस्ट ने भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा को सीईओ बनाया है. साथ ही ट्र्स्ट ने न्यास में रिक्त तीन पदों पर महेश भागचंदका, मदन मोहन पांडे और डॉ. निर्मला यादव को ट्रस्टी नियुक्त किया है. ट्रस्ट ने स्वामी गोविंद देव गिरि की जिम्मेदारी में भी बदलाव किया है.

स्वामी गोविंद देव गिरि अब महामंत्री की जिम्मेदारी संभालेंगे. उन्होंने चंपत राय की जगह लही है. वहीं महेश भागचंदका कोषाध्यक्ष का दायित्व निभाएंगे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। स्वामी गोविंद देव गिरि को महामंत्री बनाए जाने के ट्र्स्ट के फैसले पर भी सवाल शुरू हो गए हैं. दरअसल, स्वामी गोविंद देव गिरी ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष थे. ऐसे मेंकिसी भी तरह की वित्तीय गड़बड़ी की जिम्मेदारी उनकी बनती है.
जिसके कोष से चोरी हुई, उसे प्रमोशन देकर महामंत्री बनाने का क्या तुक?
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी और गबन का मामला जून 2026 के शुरुआती सप्ताह में सार्वजनिक रूप से सामने आया था. इस मामले में एसआईटी की जांच के बाद एफआईआर करते हुए पुलिस ने 8 लोगों को गिरफ्तार किया. प्रबंधन की भूमिका पर सवाल उठने के बाद श्रीराम जन्म भूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने भी अपनेअपने पद इस्तीफा दे दिया था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में 14 करोड़ के चढ़ावा चोरी आरोप लगाया गया था. हालांकि, ट्र्स्ट ने सुप्रीम कोर्ट में 3 करोड़ के चंदा चोरी की जानकारी दी थी.
ऐसे में राम मंदिर में चंदा चोरी की घटना सामने के बाद सवाल उठा था कि क्या कोषाध्यक्ष की भूमिका सवालों के घेरे में नहीं होना चाहिए? क्या नैतिकता के आधार पर उन्हें इस मामले की सच्चाई सामने आने तक इस्तीफा नहीं देना चाहिए था. वह भी जब प्रबंधन के दो वरिष्ठ साथियों ने अपनेअपने पद इस्तीफा दे दिया था. लेकिन गोविंद देव गिरी अपने पद पर बने रहे. ऐसे में उन्हें पद से हटाए जाने की बजाय अब एक तरीके से प्रमोशन देकर महामंत्री बना दिया गया.
क्यों स्वामी गोविंद देव गिरी अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल ना माना जाए?
- स्वामी गोविंद देव गिरी ने अपने बयान में यह भी कहा है कि वे ट्रस्ट के बैंक खातों के अधिकारिक हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं.
- उनके पास भुगतान के लिए कोई चेकबुक भी नहीं रहती है. भुगतान सीधे बैंक ट्रांसफर के माध्यम से होता है.
- वह पूना रहते थे. चढ़ावे की गिनती के लिए नहीं आते थे. ये काम स्थानीय ट्रस्टियों की देखरेख में होती है. मेरी कोई भूमिका नहीं है.
- ट्रस्ट का कोषाध्यक्ष होने के बाद उन्होंने कभी किसी से नकद या कोई वस्तु दान के तौर पर भी स्वीकार नहीं की है.
- उनके ये दावे कोषाध्यक्ष के तौर पर उनकी भूमिका को और संदेहास्पद बना रहे हैं.
- ऐसे में उन्हें अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल क्यों नहीं माना जाए.
- अब ऐसे व्यक्ति को ही ट्रस्ट में एक तरीके से प्रमोशन देकर महामंत्री बना दिया गया.
चढ़ावा चोरी मामला सामने आने के बाद स्वामी गोविंद देव गिरी ने इस्तीफे को लेकर क्या कहा था?
कोषाध्यक्ष होने के नाते राम मंदिर में किसी भी तरह की वित्तीय गड़बड़ी की जिम्मेदारी स्वामी गोविंद देव गिरी की ही जिम्मेदारी बनती थी. उनसे इसको लेकर जब पत्रकारों ने सवाल पूछा था आप अपनी जिम्मेदारी को निभाने में विफल रहे लेकिन आपने चंपत राय और अनिल मिश्रा की तरह इस्तीफा क्यों नहीं दिया तो इसपर सफाई देने की बजाय उन्होंने दो टूक कह दिया था कि मेरा इस कांड से कोई वास्ता नहीं है. मैं इस्तीफा नहीं दूंगा. इस्तीफे का तो सवाल ही नहीं उठता.
जिम्मेदारी निभाने में विफल शख्स फिर से भरोसा करना कितना सही?
इसके अलावा स्वामी गोविंद देव गिरी ने जांच रिपोर्ट आए बिना जनता के नाम चिट्ठी लिखकर खुद को निर्दोष बताते हुए चंपत राय और अनिल मिश्रा को भी मीडिया के सामने क्लीन चिट भी दे दिया था, जिसपर ट्र्स्ट के अन्य सदस्यों ने भी आपत्ति जताई थी. सवाल यह भी है कि क्या जिम्मेदार पद पर रहते हुए उन्हें ऐसे किसी का पक्ष लेना चाहिए? इसके अलावा जिस व्यक्ति पास कोष चोरी रोकने की जिम्मेदारी थी, लेकिन विफल होने के बाद वह उस कोष का अध्यक्ष इतने दिनों तक कैसे बना रह सकता है. फिर उसे प्रमोशन कैसे मिल सकता है.
स्वामी गोविंद देव गिरी को ही क्यों बनाया महामंत्री?
- पुरानी टीम के अहम सदस्य. मंदिर की संचालन और प्रशासनिक कार्यों की जानकारी इसलिए नियुक्ति.
- डैमेज कंट्रोल करने के लिए गोविंद देव गिरी को ही आगे किया गया.
- संत को छोड़कर किसी बाहरी को बनाना सवाल उठ सकता था.
क्या गारंटी है कि गोविंद देव गिरी फिर से अपनी जिम्मेदारियों से भागते हुए नजर नहीं आएगे?
ऐसे में सवाल यह भी है कि जब स्वामी गोविंद देव गिरी अपनी जिम्मेदारी वाले कोष से चोरी नहीं रोक पाए तो दोबारा अपनी जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभा पाएंगे. सवाल उठने पर क्या फिर से उनके पास कोई अधिकार नहीं था. उनके दिशानिर्देशों के आधार पर काम नहीं हो रहा था जैसा बहाना तो नहीं बनाने लगेंगे और अपने पद पर बने रहेंगे. सवाल यह भी है कि चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद वह किस लालच में पद पर बने हुए थे. नैतिकता के आधार पर इस्तीफा क्यों नहीं दिया. इसकी क्या गारंटी है कि अगर भविष्य ऐसी घटना सामने आती है तो क्या स्वामी गोविंद देव गिरी फिर से अपनी जिम्मेदारियों से भागते हुए नजर आएगे.



